na ji bhar ke dekha na kuchh baat ki badi aarzu thi mulaqat ki ujalon ki pariyan nahane lagin nadi gungunai khayalat ki main chup tha to chalti hava ruk gai zaban sab samajhte hain jazbat ki muqaddar miri chashm-e-pur-ab ka barasti hui raat barsat ki kai saal se kuchh khabar hi nahin kahan din guzara kahan raat ki na ji bhar ke dekha na kuchh baat ki badi aarzu thi mulaqat ki ujalon ki pariyan nahane lagin nadi gungunai khayalat ki main chup tha to chalti hawa ruk gai zaban sab samajhte hain jazbaat ki muqaddar meri chashm-e-pur-ab ka barasti hui raat barsat ki kai sal se kuchh khabar hi nahin kahan din guzara kahan raat ki
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बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे
Kumar Vishwas
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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उसे भी साथ रखता, और तुझे भी अपना बना लेता अगर मैं चाहता, तो दिल में कोई चोर दरवाज़ा बना लेता ख़्वाब मिलाएगा कर के ख़ुश हूँ, पर ये पछतावा नहीं जाता के मुस्तक़बिल बनाने से तो अच्छा था, तुझे अपना बना लेता अकेला आदमी हूँ, और अचानक आए हो जो कुछ था हाज़िर है, और तुम आने से, पहले बता देते, तो कुछ अच्छा बना लेता
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है मुझे सहरस नई एक शाम लेना है किसे ख़बर कि फ़रिश्ते ग़ज़ल समझते हैं ख़ुदा के सामने काफ़िर का नाम लेना है मुआ'मला है तिरा बदतरीन दुश्मन से मिरे अज़ीज़ मोहब्बत से काम लेना है महकती ज़ुल्फ़ों से ख़ुशबू चमकती आँख से धूप शबों से जाम-ए-सहर का सलाम लेना है तुम्हारी चाल की आहिस्तगी के लहजे में सुख़न से दिल को मसलने का काम लेना है नहीं मैं 'मीर' के दर पर कभी नहीं जाता मुझे ख़ुदा से ग़ज़ल का कलाम लेना है बड़े सलीक़े से नोटों में उस को तुल्वा कर अमीर-ए-शहरस अब इंतिक़ाम लेना है
Bashir Badr
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मिरी नज़र में ख़ाक तेरे आइने पे गर्द है ये चाँद कितना ज़र्द है ये रात कितनी सर्द है कभी कभी तो यूँँ लगा कि हम सभी मशीन हैं तमाम शहर में न कोई ज़न न कोई मर्द है ख़ुदा की नज़्मों की किताब सारी काएनात है ग़ज़ल के शे'र की तरह हर एक फ़र्द फ़र्द है हयात आज भी कनीज़ है हुज़ूर-ए-जब्र में जो ज़िंदगी को जीत ले वो ज़िंदगी का मर्द है इसे तबर्रुक-ए-हयात कह के पलकों पर रखूँ अगर मुझे यक़ीन हो ये रास्ते की गर्द है वो जिन के ज़िक्र से रगों में दौड़ती थीं बिजलियाँ उन्हीं का हाथ हम ने छू के देखा कितना सर्द है
Bashir Badr
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ख़ून पत्तों पे जमा हो जैसे फूल का रंग हरा हो जैसे बारहा ये हमें महसूस हुआ दर्द सीने का ख़ुदा हो जैसे यूँँ तरस खा के न पूछो अहवाल तीर सीने पे लगा हो जैसे फूल की आँख में शबनम क्यूँँ है सब हमारी ही ख़ता हो जैसे किर्चें चुभती हैं बहुत सीने में आइना टूट गया हो जैसे सब हमें देखने आते हैं मगर नींद आँखों से ख़फ़ा हो जैसे अब चराग़ों की ज़रूरत भी नहीं चाँद इस दिल में छुपा हो जैसे
Bashir Badr
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जब सहर चुप हो हँसा लो हम को जब अँधेरा हो जला लो हम को हम हक़ीक़त हैं नज़र आते हैं दास्तानों में छुपा लो हम को ख़ून का काम रवाँ रहना है जिस जगह चाहो बहा लो हम को दिन न पा जाए कहीं शब का राज़ सुब्ह से पहले उठा लो हम को हम ज़माने के सताए हैं बहुत अपने सीने से लगा लो हम को वक़्त के होंट हमें छू लेंगे अन-कहे बोल हैं गा लो हम को
Bashir Badr
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किसी की याद में पलकें ज़रा भिगो लेते उदास रात की तन्हाइयों में रो लेते दुखों का बोझ अकेले नहीं सँभलता है कहीं वो मिलता तो उस से लिपट के रो लेते अगर सफ़र में हमारा भी हम-सफ़र होता बड़ी ख़ुशी से उन्हीं पत्थरों पे सो लेते तुम्हारी राह में शाख़ों पे फूल सूख गए कभी हवा की तरह इस तरफ़ भी हो लेते ये क्या कि रोज़ वही चाँदनी का बिस्तर हो कभी तो धूप की चादर बिछा के सो लेते
Bashir Badr
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