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आँखें तुम्हारी बहुत ख़ूब-सूरत हैं आँखें तुम्हारी बना दो इन्हें आज क़िस्मत हमारी इन्हीं की बदौलत जहाँ में ख़ुशी है इन्हीं की बदौलत यहाँ रौशनी है अगर देख लें ये परेशाँ जिगर को तो हो जाए फ़ारिग़ वो दिल उम्र-भर को ख़ुदा ने भी इन की नज़र है उतारी बहुत ख़ूब-सूरत हैं आँखें तुम्हारी बना दो इन्हें आज क़िस्मत हमारी है कितनी मोहब्बत इन आँखों से हम को अगर पास आओ तो बतलाएँ तुम को इन आँखों के दम से ही ज़िंदा हैं हम तो बिना इन के फाँसी का फंदा हैं हम तो इन्हें देखते रोक कर सब सवारी बहुत ख़ूब-सूरत हैं आँखें तुम्हारी बना दो इन्हें आज क़िस्मत हमारी यही कह रहे हैं ये चंदा सितारे तुम्हारी निगाहें हैं आलू बुखारे कोई देख कर कैसे ख़ुद को संभाले इन्हें क्यूँँ न वो दिल में अपने बसा ले इन आँखों की करते हैं पूजा पुजारी बहुत ख़ूब-सूरत हैं आँखें तुम्हारी बना दो इन्हें आज क़िस्मत हमारी

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"जब पापा पापा कहते थे" जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे जब पापा हम ने कहवाई जाँ फट के गले में है आई तब हँसते गाते फिरते थे अब मारे मारे फिरते हैं न ही कुछ खोने का डर था तब न ही कुछ पाने की इच्छा थी तब मन में जहाँ भी आता था वहीं पे रोया करते थे हम रोने के लिए भी अब हम को जा बुक करवानी पड़ती है जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे स्कूल को हम तुम जाते थे तब ज़ेब में पैसे रहते थे अब हाथ सभी के ख़ाली हैं कैसी यार अब की पढ़ाई है वो पीठ पे बोझ किताबों का और जेब में कंचे रहते थे जब स्कूल से घर आते थे तो चाॅक चुरा कर लाते थे गिल्ली डंडा ले ले कर रोज़ हम गलियों गलियों फिरते थे जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे याद आता है वो दौर हमें दादी के आँचल में छुपते थे मम्मी को झूट बताते थे पापा को झूट बताते थे फिर होती ख़ूब पिटाई थी हम अक्कड़ बक्कड़ करते थे खुट्टल बुट्टल भी करते थे जिस सेे भी लड़ाई होती थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे नाना नानी मौसा मौसी मेहमान जो घर में आते थे उन की ज़ेब से पैसे चुराते थे उन के बैग से चीज़ चुराते थे वो बचपन याद आता है जब बारिश में भीगा करते थे काग़ज़ की नाव बना कर ख़ूब आँगन में हम ने चलाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे मम्मी की आँखों में रहते ओझल न कहीं फिर होते थे मम्मी पापा के हिस्से की हर चीज़ हमीं ने खाई थी पापा की गोदी में रहते हम रोज़ दुकानों पर जाते फिर चीज़ वही मिलती हम को उँगली जिस पर भी उठाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे वो दिन याद आते हैं हम को जब सबके दिलों में रहते थे बचपन का फ़साना याद आया अब आँख मिरी भर आई है

Prashant Kumar

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"मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है" तू सब सेे जुदा है तू सब सेे हसीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है ज़माने में तुझ सेा न कोई कहीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे देख कर ही निकलता है सूरज तुझे देख कर रोज़ ढलता है सूरज तू इक बा-वज़ू अप्सरा है मिरी जाँ ख़ुदा भी तो तुझ पे फ़िदा है मिरी जाँ तुझी से मोहब्बत करेगा यक़ीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे काम सब छोड़ कर देखते हैं बिना बात के फूल भी फेंकते हैं कि मुम्ताज़ भी तेरे जैसी नहीं है यहाँ एक तू ही महा-सुंदरी है बहुत ख़ूब-सूरत है ज़ोहरा-जबीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है

