nazmKuch Alfaaz

कभी ख़ुश्क मौसम में पुर्वा जो चलती तो बंजर पहाड़ों घने गर्द-आलूद शहरों से कतरा के हम तक पहुँचती हमें तुंद यादों के गिर्दाब मैं डूबते और उभरते हुए देख कर हम से कहती मैं उन सब के जिस्मों से मस हो के आई हूँ उन के पसीने की ख़ुश्बू को अपने लिबादे में भर कर हथेली पे रख कर मैं लाई हूँ कभी सुर्ख़ सूरज निकलता तो हम उस से कहते तुम्हारी दहकती हुई आँख का राज़ क्या है वो कहता मैं इन सब की आँखों के ग़ुर्फों से ये सारी उजली तमाज़त चुराता रहा हूँ मैं दरयूज़ा-गर उन चराग़ों से ख़ुद को जलाता रहा हूँ उन्हें हम ने ढूँडा कभी सब्ज़ शबनम के छींटों में तारों की रोती हुई अंजुमन मैं कभी सुब्ह की क़त्ल-गाह शब के घाइल बदन में उन्हें हम ने आवाज़ दी कू-ब-कू ग़म में डूबी हुई बस्तियों से अटे ख़ाक-दान-ए-वतन में मगर वो नहीं थे कहीं भी नहीं थे कहीं उन के क़दमों की हल्की सी आवाज़ तक भी नहीं थी फिर इक रोज़ धरती का मौसम जो बदला तो बादल ने शानों से हम को हिला कर जगाया कहा उन के आने का पैग़ाम आया चहकते परिंदों ने शाख़ों से उड़ कर हवाओं में इक दायरा सा बनाया कहा उन के आने का पैग़ाम आया धनक सात रंगों में लिपटी हुई इक कमाँ बन के ज़ाहिर हुई हम से कहने लगी अपनी आँखों से देखा है मैं ने उन्हें तेज़ क़दमों से आते हुए शाम हँसने लगी उस की आँखों में ख़ुशियों के आँसू थे आरिज़ पे शबनम नगीनों की सूरत चमकने लगी थी

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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अजीब है ये सिलसिला ये सिलसिला अजीब है हवा चले तो खेतियों में धूम चहचहों की है हवा रुके तो मुर्दनी है मुर्दनी की राख का नुज़ूल है कहाँ है तू कहाँ है तू कहाँ नहीं है तू बता अभी था तेरे गिरते उड़ते आँचलों का सिलसिला और अब उफ़ुक़ पर दूर तक गए दिनों की धूल है गए दिनों की धूल का ये सिलसिला फ़ुज़ूल है मैं रो सकूँ तो क्या ये गदली काएनात धुल सकेगी मेरे आँसुओं के झाग से मैं मुस्कुरा सकूँ तो क्या सफ़र की ख़स्तगी को भूल कर ये कारवाँ नुजूम के बरस पड़ेंगे मोतिए के फूल बन के इस मुहीब कासा-ए-हयात में न तू सुने न मैं कहूँ न मेरे अंग अंग से सदा उठे यूँँ ही मैं आँसुओं को क़हक़हों को अपने दिल में दफ़न कर के गुम लबों पे सिल धरे तिरे नगर में पा-पियादा पा-बरहना शाम के फ़िशार तक रवाँ रहूँ मगर कभी तिरी नज़र के आस्ताँ को पार तक न कर सकूँ कि तू अज़ल से ता-अबद हज़ार सद हज़ार आँख वाले वक़्त की नक़ीब है ये सिलसिला अजीब है ये सिलसिला अजीब है

Wazir Agha

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कभी हवा इक झोंका है जो दीवारों को फाँद के अक्सर हल्की सी एक चाप में ढल कर सहन में फिरता रहता है कभी हवा इक सरगोशी है जो खिड़की से लग कर पहरों ख़ुद से बातें करती है कभी हवा वो मौज-ए-सबा है जिस के पहले ही बोसे पर नन्ही मुन्नी कलियों की निन्दिया से बोझल सूजी आँखें खुल जाती हैं कभी हवा अब कैसे बताएँ हवा के रूप तो लाखों हैं पर उस का वो इक रूप तुझे भी याद तो होगा जब सन्नाटे पोरी पोरी टूट गिरे थे चाप के पाँव उखड़ गए थे सरगोशी पर कितनी चीख़ें झपट पड़ी थीं और फूलों की आँखों से शबनम की बूँदें फ़र्श-ए-ज़मीं पर चारों जानिब बिखर गई थीं

