nazmKuch Alfaaz

आई जब उन की याद तो आती चली गई हर नक़्श-ए-मा-सिवा को मिटाती चली गई हर मंज़र-ए-जमाल दिखाती चली गई जैसे उन्हीं को सामने लाती चली गई हर वाक़िआ' क़रीब-तर आता चला गया हर शय हसीन-तर नज़र आती चली गई वीराना-ए-हयात के एक एक गोशे में जोगन कोई सितार बजाती चली गई दिल फुंक रहा था आतिश-ए-ज़ब्त-ए-फ़िराक़ से दीपक को मय-गुसार बनाती चली गई बे-हर्फ़ ओ बे-हिकायत ओ बे-साज़ ओ बे-सदा रग रग में नग़्मा बन के समाती चली गई जितना ही कुछ सुकून सा आता चला गया उतना ही बे-क़रार बनाती चली गई कैफ़िय्यतों को होश सा आता चला गया बे-कैफ़ियों को नींद सी आती चली गई क्या क्या न हुस्न-ए-यार से शिकवे थे इश्क़ को क्या क्या न शर्मसार बनाती चली गई तफ़रीक़-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का झगड़ा नहीं रहा तमईज़-ए-क़ुर्ब-ओ-बोद मिटाती चली गई मैं तिश्ना-काम-ए-शौक़ था पीता चला गया वो मस्त अँखड़ियों से पिलाती चली गई इक हुस्न-ए-बे-जिहत की फ़ज़ा-ए-बसीत में उड़ती गई मुझे भी उड़ाती चली गई फिर मैं हूँ और इश्क़ की बेताबियाँ 'जिगर' अच्छा हुआ वो नींद की माती चली गई

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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रात रात बड़ी ख़राब है हर रात ख़राब कर देती है रात भर जाग कर हर सुब्ह, सुब्ह को दे देती है कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब कुछ गुज़री रातों के क़िस्से कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक और सिरहाने पर माज़ी के खारे धब्बे रात बड़ी ख़राब है दिन भर के मुरझाए ज़ख़्मों को फिर हरा कर देती है और महकने देती है रात भर किसी रात रानी की तरह मौका देती है कि सम्भल जाऊँ मैं और फिर ले जाती है अपने साथ पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर रात.. बड़ी ख़राब है पर, एक रात ही तो है जो साथ होती है रात भर ख़ामोशी से सुनती है मेरी हर ख़ामोशी को समझती है मेरी हर बात को मेरी हर रात को रात

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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"भूल जाऊँगा?" मोहब्बत के सारे सितम भूल जाऊँगा? बे-असर से ज़ख़्मों के मरहम भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे के तुझ को मैं मेरे सनम भूल जाऊँगा तेरा लहरों सा चलना ज़ेहन में बसा है उन आँखों की कैसे शरम भूल जाऊँगा? चलो ना होश रहा के शुरुआत कैसे हुई कैसे कब हुआ मैं ख़तम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे तेरी पायल का शोर जैसे शहनाई कोई जो पाक़ लगे वो क़दम भूल जाऊँगा? वो सादग़ी तेरी जो नज़रें तक ना मिलीं हँसकर सह गया जो मैं ग़म भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे हम जुदा नहीं बस फ़ासले दौरानियाँ हैं तुझे याद कर हर जनम भूल जाऊँगा? प्यार मिलता नहीं जीते जी ये सुना है मैं बेहोशी में ये भरम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे

Rohit tewatia 'Ishq'

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"बचपन" मैं जब छोटा था मैं ने चलना ना सीखा था मेरी हर बात सच्ची थी मेरा हर लफ्ज़ माँ था मेरा बिस्तर बाप का कांधा था मेरा साथी भाई था जो घर का आँगन था वो मेरी दुनिया था जो माँ के कदम थे वो मेरी जन्नत थे अब होश जब सँभाला है याद फिर वही सब आया है कितने अच्छे थे साथ थे दिल में उन्हे खोने का मलाल आया है माज़ी के वर्क़ो पर इत्र का साया है मेरी आँखों मैं वही मंज़र पुराना है मौका मिले किस्मत से तो वही बचपन दोहराना है