Prashant Kumar

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"तू वही लड़की है मैं भी वही लड़का हूँ" क्या याद है गोरी बचपन में दिल तू ने रखा था अचकन में दिल तुझ सेे मैं ने माँगा था फिर ठेंगा तू ने दिखाया था तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ दिल धड़कन एक मिनट में सब आपस में जितनी बार मिले हम दोनों भी इक दूजे से इक दिन में उतनी बार मिले जब मुझ सेे ग़लती होती थी तू पागल कह के चिढ़ाती थी पीछे से दुबारा आती थी तू छेड़ के मुझ को जाती थी पर जब लगती थी चोट मुझे तू दूर से रोने लगती थी जल्दी से भाग के आती थी सीने से मुझ को लगाती थी कहती थी सॉरी कान पकड़ तू दारू दवा सब करती थी तू साथ में मेरे खेली है मैं साथ में तेरे खेला हूँ तू लड़की हाई-फाई है और मैं लड़का अलबेला हूँ तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ मैं रोज़ तिरे घर आता था तू रोज़ मिरे घर आती थी स्कूल को दोनों जाते थे तू मुझ को रोज़ बुलाती थी तू मुझ को घर पे पढ़ाती थी और हाथों से लिखवाती थी कितनी शैतानी करता था तू कान पकड़ के रखती थी मैं आँख से ओझल होता था फिर तू भी डरने लगती थी तू मुझ को ढूँढती थी सब में तू मुझ को देखती थी सब में तू जान बताती थी मुझ को हाथों से खिलाती थी मुझ को मैं शाम सवेरे जान-ए-मन तेरी गोदी में सोया हूँ तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ

Prashant Kumar

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"हार्ट अटैक तू लावेगी" जो टॉप पहन के आएगी तो क़हर क़सम से ढाएगी यूँँ तंग क़बा में आवेगी फिर बिजली ख़ूब गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी झुक के रूमाल उठाएगी एकाध को तू टपकाएगी जो ऐसे पेट दिखाएगी तो दिल की नींव हिलाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी यूँँ देखके तू मुस्काएगी तो झगड़ा सब में कराएगी तू हम को भी मरवाएगी तू हम को भी मरवाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी जो हम सेे हाथ मिलाएगी तो दिल के तार भिड़ाएगी तू तन में आग लगाएगी हम को तू मार गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी

Prashant Kumar

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“ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ” ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ ख़्वाब में तुझ को बाल बनाते छत पर देखा करता हूँ तेरी गली के बच्चों में फिर मैं भी खेला करता हूँ छत पर आने की मैं तुझ सेे रोज़ गुज़ारिश करता हूँ हाल-ए-दिल भी काग़ज़ पर लिख लिख के फेंका करता हूँ आज भी तेरी गलियों में मैं रास रचाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ लट बिखराकर एक तरफ़ तू मुझ को देखा करती है आँख दिखाया करती है सब घर हैं बताया करती है जल्दी से फिर काग़ज़ तू घूँघट में छुपाया करती है मेरे लिए और ग़ुस्से में तू चाँट दिखाया करती है ग़ुस्सा अच्छा लगता है ग़ुस्सा दिलवाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ ख़्वाब-नगर की राज-कुमारी दिल में मुझ को रहने दे इश्क़ का दरिया दिल के साथ निगाहों से भी बहने दे तेरा दिल जो भी कहता है रोक न उस को कहने दे तेरा ग़म मेरा भी ग़म है साथ में मिल के सहने दे ख़्वाबों ही ख़्वाबों में तेरा दिल धड़काने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ तेरी निगाहें सुर की देवी छेड़ दें पल में साज़ अभी ये चाहे तो बदल के रख दें शाइ'र का अंदाज़ अभी आँखों ही आँखों में छुपाए तू ने दिल के राज़ अभी इश्क़ मोहब्बत का जल्दी से कर दे तू आग़ाज़ अभी मैं भी इतनी दूर से तुझ पर जान लुटाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ बात तो सुन ख़ातून मिरी ये दिल है मेरा प्रेम-नगर मैं तो अभी आ जाऊँ रहने कह दे तू इक बार अगर तू हो मेरे साथ अगर तो चाँद पे भी कर लूँगा घर तेरे बिना लगता है अधूरा इश्क़ मोहब्बत का ये सफ़र इस दुनिया में मैं तुझ सेे ही ब्याह रचाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ

Prashant Kumar

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