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रूदाद-ए-जाँ कहें जो ज़रा दम मिले हमें उस दिल के रास्ते में कई ख़म मिले हमें लब्बैक पहले हम ने कहा था रसूल-ए-हुस्न हो कार-ज़ार-ए-इश्क़ तो परचम मिले हमें आए इक ऐसा ज़ख़्म जो भरना न हो कभी या'नी हर एक ज़ख़्म का मरहम मिले हमें दिन में जहाँ सराब मिले थे हमें वहाँ आई जो रात क़तरा-ए-शबनम मिले हमें तुम जैसे और लोग भी होंगे जहान में ये बात और है कि बहुत कम मिले हमें जब साथ थे तो मिल के भी मिलना न हो सका जब से बिछड़ गए हो तो पैहम मिले हमें और फिर हमें भी ख़ुद पे बहुत प्यार आ गया उस की तरफ़ खड़े हुए जब हम मिले हमें जो उम्र-भर का साथ निभाता न मिल सका वैसे तो ज़िंदगी में बहुत ग़म मिले हमें

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी

Zubair Ali Tabish

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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कि जैसे कोई मुसाफ़िर वतन में लौट आए हुई जो शाम तो फिर से थकन में लौट आए न आबशार न सहरा लगा सके क़ीमत हम अपनी प्यास को ले कर दहन में लौट आए सफ़र तवील बहुत था किसी की आँखों तक तो उस के बा'द हम अपने बदन में लौट आए कभी गए थे हवाओं का सामना करने सभी चराग़ उसी अंजुमन में लौट आए किसी तरह तो फ़ज़ाओं की ख़ामुशी टूटे तो फिर से शोर-ए-सलासिल चलन में लौट आए 'अमीर' इमाम बताओ ये माजरा क्या है तुम्हारे शे'र उसी बाँकपन में लौट आए

Ameer Imam

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यूँँ मिरे होने को मुझ पर आश्कार उस ने किया मुझ में पोशीदा किसी दरिया को पार उस ने किया पहले सहरा से मुझे लाया समुंदर की तरफ़ नाव पर काग़ज़ की फिर मुझ को सवार उस ने किया मैं था इक आवाज़ मुझ को ख़ामुशी से तोड़ कर किर्चियों को देर तक मेरी शुमार उस ने किया दिन चढ़ा तो धूप की मुझ को सलीबें दे गया रात आई तो मिरे बिस्तर को दार उस ने किया जिस को उस ने रौशनी समझा था मेरी धूप थी शाम होने का मिरी फिर इंतिज़ार उस ने किया देर तक बुनता रहा आँखों के करघे पर मुझे बुन गया जब मैं तो मुझ को तार तार उस ने किया

Ameer Imam

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ज़मीं के सारे मनाज़िर से कट के सोता हूँ मैं आसमाँ के सफ़र से पलट के सोता हूँ मैं जम्अ'' करता हूँ शब के सियाही क़तरों को ब-वक़्त-ए-सुब्ह फिर उन को पलट के सोता हूँ तलाश धूप में करता हूँ सारा दिन ख़ुद को तमाम-रात सितारों में बट के सोता हूँ कहाँ सुकूँ कि शब-ओ-रोज़ घूमना उस का ज़रा ज़मीन के मेहवर से हट के सोता हूँ तिरे बदन की ख़लाओं में आँख खुलती है हवा के जिस्म से जब जब लिपट के सोता हूँ मैं जाग जाग के रातें गुज़ारने वाला इक ऐसी रात भी आती है डट के सोता हूँ

Ameer Imam

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वो अपने बंद-ए-क़बा खोलती तो क्या लगती ख़ुदा के वास्ते कोई कहे ख़ुदा-लगती यक़ीन थी तो यक़ीं में समा गई कैसे गुमान थी तो गुमाँ से भी मावरा लगती अगर बिखरती तो सूरज कभी नहीं उगता तिरा ख़याल कि वो ज़ुल्फ़ बस घटा लगती तिरे मरीज़ को दुनिया में कुछ नहीं लगता दवा लगे न रक़ीबों की बद-दुआ' लगती हुई है क़ैद ज़माने में रौशनी किस से भला वो जिस्म और उस को कोई क़बा लगती लगी वो तुझ सी तो आलम में मुनफ़रिद ठहरी वगर्ना आम सी लगती अगर जुदा लगती

Ameer Imam

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उन को ख़ला में कोई नज़र आना चाहिए आँखों को टूटे ख़्वाब का हर्जाना चाहिए वो काम रह के करना पड़ा शहर में हमें मजनूँ को जिस के वास्ते वीराना चाहिए इस ज़ख़्म-ए-दिल पे आज भी सुर्ख़ी को देख कर इतरा रहे हैं हम हमें इतराना चाहिए तन्हाइयों पे अपनी नज़र कर ज़रा कभी ऐ बेवक़ूफ़ दिल तुझे घबराना चाहिए है हिज्र तो कबाब न खाने से क्या उसूल गर इश्क़ है तो क्या हमें मर जाना चाहिए दानाइयाँ भी ख़ूब हैं लेकिन अगर मिले धोखा हसीन सा तो उसे खाना चाहिए बीते दिनों की कोई निशानी तो साथ हो जान-ए-हया तुम्हें ज़रा शर्माना चाहिए इस शाइ'री में कुछ नहीं नक़्क़ाद के लिए दिलदार चाहिए कोई दीवाना चाहिए

Ameer Imam

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