ये तो बर्ज़ख़ है यहाँ वक़्त की ईजाद कहाँ इक बरस था कि महीना हमें अब याद कहाँ वही तपता हुआ गर्दूं वही अँगारा ज़मीं जा-ब-जा तिश्ना ओ आशुफ़्ता वही ख़ाक-नशीं शब-गराँ ज़ीस्त-गराँ-तर ही तो कर जाती थी सूद-ख़ोरों की तरह दर पे सहर आती थी ज़ीस्त करने की मशक़्क़त ही हमें क्या कम थी मुस्ताज़ाद उस पे पिरोहित का जुनून-ए-ताज़ा सब को मिल जाए गुनाहों का यहीं ख़म्याज़ा ना-रवा-दार फ़ज़ाओं की झुलसती हुई लू! मोहतसिब कितने निकल आए घरों से हर सू ताड़ते हैं किसी चेहरे पे तरावत तो नहीं कोई लब नम तो नहीं बशरे पे फ़रहत तो नहीं कूचा कूचा में निकाले हुए ख़ूनी दीदे गुर्ज़ उठाए हुए धमकाते फिरा करते हैं नौ-ए-आदम से बहर-तौर रिया के तालिब रूह बे-ज़ार है क्यूँँ छोड़ न जाए क़ालिब ज़िंदगी अपनी इसी तौर जो गुज़री 'ग़ालिब' हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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उठो हिन्द के बाग़बानो उठो उठो इंक़िलाबी जवानो उठो किसानों उठो काम-गारो उठो नई ज़िंदगी के शरारो उठो उठो खेलते अपनी ज़ंजीर से उठो ख़ाक-ए-बंगाल-ओ-कश्मीर से उठो वादी ओ दश्त ओ कोहसार से उठो सिंध ओ पंजाब ओ मल्बार से उठो मालवे और मेवात से महाराष्ट्र और गुजरात से अवध के चमन से चहकते उठो गुलों की तरह से महकते उठो उठो खुल गया परचम-ए-इंक़लाब निकलता है जिस तरह से आफ़्ताब उठो जैसे दरिया में उठती है मौज उठो जैसे आँधी की बढ़ती है फ़ौज उठो बर्क़ की तरह हँसते हुए कड़कते गरजते बरसते हुए ग़ुलामी की ज़ंजीर को तोड़ दो ज़माने की रफ़्तार को मोड़ दो
Ali Sardar Jafri
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं
Divya 'Kumar Sahab'
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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कितने बख़्त वाले हो ज़िंदगी में जो चाहा तुम ने पा लिया आख़िर अज़्म और हिम्मत से फ़ह्म से ज़कावत से है तुम्हारे दामन में फूल कामरानी का और तुम्हारे माथे पर फ़ख़्र का सितारा है अब तुम्हारे चेहरे पर ऐसी शादमानी है कोई कह नहीं सकता दर्द से भी वाक़िफ़ हो और तुम्हारे पाँव में देर से खटकता है आरज़ू का इक काँटा जिस से ख़ून रिसता है लाला-ज़ार राहों पर इस लहू की सुर्ख़ी की काँपती लकीरें हैं इन लहू के धब्बों में ना-तमाम मुबहम सी एक बात लिखी है
Fahmida Riaz
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ज़बानों के रस में ये कैसी महक है ये बोसा कि जिस से मोहब्बत की सहबा की उड़ती है ख़ुश्बू ये बद-मस्त ख़ुश्बू जो गहरा ग़ुनूदा नशा ला रही है ये कैसा नशा है मेरे ज़ेहन के रेज़े रेज़े में एक आँख सी खुल गई है तुम अपनी ज़बाँ मेरे मुँह में रखे जैसे पाताल से मेरी जाँ खींचते हो ये भीगा हुआ गर्म ओ तारीक बोसा अमावस की काली बरसती हुई रात जैसे उमड़ती चली आ रही है कहीं कोई साअत अज़ल से रमीदा मिरी रूह के दश्त में उड़ रही थी वो साअत क़रीं-तर चली आ रही है मुझे ऐसा लगता है तारीकियों के लरज़ते हुए पुल को मैं पार करती चली जा रही हूँ ये पुल ख़त्म होने को है और अब उस के आगे कहीं रौशनी है
Fahmida Riaz
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दिल्ली! तिरी छाँव बड़ी क़हरी मिरी पूरी काया पिघल रही मुझे गले लगा कर गली गली धीरे से कहे'' तू कौन है री?'' मैं कौन हूँ माँ तिरी जाई हूँ पर भेस नए से आई हूँ मैं रमती पहुँची अपनों तक पर प्रीत पराई लाई हूँ तारीख़ की घोर गुफाओं में शायद पाए पहचान मिरी था बीज में देस का प्यार घुला परदेस में क्या क्या बेल चढ़ी नस नस में लहू तो तेरा है पर आँसू मेरे अपने हैं होंटों पर रही तिरी बोली पर नैन में सिंध के सपने हैं मन माटी जमुना घाट