ALI ZUHRI

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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बंगाल की मैं शाम-ओ-सहर देख रहा हूँ हर चंद कि हूँ दूर मगर देख रहा हूँ इफ़्लास की मारी हुई मख़्लूक़ सर-ए-राह बे-गोर-ओ-कफ़न ख़ाक-ब-सर देख रहा हूँ बच्चों का तड़पना वो बिलकना वो सिसकना माँ-बाप की मायूस नज़र देख रहा हूँ इंसान के होते हुए इंसान का ये हश्र देखा नहीं जाता है मगर देख रहा हूँ रहमत का चमकने को है फिर नय्यर-ए-ताबाँ होने को है इस शब की सहर देख रहा हूँ ख़ामोश निगाहों में उमँडते हुए जज़्बात जज़्बात में तूफ़ान-ए-शरर देख रहा हूँ बेदारी-ए-एहसास है हर सम्त नुमायाँ बे-ताबी-ए-अर्बाब-ए-नज़र देख रहा हूँ अंजाम-ए-सितम अब कोई देखे कि न देखे मैं साफ़ उन आँखों से मगर देख रहा हूँ सय्याद ने लूटा था अनादिल का नशेमन सय्याद का जलते हुए घर देख रहा हूँ इक तेग़ की जुम्बिश सी नज़र आती है मुझ को इक हाथ पस-ए-पर्दा-ए-दर देख रहा हूँ

Jigar Moradabadi

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वही है शोर-ए-हाए-ओ-हू, वही हुजूम-ए-मर्द-ओ-ज़न मगर वो हुस्न-ए-ज़िंदगी, मगर वो जन्नत-ए-वतन वही ज़मीं, वहीं ज़माँ, वही मकीं, वही मकाँ मगर सुरूर-ए-यक-दिली, मगर नशात-ए-अंजुमन वही है शौक़-ए-नौ-ब-नौ, वही जमाल-ए-रंग-रंग मगर वो इस्मत-ए-नज़र, तहारत-ए-लब-ओ-दहन तरक़्क़ियों पे गरचे हैं, तमद्दुन-ओ-मुआशरत मगर वो हुस्न-ए-सादगी, वो सादगी का बाँकपन शराब-ए-नौ की मस्तियाँ, कि अल-हफ़ीज़-ओ-अल-अमाँ मगर वो इक लतीफ़ सा सुरूर-ए-बादा-ए-कुहन ये नग़्मा-ए-हयात है कि है अजल तराना-संज ये दौर-ए-काएनात है कि रक़्स में है अहरमन हज़ार-दर-हज़ार हैं अगरचे रहबरान-ए-मुल्क मगर वो पीर-ए-नौजवाँ, वो एक मर्द-ए-सफ़-शिकन वही महात्मा वही शहीद-ए-अम्न-ओ-आश्ती प्रेम जिस की ज़िंदगी, ख़ुलूस जिस का पैरहन वही सितारे हैं, मगर कहाँ वो माहताब-ए-हिन्द वही है अंजुमन, मगर कहाँ वो सद्र-ए-अंजुमन

