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phuul khile hain likha hua hai todo mat aur machal kar ji kahta hai chhodo mat rut matvali chand nashila raat javan ghar ka amad-kharch yahan to jodo mat abr jhuka hai chand ke gore mukhde par chhodo laaj lago dil se munh modo mat dil ko patthar kar dene vaali yaado ab apna sar us patthar se phodo mat mat 'amiq' ki ankhon se dil men jhanko is gahre sagar se naata jodo mat phul khile hain likha hua hai todo mat aur machal kar ji kahta hai chhodo mat rut matwali chand nashila raat jawan ghar ka aamad-kharch yahan to jodo mat abr jhuka hai chand ke gore mukhde par chhodo laj lago dil se munh modo mat dil ko patthar kar dene wali yaado ab apna sar us patthar se phodo mat mat 'amiq' ki aankhon se dil mein jhanko is gahre sagar se nata jodo mat

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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है नूर-ए-ख़ुदा भी यहाँ इरफ़ान-ए-ख़ुदा भी ये ज़ात कि है वादी-ए-सीना भी हिरा भी उस बन में किया करती है तप मेरी अना भी इस शहर में है कार-गह-ए-अर्ज़-ओ-समा भी करता हूँ तवाफ़ अपना तो मिलती है नई राह क़िबला भी है ये ज़ात मिरा क़िबला-नुमा भी ख़ुद-आगही ओ ख़ुद-निगही का है ये इनआ'म और जुर्म-ए-शनासाई-ए-आलम की सज़ा भी होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा सर-ए-एहसास जो देखती रहती है मिरी आँख दिखा भी करती है कमर-बस्ता सफ़र पर भी यही ज़ात जब दूर निकल जाता हूँ देती है सदा भी ज़र्रे में है कौनैन तो कौनैन में ज़र्रा कुछ है तुझे आवारा-ए-अफ़्लाक पता भी

Ameeq Hanafi

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मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा दश्त मेरा न ये चमन मेरा मैं कि हर चंद एक ख़ाना-नशीं अंजुमन अंजुमन सुख़न मेरा बर्ग-ए-गुल पर चराग़ सा क्या है छू गया था उसे दहन मेरा मैं कि टूटा हुआ सितारा हूँ क्या बिगाड़ेगी अंजुमन मेरा हर घड़ी इक नया तक़ाज़ा है दर्द-ए-सर बन गया बदन मेरा

Ameeq Hanafi

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अर्ज़-ए-मुद्दआ करते क्यूँँ नहीं किया हम ने ख़्वाहिशों को हसरत में ख़ुद बदल दिया हम ने नित नई उमीदों के टाँक टाँक कर पैवंद ज़िंदगी के दामन को उम्र-भर सिया हम ने रंज-ओ-ग़म उठाए हैं फ़िक्र-ओ-फ़न भी पाए हैं ज़िंदगी को जितना भी जी सके जिया हम ने सुब्ह का नया सूरज कुछ तो रौशनी लेगा शाम से जलाया है आस का दिया हम ने दाग़-ए-दिल की ज़रदारी मुफ़्त हाथ कब आई ख़ाक हो के पाया है राज़-ए-कीमिया हम ने

Ameeq Hanafi

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ग़ुबार-ओ-गर्द ने समझा है रहनुमा मुझ को तलाश करता फिरा है ये क़ाफ़िला मुझ को तवील राह-ए-सफ़र पर हैं फूट फूट पड़ा न क्यूँँ समझते मिरे पैर आबला मुझ को शिकस्त-ए-दिल की सदा हूँ बिखर भी जाने दे ख़ुतूत-ओ-रंग की ज़ंजीर मत पिन्हा मुझ को ज़मीन पर है समुंदर फ़लक पे अब्र-ए-ग़ुबार उतारती है कहाँ देखिए हवा मुझ को सुकूत तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का इक गराँ लम्हा बना गया है सदाओं का सिलसिला मुझ को वो दूर दूर से अब क्यूँँ मुझे जलाता है क़रीब आ के बहुत जो बुझा गया मुझ को रचा के एक तिलिस्म-ए-सवाबित-ओ-सय्यार कशिश में अपनी बुलाने लगा ख़ला मुझ को

Ameeq Hanafi

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मैं भी कब से चुप बैठा हूँ वो भी कब से चुप बैठी है ये है विसाल की रस्म अनोखी ये मिलने की रीत नई है वो जब मुझ को देख रही थी मैं ने उस को देख लिया था बस इतनी सी बात थी लेकिन बढ़ते बढ़ते कितने बढ़ी है बे-सूरत बे-जिस्म आवाज़ें अंदर भेज रही हैं हवाएँ बंद हैं कमरे के दरवाज़े लेकिन खिड़की खुली हुई है मेरे घर की छत के ऊपर सूरज आया चाँद भी उतरा छत के नीचे के कमरों की जैसी थी औक़ात वही है

Ameeq Hanafi

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