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रंग-ए-दुनिया कितना गहरा हो गया आदमी का रंग फीका हो गया रात क्या होती है हम से पूछिए आप तो सोए सवेरा हो गया डूबने की ज़िद पे कश्ती आ गई बस यहीं मजबूर दरिया हो गया आज ख़ुद को बेचने निकले थे हम आज ही बाज़ार मंदा हो गया ग़म अँधेरे का नहीं 'दानिश' मगर वक़्त से पहले अँधेरा हो गया

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया

Tehzeeb Hafi

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समुंदर उल्टा सीधा बोलता है सलीक़े से तो प्यासा बोलता है यहाँ तो उस का पैसा बोलता है वहाँ देखेंगे वो क्या बोलता है तुम्हारे साथ उड़ाने बोलती है हमारे साथ पिंजरा बोलता है निगाहें करती रह जाती हैं हिज्जे वो जब चेहरे से इमला बोलता है मैं चुप रहता हूँ इतना बोल कर भी तू चुप रह कर भी कितना बोलता है मैं हर शाइ'र में ये भी देखता हूँ बिना माइक के वो क्या बोलता है

Fahmi Badayuni

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ये माना उस तरफ़ रस्ता न जाए मगर फिर भी मुझे रोका न जाए बदल सकती है रुख़ तस्वीर अपना कुछ इतने ग़ौर से देखा न जाए उलझने के लिए सौ उलझनें हैं बस अपने आप से उलझा न जाए इरादा वापसी का हो अगर तो बहुत गहराई में उतरा न जाए हमारी अर्ज़ बस इतनी है 'दानिश' उदासी का सबब पूछा न जाए

Madan Mohan Danish

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कोई ये लाख कहे मेरे बनाने से मिला हर नया रंग ज़माने को पुराने से मिला फ़िक्र हर बार ख़मोशी से मिली है मुझ को और ज़माना ये मुझे शोर मचाने से मिला उस की तक़दीर अँधेरों ने लिखी थी शायद वो उजाला जो चराग़ों को बुझाने से मिला पूछते क्या हो मिला कैसे ये जंगल को तिलिस्म छाँव में धूप की रंगत को मिलाने से मिला और लोगों से मुलाक़ात कहाँ मुमकिन थी वो तो ख़ुद से भी मिला है तो बहाने से मिला मेरी तश्कील तो कुछ और हुई थी 'दानिश' ये नया नक़्श मुझे ख़ुद को मिटाने से मिला

Madan Mohan Danish

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पत्थर पहले ख़ुद को पत्थर करता है उस के बा'द ही कुछ कारीगर करता है एक ज़रा सी कश्ती ने ललकारा है अब देखें क्या ढोंग समुंदर करता है कान लगा कर मौसम की बातें सुनिए क़ुदरत का सब हाल उजागर करता है उस की बातों में रस कैसे पैदा हो बात बहुत ही सोच-समझकर करता है जिस को देखो 'दानिश' का दीवाना है क्या वो कोई जादू-मंतर करता है

Madan Mohan Danish

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कोई काँटा न हो  गुलाबों में  ऐसा मुमकिन है सिर्फ़ ख़्वाबों में  दिल को कैसे क़रार आता है  ये लिखा ही नहीं किताबों में  इतने सीधे सवाल थे मेरे  वो उलझता गया जवाबों में  मैं ही उस का ग़ुरूर था दानिश  और मुझी को रखा  ख़राबों में

Madan Mohan Danish

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और क्या आख़िर तुझे ऐ ज़िंदगानी चाहिए आरज़ू कल आग की थी आज पानी चाहिए ये कहाँ की रीत है जागे कोई सोए कोई रात सब की है तो सब को नींद आनी चाहिए इस को हँसने के लिए तो उस को रोने के लिए वक़्त की झोली से सब को इक कहानी चाहिए क्यूँँ ज़रूरी है किसी के पीछे पीछे हम चलें जब सफ़र अपना है तो अपनी रवानी चाहिए कौन पहचानेगा 'दानिश' अब तुझे किरदार से बे-मुरव्वत वक़्त को ताज़ा निशानी चाहिए

Madan Mohan Danish

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