Jigar Moradabadi

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पहले तो हुस्न-ए-अमल हुस्न-ए-यक़ीं पैदा कर फिर इसी ख़ाक से फ़िरदौस-ए-बरीं पैदा कर यही दुनिया कि जो बुत-ख़ाना बनी जाती है इसी बुत-ख़ाने से काबे की ज़मीं पैदा कर रूह-ए-आदम निगराँ कब से है तेरी जानिब उठ और इक जन्नत-ए-जावेद यहीं पैदा कर ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-तवहहुम को जला कर रख दे या'नी आतिश-कदा-ए-सोज़-ए-यक़ीं पैदा कर ग़म मुयस्सर है तो इस को ग़म-ए-कौनैन बना दिल हसीं है तो मोहब्बत भी हसीं पैदा कर आसमाँ मरकज़-ए-तख़्ईल-ओ-तसव्वुर कब तक आसमाँ जिस से ख़जिल हो वो ज़मीं पैदा कर दिल के हर क़तरे में तूफ़ान-ए-तजल्ली भर दे बत्न-ए-हर-ज़र्रा से इक महर-ए-मुबीं पैदा कर बंदगी यूँँ तो है इंसान की फ़ितरत लेकिन नाज़ जिस पे करें सज्दे वो जबीं पैदा कर पस्ती-ए-ख़ाक पे कब तक तिरी बे-बाल-ओ-परी फिर मक़ाम अपना सर-ए-अर्श-ए-बरीं पैदा कर इश्क़ ही ज़िंदा ओ पाइंदा हक़ीक़त है 'जिगर' इश्क़ को आम बना ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा कर

Jigar Moradabadi

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वो कब के आए भी और गए भी नज़र में अब तक समा रहे हैं ये चल रहे हैं, वो फिर रहे हैं, ये आ रहे हैं वो जा रहे हैं वही क़यामत है कद्द-ए-बाला वही है सूरत, वही सरापा लबों को जुम्बिश, निगह को लर्ज़िश, खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैं वही लताफ़त, वही नज़ाकत, वही तबस्सुम, वही तरन्नुम मैं नक़्श-ए-हिरमाँ बना हुआ था वो नक़्श-ए-हैरत बना रहे हैं ख़िराम रंगीं, निज़ाम रंगीं, कलाम रंगीं, पयाम रंगीं क़दम क़दम पर, रविश रविश पर नए नए गुल खिला रहे हैं शबाब रंगीं, जमाल रंगीं, वो सर से पा तक तमाम रंगीं तमाम रंगीं बने हुए हैं, तमाम रंगीं बना रहे हैं तमाम रानाइयों के मज़हर, तमाम रंगीनियों के मंज़र सँभल सँभल कर सिमट सिमट कर सब एक मरकज़ पर आ रहे हैं बहार-ए-रंग-ओ-शबाब ही क्या सितारा ओ माहताब ही क्या तमाम हस्ती झुकी हुई है, जिधर वो नज़रें झुका रहे हैं तुयूर सरशार-ए-साग़र-ए-मुल हलाक-ए-तनवीर-ए-लाला-ओ-गुल सब अपनी अपनी धुनों में मिल कर अजब अजब गीत गा रहे हैं शराब आँखों से ढल रही है, नज़र से मस्ती उबल रही है छलक रही है उछल रही है, पिए हुए हैं पिला रहे हैं ख़ुद अपने नश्शे में झूमते हैं, वो अपना मुँह आप चूमते हैं ख़राब-ए-मस्ती बने हुए हैं, हलाक-ए-मस्ती बना रहे हैं फ़ज़ा से नश्शा बरस रहा है, दिमाग़ फूलों में बस रहा है वो कौन है जो तरस रहा है? सभी को मय-कश पिला रहे हैं ज़मीन नश्शा, ज़मान नश्शा, जहान नश्शा, मकान नश्शा मकान क्या? ला-मकान नश्शा, डुबो रहे हैं पिला रहे हैं वो रू-ए-रंगीं ओ माैजा-ए-यम, कि जैसे दामान-ए-गुल पे शबनम ये गरमी-ए-हुस्न का है आलम, अरक़ अरक़ में नहा रहे हैं ये मस्त बुलबुल बहक रहे हैं, क़रीब-ए-आरिज़ चहक रहे है गुलों की छाती धड़क रही है, वो दस्त-ए-रंगीं बढ़ा रहे हैं ये मौज-ओ-दरिया, ये रेग-ओ-सहरा ये ग़ुंचा-ओ-गुल, ये माह-ओ-अंजुम ज़रा जो वो मुस्कुरा दिए हैं वो सब के सब मुस्कुरा रहे हैं फ़ज़ा ये नग़्मों से भर गई है कि मौज-ए-दरिया ठहर गई है सुकूत-ए-नग़्मा बना हुआ है, वो जैसे कुछ गुनगुना रहे हैं अब आगे जो कुछ भी हो मुक़द्दर, रहेगा लेकिन ये नक़्श दिल पर हम उन का दामन पकड़ रहे हैं, वो अपना दामन छुड़ा रहे हैं ये अश्क जो बह रहे हैं पैहम, अगरचे सब हैं ये हासिल-ए-ग़म मगर ये मालूम हो रहा है, कि ये भी कुछ मुस्कुरा रहे हैं ज़रा जो दम भर को आँख झपकी, ये देखता हूँ नई तजल्ली तिलिस्म सूरत मिटा रहे हैं, जमाल मअ'नी बना रहे हैं ख़ुशी से लबरेज़ शश-जिहत है, ज़बान पर शोर-ए-तहनियत है ये वक़्त वो है 'जिगर' के दिल को वो अपने दिल से मिला रहे हैं

