रात भर कुत्ता उस के पेट में भौंक रहा था कैसी कैसी आवाज़ें थीं भौं भौं भौं भौं वूँ वूँ वूँ वूँ सारा कमरा उस की पागल आवाज़ों से वूँ वूँ करता हाँप रहा था गज़-भर लंबी सुर्ख़ ज़बाँ भी उस के हल्क़ से निकल रही थी रालें मुँह से टपक रही थीं हिलते कान और हिलती दुम से कुत्ता भौं भौं भौं भौं करता उस के पेट में भौंक रहा था वो सोया था गहरी नींद में कुत्ता सूँघ के गोश्त की ख़ुशबू ख़्वाब से यक-दम जाग उठा था दिन निकला था ए-के-शैख़ अब भूरे सूट के अंदर बंद था ज़र की मेहराबों के नीचे लम्हा लम्हा दौड़ रहा था उस के बातिन और ख़ारिज में ज़र्द जहन्नम गर्म हुआ था रात आई है ए-के-शैख़ अब घर आया है कुत्ता उस के पेट में फिर से भौंक पड़ेगा रात भर उस के टूटते जिस्म पे कुत्ता अपनी दुम को हिलाता इस कोने से उस कोने तक भौंक भौंक कर ग़ुर्राएगा मुँह से रालें टपकाएगा कुत्ता सूँघ के गोश्त की ख़ुशबू जिस्म की दीवारों के ऊपर दौड़ दौड़ के थक जाएगा सो जाएगा दिन निकला है ए-के-शैख़ अब नीले सूट के अंदर बंद है ए-के-शैख़ अब कार-गहों की छत के नीचे पूरे ज़ोर से चीख़ रहा है ए-के-शैख़ के पूरे जिस्म पे ज़र्द जहन्नम फैल रहा है ज़र की मेहराबों के नीचे कज-बातिन और पागल कुत्ता दौड़ रहा है
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
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नीले सायों की रात थी वो वो साहिल-ए-शब पे सो गई थी वो नीले साए हवा के चेहरे पे और बदन पे और उस की आँखों में सो रहे थे और उस के होंटों पे सुर्ख़ ख़ुशबू की धूप उस शब चमक रही थी वो साहिल-ए-शब वो नीले पानी वो आसमानों से सुर्ख़ पत्तों की तेज़ बारिश वो तेज़ बारिश बदन पे उस के गुलाब-मौसम के इन दिनों में वो साहिल-ए-शब पे सो गई थी वो सुर्ख़ ख़ुशबू की तेज़ धूपों में खो गई थी
Tabassum Kashmiri
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मैं ने आशाओं की आँखें चेहरे होंट और नीले बाज़ू नोच लिए हैं उन के गर्म लहू से मैं ने अपने हाथ भिगो डाले हैं दोपहरों की तपती धूप में ख़्वाहिशें अपने जिस्म उठा कर चोबी खिड़की के शीशों से अक्सर झाँकती रहती हैं आँखें होंट और ज़ख़्मी बाज़ू जाने क्या कुछ मुझ से कहते रहते हैं जाने क्या कुछ उन से कहता रहता हूँ रात गए तक ज़ख़्मी ख़्वाहिशें बिस्तर की इक इक सिलवट से निकल निकल कर रोती हैं और सहर को उन के ख़ून से अपने हाथ भिगो लेता हूँ
Tabassum Kashmiri
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छटी बार जब मैं ने दरवाज़ा खोला तो इक चीख़ मेरे बदन के मसामों से चिमटी बदन के अँधेरों में उतरी मिरा जिस्म उस चीख़ के तुंद पंजों से झुलसी हुई बे-कराँ चीख़ था मैं लरज़ता हुआ कोहना गुम्बद से निकला और चीख़ मेरे बदन से सियाह घास की तरह निकली बदन के करोड़ों मसामों के मुँह पर सियाह चीख़ का सुर्ख़ जंगल उगा था कोई चीख़ अब भी उभरती थी जिस से गुम्बद के दीवार-ओ-दर काँपते थे कोई शय दिखाई नहीं दे रही थी फ़क़त इक धुआँ था जो गुम्बद के सूराख़ से अपने पाँव निकाले हवाओं के बे-दाग़ सीनों से चिमटा हुआ था सातवीं बार फिर मैं ने दरवाज़ा खोला तो मेरे लहू की हर इक बूँद में सातवीं बार फिर सरसराती हुई चीख़ गुज़री मैं ने देखा कि गुम्बद में मैली ज़मीं पर नज़्अ' की हालत में इक लाश है जिस ने अब सातवीं बार मेरे बदन में सातवीं चीख़ का गर्म लावा उतारा ये ज़वाल की आख़िरी सर्द चीख़ों की इक चीख़ थी