की थी पर समझ ज़रा उस की धड़कन इस में कारूंझर की सिसकी इस में हो के डालता चलतन! तिरे आँगन मीठा कुआँ हँसे क्या फल पाए मिरा मन रोगी इक रीत नगर से मोह मिरा बसते हैं जहाँ प्यासे जोगी तिरा मुझ से कोख का नाता है मिरे मन की पीड़ा जान ज़रा वो रूप दिखाऊँ तुझे कैसे जिस पर सब तन मन वार दिया क्या गीत हैं वो कोह-यारों के क्या घाइल उन की बानी है क्या लाज रंगी वो फटी चादर जो थर्की तपत ने तानी है वो घाव घाव तन उन के पर नस नस में अग्नी दहकी वो बाट घिरी संगीनों से और झपट शिकारी कुत्तों की हैं जिन के हाथ पर अँगारे मैं उन बंजारों की चीरी माँ उन के आगे कोस कड़े और सर पे कड़कती दो-पहरी मैं बंदी बाँधूँ की बाँदी वो बंदी-ख़ाने तोड़ेंगे है जिन हाथों में हाथ दिया सो सारी सलाख़ें मोड़ेंगे तू सदा सुहागन हो माँ री! मुझे अपनी तोड़ निभाना है री दिल्ली छू कर चरण तिरे मुझ को वापस मुड़ जाना है
Fahmida Riaz
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लाओ हाथ अपना लाओ ज़रा छू के मेरा बदन अपने बच्चे के दिल का धड़कना सुनो नाफ़ के उस तरफ़ उस की जुम्बिश को महसूस करते हो तुम बस यहीं छोड़ दो थोड़ी देर और उस हाथ को मेरे ठंडे बदन पर यहीं छोड़ दो मेरे बे-कल नफ़स को क़रार आ गया मेरे ईसा मिरे दर्द के चारा-गर मेरा हर मू-ए-तन उस हथेली से तस्कीन पाने लगा उस हथेली के नीचे मिरा लाल करवट सी लेने लगा उँगलियों से बदन उस का पहचान लो तुम उसे जान लो चूमने दो मुझे अपनी ये उँगलियाँ उन की हर पोर को चूमने दो मुझे नाख़ुनों को लबों से लगा लूँ ज़रा फूल लाती हुई ये हरी उँगलियाँ मेरी आँखों से आँसू उबलते हुए उन से सींचूँगी में फूल लाती हुई उँगलियों की जड़ें चूमने दो मुझे अपने बाल अपने माथे का चाँद अपने लब ये चमकती हुई काली आँखें मिरे काँपते होंट मेरी छलकती हुई आँख को देख कर कितनी हैरान हैं तुम को मा'लूम क्या तुम को मा'लूम क्या तुम ने जाने मुझे क्या से क्या कर दिया मेरे अंदर अँधेरे का आसेब था या कराँ ता कराँ एक अनमिट ख़ला यूँँही फिरती थी मैं ज़ीस्त के ज़ाइक़े को तरसती हुई दिल में आँसू भरे सब पे हँसती हुई तुम ने अंदर मिरा इस तरह भर दिया फूटती है मिरे जिस्म से रौशनी सब मुक़द्दस किताबें जो नाज़िल हुईं सब पयम्बर जो अब तक उतारे गए सब फ़रिश्ते कि हैं बादलों से परे रंग संगीत सर फूल कलियाँ शजर सुब्ह-दम पेड़ की झूमती डालियाँ उन के मफ़्हूम जो भी बताए गए ख़ाक पर बसने वाले बशर को मसर्रत के जितने भी नग़्में सुनाए गए सब ऋषी सब मुनी अंबिया औलिया ख़ैर के देवता हुस्न नेकी ख़ुदा आज सब पर मुझे ए'तिबार आ गया ए'तिबार आ गया
Fahmida Riaz
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रणभूमी में लड़ते लड़ते मैं ने कितने साल इक दिन जल में छाया देखी चट्टे हो गए बाल पापड़ जैसी हुईं हड्डियाँ जलने लगे हैं दाँत जगह जगह झुर्रियों से भर गई सारे तन की खाल देख के अपना हाल हुआ फिर उस को बहुत मलाल अरे मैं बुढ़िया हो जाऊँगी आया न था ख़याल उस ने सोचा गर फिर से मिल जाए जवानी जिस को लिखते हैं दीवानी और मस्तानी जिस में उस ने इंक़लाब लाने की ठानी वही जवानी अब की बार नहीं दूँगी कोई क़ुर्बानी बस ला-हौल पढ़ूँगी और नहीं दूँगी कोई क़ुर्बानी दिल ने कहा किस सोच में है ऐ पागल बढ़िया कहाँ जवानी या'नी उस को गुज़रे अब तक काफ़ी अर्सा बीत चुका है ये ख़याल भी देर से आया बस अब घर जा बुढ़िया ने कब उस की मानी हालाँकि अब वो है नानी ज़ाहिर है अब और वो कर भी क्या सकती थी आसमान पर लेकिन तारे आँख-मिचोली खेल रहे थे रात के पंछी बोल रहे थे और कहते थे ये शायद उस की आदत है या शायद उस की फ़ितरत है
Fahmida Riaz
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