Jigar Moradabadi

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अपना ही सा ऐ नर्गिस-ए-मस्ताना बना दे मैं जब तुझे जानूँ मुझे दीवाना बना दे हर क़ैद से हर रस्म से बेगाना बना दे दीवाना बना दे मुझे दीवाना बना दे इक बर्क़-ए-अदा ख़िर्मन-ए-हस्ती पे गिरा कर नज़रों को मिरी तूर का अफ़्साना बना दे हर दिल है तिरी बज़्म में लबरेज़-ए-मय-ए-इश्क़ इक और भी पैमाना से पैमाना बना दे तू साक़ी-ए-मय-ख़ाना भी तू नश्शा ओ मय भी मैं तिश्ना-ए-हस्ती मुझे मस्ताना बना दे अल्लाह ने तुझ को मय ओ मय-ख़ाना बनाया तू सारी फ़ज़ा को मय ओ मय-ख़ाना बना दे तू साक़ी-ए-मय-ख़ाना है मैं रिंद-ए-बला-नोश मेरे लिए मय-ख़ाने को पैमाना बना दे या दीदा-ओ-दिल में मिरे तू आप समा जा या फिर दिल-ओ-दीदा ही को वीराना बना दे क़तरे में वो दरिया है जो आलम को डुबो दे ज़र्रे में वो सहरा है कि दीवाना बना दे लेकिन मुझे हर क़ैद-ए-तअय्युन से बचा कर जो चाहे वो ऐ नर्गिस-ए-मस्ताना बना दे आलम तो है दीवाना जिगर! हुस्न की ख़ातिर तू अपने लिए हुस्न को दीवाना बना दे कब तक निगह-ए-यार न होगी मुतबस्सिम तू अपना हर अंदाज़ हरीफ़ाना बना दे मुंकिर तू न बन हुस्न के एजाज़-ए-नज़र का कहने के लिए अपने को बेगाना बना दे जब तक करम-ए-ख़ास का दरिया न उमँड आए तू और भी हाल अपना सफ़ीहाना बना दे बुत-ख़ाने आ निकले तो का'बा की बिना डाल काबे में पहुँच जाए तो बुत-ख़ाना बना दे जो मौज उठे दिल से तिरे जोश-ए-तलब में सर रख के वहीं सज्दा-ए-शुकराना बना दे जब माइल-ए-अल्ताफ़ नज़र आए वो ख़ुद-बीं तू हर निगह-ए-शौक़ को अफ़्साना बना दे कौनैन भी मिल जाए तो दामन को न फैला कौनैन को भूला हुआ अफ़्साना बना दे फिर अर्ज़ कर इस तरह 'जिगर' शौक़ ओ अदब से बेबाक अगर जुरअत-ए-रिंदाना बना दे तुझ को निगह-ए-यार! क़सम मेरे जुनूँ की नासेह को भी मेरा ही सा दीवाना बना दे मैं हूँ तिरे क़दमों में मुझे कुछ नहीं कहना अब जो भी तिरा लुत्फ़-ए-करीमाना बना दे

Jigar Moradabadi

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