phuul khile hain likha hua hai todo mat aur machal kar ji kahta hai chhodo mat rut matvali chand nashila raat javan ghar ka amad-kharch yahan to jodo mat abr jhuka hai chand ke gore mukhde par chhodo laaj lago dil se munh modo mat dil ko patthar kar dene vaali yaado ab apna sar us patthar se phodo mat mat 'amiq' ki ankhon se dil men jhanko is gahre sagar se naata jodo mat phul khile hain likha hua hai todo mat aur machal kar ji kahta hai chhodo mat rut matwali chand nashila raat jawan ghar ka aamad-kharch yahan to jodo mat abr jhuka hai chand ke gore mukhde par chhodo laj lago dil se munh modo mat dil ko patthar kar dene wali yaado ab apna sar us patthar se phodo mat mat 'amiq' ki aankhon se dil mein jhanko is gahre sagar se nata jodo mat
Related Ghazal
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
95 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
More from Ameeq Hanafi
है नूर-ए-ख़ुदा भी यहाँ इरफ़ान-ए-ख़ुदा भी ये ज़ात कि है वादी-ए-सीना भी हिरा भी उस बन में किया करती है तप मेरी अना भी इस शहर में है कार-गह-ए-अर्ज़-ओ-समा भी करता हूँ तवाफ़ अपना तो मिलती है नई राह क़िबला भी है ये ज़ात मिरा क़िबला-नुमा भी ख़ुद-आगही ओ ख़ुद-निगही का है ये इनआ'म और जुर्म-ए-शनासाई-ए-आलम की सज़ा भी होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा सर-ए-एहसास जो देखती रहती है मिरी आँख दिखा भी करती है कमर-बस्ता सफ़र पर भी यही ज़ात जब दूर निकल जाता हूँ देती है सदा भी ज़र्रे में है कौनैन तो कौनैन में ज़र्रा कुछ है तुझे आवारा-ए-अफ़्लाक पता भी
Ameeq Hanafi
0 likes
मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा दश्त मेरा न ये चमन मेरा मैं कि हर चंद एक ख़ाना-नशीं अंजुमन अंजुमन सुख़न मेरा बर्ग-ए-गुल पर चराग़ सा क्या है छू गया था उसे दहन मेरा मैं कि टूटा हुआ सितारा हूँ क्या बिगाड़ेगी अंजुमन मेरा हर घड़ी इक नया तक़ाज़ा है दर्द-ए-सर बन गया बदन मेरा
Ameeq Hanafi
3 likes
अर्ज़-ए-मुद्दआ करते क्यूँँ नहीं किया हम ने ख़्वाहिशों को हसरत में ख़ुद बदल दिया हम ने नित नई उमीदों के टाँक टाँक कर पैवंद ज़िंदगी के दामन को उम्र-भर सिया हम ने रंज-ओ-ग़म उठाए हैं फ़िक्र-ओ-फ़न भी पाए हैं ज़िंदगी को जितना भी जी सके जिया हम ने सुब्ह का नया सूरज कुछ तो रौशनी लेगा शाम से जलाया है आस का दिया हम ने दाग़-ए-दिल की ज़रदारी मुफ़्त हाथ कब आई ख़ाक हो के पाया है राज़-ए-कीमिया हम ने
Ameeq Hanafi
0 likes
ग़ुबार-ओ-गर्द ने समझा है रहनुमा मुझ को तलाश करता फिरा है ये क़ाफ़िला मुझ को तवील राह-ए-सफ़र पर हैं फूट फूट पड़ा न क्यूँँ समझते मिरे पैर आबला मुझ को शिकस्त-ए-दिल की सदा हूँ बिखर भी जाने दे ख़ुतूत-ओ-रंग की ज़ंजीर मत पिन्हा मुझ को ज़मीन पर है समुंदर फ़लक पे अब्र-ए-ग़ुबार उतारती है कहाँ देखिए हवा मुझ को सुकूत तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का इक गराँ लम्हा बना गया है सदाओं का सिलसिला मुझ को वो दूर दूर से अब क्यूँँ मुझे जलाता है क़रीब आ के बहुत जो बुझा गया मुझ को रचा के एक तिलिस्म-ए-सवाबित-ओ-सय्यार कशिश में अपनी बुलाने लगा ख़ला मुझ को
Ameeq Hanafi
0 likes
मैं भी कब से चुप बैठा हूँ वो भी कब से चुप बैठी है ये है विसाल की रस्म अनोखी ये मिलने की रीत नई है वो जब मुझ को देख रही थी मैं ने उस को देख लिया था बस इतनी सी बात थी लेकिन बढ़ते बढ़ते कितने बढ़ी है बे-सूरत बे-जिस्म आवाज़ें अंदर भेज रही हैं हवाएँ बंद हैं कमरे के दरवाज़े लेकिन खिड़की खुली हुई है मेरे घर की छत के ऊपर सूरज आया चाँद भी उतरा छत के नीचे के कमरों की जैसी थी औक़ात वही है
Ameeq Hanafi
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Ameeq Hanafi.
Similar Moods
More moods that pair well with Ameeq Hanafi's ghazal.