Wazir Agha

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चली कब हवा कब मिटा नक़्श-ए-पा कब गिरी रेत की वो रिदा जिस में छुपते हुए तू ने मुझ से कहा आगे बढ़ आगे बढ़ता ही जा मुड़ के तकने का अब फ़ाएदा कोई चेहरा कोई चाप माज़ी की कोई सदा कुछ नहीं अब ऐ गले के तन्हा मुहाफ़िज़ तिरा अब मुहाफ़िज़ ख़ुदा मेरे होंटों पे कफ़ मेरे रा'शा-ज़दा बाज़ुओं से लटकती हुई गोश्त की धज्जियाँ और लाखों बरस का बुढ़ापा जो मुझ में समा कर हुमकने लगा मुझ को माज़ी से कटने का कुछ डर नहीं अपने हम-ज़ाद को रू-ब-रू पा के मैं ग़म-ज़दा भी नहीं ये असा झुकते शानों पे काली अबा और गले के चलने का पैहम सदा अब यही मेरी क़िस्मत यही आसरा

Wazir Agha

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चुना हम ने पहाड़ी रास्ता और सम्त का भारी सलासिल तोड़ कर सम्तों की नैरंगी से हम वाक़िफ़ हुए उभरी चट्टानों से लुढ़कने घाटियों से करवटें लेने की इक बिगड़ी रविश हम ने भी अपनाई खड्डों की तह में बहते पानियों से हम ने चलने का चलन सीखा दरख़्तों और फूलों से क़तारें तोड़ने की और हवा से मुँह उठा कर अपनी मर्ज़ी से कई सम्तों में बे-आराम होने की अदा सीखी ज़माँ से हम ने सीखा सब ज़मानों में रवाँ होना हमें रास आ गया कोसों में चलना उफ़ुक़ की सुरमई मेहराब पर नज़रें जमाए किसी सीधी सड़क पर दूर इक बस्ती के सीने से लगे बरसों पुराने हिचकियाँ लेते मकाँ की और जाने का जुनूँ मद्धम पड़ा हम बट गए चीढ़ों की शाख़ों से उतरती कतरनों में चुना हम ने पहाड़ी रास्ता

Wazir Agha

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फ़क़त अपने होने का एलान मैं ने किया पर न सोचा कहाँ से चला था कहाँ आ के ठहरा मैं किस मंज़िल-ए-बे-निशाँ की तरफ़ अब रवाँ हूँ मुझे ख़ुश्क बद-रंग चमड़े पे लिक्खे सवालों से रग़बत नहीं थी मैं मंतिक़ की वर्ज़िश से ख़ुद को थकाना नहीं चाहता था फ़क़त अपने होने का एलान मैं ने किया और देखा फ़लक की सियह गहरी सूखी हुई बाउली से करोड़ों सितारे शुआ'ओं की बे-सम्त बे-लफ़्ज़ गूँगी ज़बाँ में लरज़ते लबों से न होने के मुंकिर थे होने का एलान करते चले जा रहे थे फ़क़त अपने होने का एलान मैं ने किया और बेताब फूलों से सावन के झूलों से चिड़ियों के लोरी से हर ज़िंदा हस्ती के साँसों की डोरी से आवाज़ आई मुझे अपने होने का हक़्क़-उल-यक़ीं है मैं एलान करती हूँ अपना अजब सिलसिला था करोड़ों बरस की मसाफ़त पे फैला हुआ सारा आलम सदाओं की लहरों की इक चीख़ती नश्र-गह बन चुका था फ़क़त अपने होने का एलान करता चला जा रहा था ये एलान किस के लिए था तुझे क्या ख़बर है तू इस नश्र-गह का फ़क़त एक अदना मुलाज़िम तू कुछ भी नहीं जानता है

Wazir Agha

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