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पाए ख़िताब क्या क्या देखे इ'ताब क्या क्या दिल को लगा के हम ने खींचे अज़ाब क्या क्या काटे हैं ख़ाक उड़ा कर जों गर्द-बाद बरसों गलियों में हम हुए हैं उस बिन ख़राब क्या क्या कुछ गुल से हैं शगुफ़्ता कुछ सर्व से हैं क़द-कश उस के ख़याल में हम देखे हैं ख़्वाब क्या क्या अन्वा-ए-जुर्म मेरे फिर बे-शुमार-ओ-बे-हद रोज़-ए-हिसाब लेंगे मुझ से हिसाब क्या क्या इक आग लग रही है सीनों में कुछ न पूछो जल जल के हम हुए हैं उस बिन कबाब क्या क्या इफ़रात-ए-शौक़ में तो रूयत रही न मुतलक़ कहते हैं मेरे मुँह पर अब शैख़-ओ-शाब क्या क्या फिर फिर गया है आ कर मुँह तक जिगर हमारे गुज़रे हैं जान-ओ-दिल पर याँ इज़्तिराब क्या क्या आशुफ़्ता उस के गेसू जब से हुए हैं मुँह पर तब से हमारे दिल को है पेच-ओ-ताब क्या क्या कुछ सूझता नहीं है मस्ती में 'मीर'-जी को करते हैं पोच-गोई पी कर शराब क्या क्या

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की

Meer Taqi Meer

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महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला

Meer Taqi Meer

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मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़ रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़ मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ'' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ

Meer Taqi Meer

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ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो हम तो हूँ बद-गुमान जो क़ासिद-ए-रसूल हो चाहूँ तो भर के कौली उठा लूँ अभी तुम्हें कैसे ही भारी हो मिरे आगे तो फूल हो सुर्मा जो नूर बख़्शे है आँखों को ख़ल्क़ की शायद कि राह-ए-यार की ही ख़ाक धूल हो जावें निसार होने को हम किस बिसात पर इक नीम जाँ रखें हैं सो वो जब क़ुबूल हो हम इन दिनों में लग नहीं पड़ते हैं सुब्ह-ओ-शाम वर्ना दुआ करें तो जो चाहें हुसूल हो दिल ले के लौंडे दिल्ली के कब का पचा गए अब उन से खाई पी हुई शय किया वसूल हो नाकाम इस लिए हो कि चाहो हो सब कुछ आज तुम भी तो 'मीर' साहिब-ओ-क़िबला अजूल हो

Meer Taqi Meer

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नहीं वसवास जी गँवाने के हाए रे ज़ौक़ दिल लगाने के मेरे तग़ईर-ए-हाल पर मत जा इत्तिफ़ाक़ात हैं ज़माने के दम-ए-आख़िर ही क्या न आना था और भी वक़्त थे बहाने के इस कुदूरत को हम समझते हैं ढब हैं ये ख़ाक में मिलाने के बस हैं दो बर्ग-ए-गुल क़फ़स में सबा नहीं भूके हम आब-ओ-दाने के मरने पर बैठे हैं सुनो साहब बंदे हैं अपने जी चलाने के अब गरेबाँ कहाँ कि ऐ नासेह चढ़ गया हाथ उस दिवाने के चश्म-ए-नजम सिपहर झपके है सदक़े उस अँखड़ियाँ लड़ाने के दिल-ओ-दीं होश-ओ-सब्र सब ही गए आगे आगे तुम्हारे आने के कब तू सोता था घर मरे आ कर जागे ताला ग़रीब-ख़ाने के मिज़ा-ए-अबरू-निगह से इस की 'मीर' कुश्ता हैं अपने दिल लगाने के तीर-ओ-तलवार-ओ-सैल यकजा हैं सारे अस्बाब मार जाने के

Meer Taqi Meer

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