nahin ki nama-baron ko talash karte hain ham apne be-khabaron ko talash karte hain mohabbaton ka bhi mausam hai jab guzar jaae sab apne apne gharon ko talash karte hain suna hai kal jinhen dastar-e-iftikhar mili vo aaj apne saron ko talash karte hain ye ishq kya hai ki izhar-e-arzu ke liye harif nauhagaron ko talash karte hain ye ham jo dhundte phirte hain qatl-gahon ko dar-asl charagaron ko talash karte hain riha hue pa ajab haal hai asiron ka ki ab vo apne paron ko talash karte hain 'faraz' daad ke qabil hai justuju un ki jo ham se dar-badaron ko talash karte hain nahin ki nama-baron ko talash karte hain hum apne be-khabaron ko talash karte hain mohabbaton ka bhi mausam hai jab guzar jae sab apne apne gharon ko talash karte hain suna hai kal jinhen dastar-e-iftikhar mili wo aaj apne saron ko talash karte hain ye ishq kya hai ki izhaar-e-arzu ke liye harif nauhagaron ko talash karte hain ye hum jo dhundte phirte hain qatl-gahon ko dar-asl chaaragaron ko talash karte hain riha hue pa ajab haal hai asiron ka ki ab wo apne paron ko talash karte hain 'faraaz' dad ke qabil hai justuju un ki jo hum se dar-badaron ko talash karte hain
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
Dagh Dehlvi
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क्यूँँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं दोस्ती तो उदास करती नहीं हम हमेशा के सैर-चश्म सही तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन! इतनी आसानियों से मरती नहीं जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़ ज़िन्दगी उस तरह गुज़रती नहीं
Ahmad Faraz
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करूँँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे ग़ज़ल बहाना करूँँ और गुनगुनाऊँ उसे वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे ये लोग तज़्किरे करते हैं अपने लोगों के मैं कैसे बात करूँँ अब कहाँ से लाऊँ उसे मगर वो ज़ूद-फ़रामोश ज़ूद-रंज भी है कि रूठ जाए अगर याद कुछ दिलाऊँ उसे वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ तुम्हारी बात पे ऐ नासेहो गँवाऊँ उसे जो हम-सफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है 'फ़राज़' अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे
Ahmad Faraz
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दिल बदन का शरीक-ए-हाल कहाँ हिज्र फिर हिज्र है विसाल कहाँ इश्क़ है नाम इंतिहाओं का इस समुंदर में एतिदाल कहाँ ऐसा नशातो ज़हर में भी न था ऐ ग़म-ए-दिल तिरी मिसाल कहाँ हम को भी अपनी पाएमाली का है मगर इस क़दर मलाल कहा मैं नई दोस्ती के मोड़ पे था आ गया है तिरा ख़याल कहा दिल कि ख़ुश-फ़हम था सो है वर्ना तेरे मिलने का एहतिमाल कहाँ वस्ल ओ हिज्रांहैं और दुनियाएं इन ज़मानों में माह-ओ-साल कहाँ तुझ को देखा तो लोग हैरांहैं आ गया शहर में ग़ज़ाल कहाँ तुझ पे लिक्खी तो सज गई है ग़ज़ल आ मिला ख़्वाब से ख़याल कहाँ अब तो शह मात हो रही है 'फ़राज़' अब बचाव की कोई चाल कहाँ
Ahmad Faraz
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क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तुगू करे जो मुस्तक़िल सुकूत से दिल को लहू करे अब तो हमें भी तर्क-ए-मरासिम का दुख नहीं पर दिल ये चाहता है कि आग़ाज़ तू करे तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी ख़ुद को गँवा के कौन तिरी जुस्तुजू करे अब तो ये आरज़ू है कि वो ज़ख़्म खाइए ता-ज़िंदगी ये दिल न कोई आरज़ू करे तुझ को भुला के दिल है वो शर्मिंदा-ए-नज़र अब कोई हादसा ही तिरे रू-ब-रू करे चुप-चाप अपनी आग में जलते रहो 'फ़राज़' दुनिया तो अर्ज़-ए-हाल से बे-आबरू करे
Ahmad Faraz
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उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ हम ख़ुल्द से निकल तो गए हैं पर ऐ ख़ुदा इतने से वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी उस से ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ अब क्यूँँंन ज़िंदगी पे मोहब्बत को वार दें इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ अब तक तो दिल का दिल से तआ'रुफ़ न हो सका माना कि उस से मिलना मिलाना बहुत हुआ क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ कहता था नासेहों से मिरे मुँह न आइयो फिर क्या था एक हूँ का बहाना बहुत हुआ लो फिर तिरे लबों पे उसी बे-वफ़ा का ज़िक्र अहमद-'फ़राज़' तुझ से कहा न बहुत हुआ
Ahmad Faraz
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