वक़्त बंजारा-सिफ़त लम्हा ब लम्हा अपना किस को मालूम यहाँ कौन है कितना अपना जो भी चाहे वो बना ले उसे अपने जैसा किसी आईने का होता नहीं चेहरा अपना ख़ुद से मिलने का चलन आम नहीं है वर्ना अपने अंदर ही छुपा होता है रस्ता अपना यूँँ भी होता है वो ख़ूबी जो है हम से मंसूब उस के होने में नहीं होता इरादा अपना ख़त के आख़िर में सभी यूँँ ही रक़म करते हैं उस ने रस्मन ही लिखा होगा तुम्हारा अपना
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो सरकारी एलान हुआ है सच बोलो घर के अंदर तो झूठों की एक मंडी है दरवाज़े पर लिखा हुआ है सच बोलो गुलदस्ते पर यकजहती लिख रक्खा है गुलदस्ते के अंदर क्या है सच बोलो गंगा मइया डूबने वाले अपने थे नाव में किस ने छेद किया है सच बोलो
Rahat Indori
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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी रात जंगल में कोई शम्अ' जलाने से रही फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही
Nida Fazli
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गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया जब तक था आसमान में सूरज सभी का था फिर यूँँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ आलम तमाम चंद मचानों में बट गया ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया
Nida Fazli
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चाहतें मौसमी परिंदे हैं रुत बदलते ही लौट जाते हैं घोंसले बन के टूट जाते हैं दाग़ शाख़ों पे चहचहाते हैं आने वाले बयाज़ में अपनी जाने वालों के नाम लिखते हैं सब ही औरों के ख़ाली कमरों को अपनी अपनी तरह सजाते हैं मौत इक वाहिमा है नज़रों का साथ छुटता कहाँ है अपनों का जो ज़मीं पर नज़र नहीं आते चाँद तारों में जगमगाते हैं ये मुसव्विर अजीब होते हैं आप अपने हबीब होते हैं दूसरों की शबाहतें ले कर अपनी तस्वीर ही बनाते हैं यूँँ ही चलता है कारोबार-ए-जहाँ है ज़रूरी हर एक चीज़ यहाँ जिन दरख़्तों में फल नहीं आते वो जलाने के काम आते हैं
Nida Fazli
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राक्षस था न ख़ुदा था पहले आदमी कितना बड़ा था पहले आसमाँ खेत समुंदर सब लाल ख़ून काग़ज़ पे उगा था पहले मैं वो मक़्तूल जो क़ातिल न बना हाथ मेरा भी उठा था पहले अब किसी से भी शिकायत न रही जाने किस किस से गिला था पहले शहर तो बा'द में वीरान हुआ मेरा घर ख़ाक हुआ था पहले
Nida Fazli
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कोई किसी की तरफ़ है कोई किसी की तरफ़ कहाँ है शहर में अब कोई ज़िंदगी की तरफ़ सभी की नज़रों में ग़ाएब था जो वो हाज़िर था किसी ने रुक के नहीं देखा आदमी की तरफ़ तमाम शहर की शमएँ उसी से रौशन थीं कभी उजाला बहुत था किसी गली की तरफ़ कहीं की भूक हो हर खेत उस का अपना है कहीं की प्यास हो जाएगी वो नदी की तरफ़ न निकले ख़ैर से अल्लामा क़ौल से बाहर 'यगाना' टूट गए जब चले ख़ुदी की तरफ़
Nida Fazli
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