ghazalKuch Alfaaz

उजड़े हुए लोगों से गुरेज़ाँ न हुआ कर हालात की क़ब्रों के ये कतबे भी पढ़ा कर क्या जानिए क्यूँँ तेज़ हवा सोच में गुम है ख़्वाबीदा परिंदों को दरख़्तों से उड़ा कर उस शख़्स के तुम से भी मरासिम हैं तो होंगे वो झूट न बोलेगा मिरे सामने आ कर हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न कर दे तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर वो आज भी सदियों की मसाफ़त पे खड़ा है ढूँडा था जिसे वक़्त की दीवार गिरा कर ऐ दिल तुझे दुश्मन की भी पहचान कहाँ है तू हल्क़ा-ए-याराँ में भी मोहतात रहा कर इस शब के मुक़द्दर में सहर ही नहीं 'मोहसिन' देखा है कई बार चराग़ों को बुझा कर

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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अज़ाब-ए-दीद में आँखें लहू लहू कर के मैं शर्मसार हुआ तेरी जुस्तुजू कर के खंडर की तह से बुरीदा-बदन सरों के सिवा मिला न कुछ भी ख़ज़ानों की आरज़ू कर के सुना है शहर में ज़ख़्मी दिलों का मेला है चलेंगे हम भी मगर पैरहन रफ़ू कर के मसाफ़त-ए-शब-ए-हिज्राँ के बा'द भेद खुला हवा दुखी है चराग़ों की आबरू कर के ज़मीं की प्यास उसी के लहू को चाट गई वो ख़ुश हुआ था समुंदर को आबजू कर के ये किस ने हम से लहू का ख़िराज फिर माँगा अभी तो सोए थे मक़्तल को सुर्ख़-रू कर के जुलूस-ए-अहल-ए-वफ़ा किस के दर पे पहुँचा है निशान-ए-तौक़-ए-वफ़ा ज़ीनत-ए-गुलू कर के उजाड़ रुत को गुलाबी बनाए रखती है हमारी आँख तिरी दीद से वुज़ू कर के कोई तो हब्स-ए-हवा से ये पूछता 'मोहसिन' मिला है क्या उसे कलियों को बे-नुमू कर के

Mohsin Naqvi

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अब वो तूफ़ाँ है न वो शोर हवाओं जैसा दिल का आलम है तेरे बा'द ख़लाओं जैसा काश दुनिया मेरे एहसास को वापस कर दे ख़ामुशी का वही अंदाज़ सदाओं जैसा पास रह कर भी हमेशा वो बहुत दूर मिला उस का अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल था ख़ुदाओं जैसा कितनी शिद्दत से बहारों को था एहसास-ए-मआ'ल फूल खिल कर भी रहा ज़र्द ख़िज़ाओं जैसा क्या क़यामत है कि दुनिया उसे सरदार कहे जिस का अंदाज़-ए-सुख़न भी हो गदाओं जैसा फिर तेरी याद के मौसम ने जगाए महशर फिर मेरे दिल में उठा शोर हवाओं जैसा बारहा ख़्वाब में पा कर मुझे प्यासा 'मोहसिन' उस की ज़ुल्फ़ों ने किया रक़्स घटाओं जैसा

Mohsin Naqvi

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अब ये सोचूँ तो भँवर ज़ेहन में पड़ जाते हैं कैसे चेहरे हैं जो मिलते ही बिछड़ जाते हैं क्यूँँ तिरे दर्द को दें तोहमत-ए-वीरानी-ए-दिल ज़लज़लों में तो भरे शहर उजड़ जाते हैं मौसम-ए-ज़र्द में इक दिल को बचाऊँ कैसे ऐसी रुत में तो घने पेड़ भी झड़ जाते हैं अब कोई क्या मिरे क़दमों के निशाँ ढूँडेगा तेज़ आँधी में तो ख़े में भी उखड़ जाते हैं शग़्ल-ए-अर्बाब-ए-हुनर पूछते क्या हो कि ये लोग पत्थरों में भी कभी आइने जड़ जाती हैं सोच का आइना धुँदला हो तो फिर वक़्त के साथ चाँद चेहरों के ख़द-ओ-ख़ाल बिगड़ जाते हैं शिद्दत-ए-ग़म में भी ज़िंदा हूँ तो हैरत कैसी कुछ दिए तुंद हवाओं से भी लड़ जाते हैं वो भी क्या लोग हैं 'मोहसिन' जो वफ़ा की ख़ातिर ख़ुद-तराशीदा उसूलों पे भी अड़ जाते हैं

Mohsin Naqvi

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जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रस्ता सुनसान हुआ अपना क्या है सारे शहर का इक जैसा नुक़सान हुआ ये दिल ये आसेब की नगरी मस्कन सोचूँ वहमों का सोच रहा हूँ इस नगरी में तू कब से मेहमान हुआ सहरा की मुँह-ज़ोर हवाएँ औरों से मंसूब हुईं मुफ़्त में हम आवारा ठहरे मुफ़्त में घर वीरान हुआ मेरे हाल पे हैरत कैसी दर्द के तन्हा मौसम में पत्थर भी रो पड़ते हैं इंसान तो फिर इंसान हुआ इतनी देर में उजड़े दिल पर कितने महशर बीत गए जितनी देर में तुझ को पा कर खोने का इम्कान हुआ कल तक जिस के गिर्द था रक़्साँ इक अम्बोह सितारों का आज उसी को तन्हा पा कर मैं तो बहुत हैरान हुआ उस के ज़ख़्म छुपा कर रखिए ख़ुद उस शख़्स की नज़रों से उस से कैसा शिकवा कीजे वो तो अभी नादान हुआ जिन अश्कों की फीकी लौ को हम बे-कार समझते थे उन अश्कों से कितना रौशन इक तारीक मकान हुआ यूँँ भी कम-आमेज़ था 'मोहसिन' वो इस शहर के लोगों में लेकिन मेरे सामने आ कर और भी कुछ अंजान हुआ

Mohsin Naqvi

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ख़ुमार-ए-मौसम-ए-ख़ुश्बू हद-ए-चमन में खुला मिरी ग़ज़ल का ख़ज़ाना तिरे बदन में खुला तुम उस का हुस्न कभी उस की बज़्म में देखो कि माहताब सदा शब के पैरहन में खुला अजब नशा था मगर उस की बख़्शिश-ए-लब में कि यूँँ तो हम से भी क्या क्या न वो सुख़न में खुला न पूछ पहली मुलाक़ात में मिज़ाज उस का वो रंग रंग में सिमटा किरन किरन में खुला बदन की चाप निगह की ज़बाँ भी होती है ये भेद हम पे मगर उस की अंजुमन में खुला कि जैसे अब्र हवा की गिरह से खुल जाए सफ़र की शाम मिरा मेहरबाँ थकन में खुला कहूँ मैं किस से निशानी थी किस मसीहा की वो एक ज़ख़्म कि 'मोहसिन' मिरे कफ़न में खुला

Mohsin Naqvi

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