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नील-गगन में तैर रहा है उजला उजला पूरा चाँद माँ की लोरी सा बच्चे के दूध कटोरे जैसा चाँद मुन्नी की भोली बातों सी चटकीं तारों की कलियाँ पप्पू की ख़ामोशी शरारत सा छुप छुप कर उभरा चाँद मुझ से पूछो कैसे काटी मैं ने पर्बत जैसी रात तुम ने तो गोदी में ले कर घंटों चूमा होगा चाँद परदेसी सूनी आँखों में शो'ले से लहराते हैं भाबी की छेड़ों सा बादल आपा की चुटकी सा चाँद तुम भी लिखना तुम ने उस शब कितनी बार पिया पानी तुम ने भी तो छज्जे ऊपर देखा होगा पूरा चाँद

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी रात जंगल में कोई शम्अ' जलाने से रही फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही

Nida Fazli

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गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया जब तक था आसमान में सूरज सभी का था फिर यूँँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ आलम तमाम चंद मचानों में बट गया ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया

Nida Fazli

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चाहतें मौसमी परिंदे हैं रुत बदलते ही लौट जाते हैं घोंसले बन के टूट जाते हैं दाग़ शाख़ों पे चहचहाते हैं आने वाले बयाज़ में अपनी जाने वालों के नाम लिखते हैं सब ही औरों के ख़ाली कमरों को अपनी अपनी तरह सजाते हैं मौत इक वाहिमा है नज़रों का साथ छुटता कहाँ है अपनों का जो ज़मीं पर नज़र नहीं आते चाँद तारों में जगमगाते हैं ये मुसव्विर अजीब होते हैं आप अपने हबीब होते हैं दूसरों की शबाहतें ले कर अपनी तस्वीर ही बनाते हैं यूँँ ही चलता है कारोबार-ए-जहाँ है ज़रूरी हर एक चीज़ यहाँ जिन दरख़्तों में फल नहीं आते वो जलाने के काम आते हैं

Nida Fazli

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आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही जब तलक है ख़ूब-सूरत है चलो यूँ ही सही हम कहाँ के देवता हैं बे-वफ़ा वो हैं तो क्या घर में कोई घर की ज़ीनत है चलो यूँ ही सही वो नहीं तो कोई तो होगा कहीं उस की तरह जिस्म में जब तक हरारत है चलो यूँ ही सही मैले हो जाते हैं रिश्ते भी लिबासों की तरह दोस्ती हर दिन की मेहनत है चलो यूँ ही सही भूल थी अपनी फ़रिश्ता आदमी में ढूँढ़ना आदमी में आदमिय्यत है चलो यूँ ही सही जैसी होनी चाहिए थी वैसी तो दुनिया नहीं दुनिया-दारी भी ज़रूरत है चलो यूँ ही सही

Nida Fazli

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ठहरे जो कहीं आँख तमाशा नज़र आए सूरज में धुआँ चाँद में सहरा नज़र आए रफ़्तार से ताबिंदा उमीदों के झरोके ठहरूँ तो हर इक सम्त अँधेरा नज़र आए साँचों में ढले क़हक़हे सोची हुई बातें हर शख़्स के काँधों पे जनाज़ा नज़र आए हर राह-गुज़र रास्ता भूला हुआ बालक हर हाथ में मिट्टी का खिलौना नज़र आए खोई हैं अभी मैं के धुँदलकों में निगाहें हट जाए ये दीवार तो दुनिया नज़र आए जिस से भी मिलें झुक के मिलें हँस के हों रुख़्सत अख़्लाक़ भी इस शहर में पेशा नज़र आए

Nida Fazli

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