Tabassum Kashmiri
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अगर मुझ से मिलना है आओ मिलो तुम मगर याद रखना मैं इक़रार की मंज़िलें रास्ते ही में छोड़ आया हूँ अब मुझ से मिलना है तुम को तो इनकार की सरहदों पे मिलो झींगुरों मकड़ियों के जनाज़े मैं रस्ते पे छोड़ आया हूँ पुरानी कथाएँ मुझे खींचती हैं ज़मीं का ज़वाल आज ज़ंजीर-ए-पा बन रहा है ख़स-ओ-ख़ाक के सारे रिश्ते मैं ने हर शय को अब तज दिया है कोई मा'ज़रत भी नहीं है कि मैं मा'ज़रत के सभी झूटे लफ़्ज़ों को अपनी लुग़त से निकाल आया हूँ मैं इनकार के आसमानों पे फिरता हुआ मैं इनकार का विर्द करता हुआ मैं ज़मीनों पे और आसमानों की हर शय पे इनकार की सुर्ख़ मोहरें लगाता हुआ और दमा-दम की इक थाप पे मैं ने सातों ज़मीनों के सातों तबक़ आज रौशन किए हैं देखना आसमाँ रक़्स करने लगा है ज़मीनों के सारे ख़ज़ाने उबलने लगे हैं सारे दफ़ीने जड़ों से उखड़ कर मिरे सामने हाथ बाँधे खड़े हैं मेरी आवाज़ पर मछलियाँ पानियों से निकल आई हैं आज अर्ज़-ओ-समावात की सारी पोशीदा ख़बरें मैं सुनने लगा हूँ मैं ख़ुश हूँ मुझे आगही मिल गई है बदन के मसामों से अब आगही शो'ला बन कर चमकने लगी है अजब कश्फ़ की रौशनी है ज़मीं अपनी सत्ह से पाताल तक रौशनी में नहा कर शब-ए-अव्वलीं की दुल्हन की तरह आज शर्मा रही है ताज़ा हवाओं की दोशीज़गी सात रंगों में बरहना हुई है हयाओं की सुर्ख़ी से चेहरा कँवल है कि मेरी दुल्हन का बदन फूल है वो हवाओं के रंगों में डूबी हुई है हवाओं की दोशीज़गी सात रंगों में बरहना हुई है हर इक शय नक़ाब अपना उल्टे हुए है सभी भेद अपनी ज़बानें निकाले मिरे सामने आ गए हैं किताबों के औराक़ ख़ुद बोलते हैं ज़मीं आसमाँ की हर इक शय समुंदर हवाएँ ज़मीनों की सतहें सत्हों के नीचे सदियों के चेहरे पहाड़ों की बर्फ़ें बर्फ़ों के शोरीदा पानी सदियों के प्यासे समुंदर के साहिल दरख़्तों के पत्ते फूलों के चेहरे और रोज़-ओ-शब के सफ़ेद-ओ-सियाह सिलसिले हर इक शय मुझे अपने भेदों से असरार से आश्ना कर रही है अजब आशनाई की लज़्ज़त मिली है मैं इस आशनाई की लज़्ज़त से सरशार हो कर मुक़द्दस ज़मीं के पुराने दुखों को गले से लगा कर मैं इक़रार की मंज़िलें रास्ते ही में छोड़ आया हूँ मैं सारी पुरानी कथाएँ जला कर फ़क़त इक दमा-दम की आवाज़ पर रक़्स करता हुआ मैं इक़रार की सरहदों से परे आ गया हूँ अब मुझ से मिलना है तुम को तो आओ मिलो मगर याद रखना मैं इक़रार की दुश्मनी पर उतर आया हूँ अब मैं इनकार की सरहदों पे मिलूँगा
Tabassum Kashmiri
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यहाँ अब एक तारा ज़र्द तारा भी नहीं बाक़ी यहाँ अब आसमाँ के चीथडों की फड़फड़ाहट भी नहीं बाक़ी यहाँ पर सारे सूरज तारे सूरज तैरते अफ़्लाक से गिर कर किसी पाताल में गुम हैं यहाँ अब सारे सय्यारों की गर्दिश रुक गई है यहाँ अब रौशनी है और न आवाज़ों की लर्ज़िश है न जिस्मों में ही हरकत है यहाँ पर अब फ़क़त इक ख़ामुशी की फड़फड़ाहट है
Tabassum Kashmiri
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