पहले तो हुस्न-ए-अमल हुस्न-ए-यक़ीं पैदा कर फिर इसी ख़ाक से फ़िरदौस-ए-बरीं पैदा कर यही दुनिया कि जो बुत-ख़ाना बनी जाती है इसी बुत-ख़ाने से काबे की ज़मीं पैदा कर रूह-ए-आदम निगराँ कब से है तेरी जानिब उठ और इक जन्नत-ए-जावेद यहीं पैदा कर ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-तवहहुम को जला कर रख दे या'नी आतिश-कदा-ए-सोज़-ए-यक़ीं पैदा कर ग़म मुयस्सर है तो इस को ग़म-ए-कौनैन बना दिल हसीं है तो मोहब्बत भी हसीं पैदा कर आसमाँ मरकज़-ए-तख़्ईल-ओ-तसव्वुर कब तक आसमाँ जिस से ख़जिल हो वो ज़मीं पैदा कर दिल के हर क़तरे में तूफ़ान-ए-तजल्ली भर दे बत्न-ए-हर-ज़र्रा से इक महर-ए-मुबीं पैदा कर बंदगी यूँँ तो है इंसान की फ़ितरत लेकिन नाज़ जिस पे करें सज्दे वो जबीं पैदा कर पस्ती-ए-ख़ाक पे कब तक तिरी बे-बाल-ओ-परी फिर मक़ाम अपना सर-ए-अर्श-ए-बरीं पैदा कर इश्क़ ही ज़िंदा ओ पाइंदा हक़ीक़त है 'जिगर' इश्क़ को आम बना ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा कर
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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बंगाल की मैं शाम-ओ-सहर देख रहा हूँ हर चंद कि हूँ दूर मगर देख रहा हूँ इफ़्लास की मारी हुई मख़्लूक़ सर-ए-राह बे-गोर-ओ-कफ़न ख़ाक-ब-सर देख रहा हूँ बच्चों का तड़पना वो बिलकना वो सिसकना माँ-बाप की मायूस नज़र देख रहा हूँ इंसान के होते हुए इंसान का ये हश्र देखा नहीं जाता है मगर देख रहा हूँ रहमत का चमकने को है फिर नय्यर-ए-ताबाँ होने को है इस शब की सहर देख रहा हूँ ख़ामोश निगाहों में उमँडते हुए जज़्बात जज़्बात में तूफ़ान-ए-शरर देख रहा हूँ बेदारी-ए-एहसास है हर सम्त नुमायाँ बे-ताबी-ए-अर्बाब-ए-नज़र देख रहा हूँ अंजाम-ए-सितम अब कोई देखे कि न देखे मैं साफ़ उन आँखों से मगर देख रहा हूँ सय्याद ने लूटा था अनादिल का नशेमन सय्याद का जलते हुए घर देख रहा हूँ इक तेग़ की जुम्बिश सी नज़र आती है मुझ को इक हाथ पस-ए-पर्दा-ए-दर देख रहा हूँ
Jigar Moradabadi
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साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गया लहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गया बे-कैफ़ियों के कैफ़ से घबरा के पी गया तौबा को तोड़-ताड़ के थर्रा के पी गया ज़ाहिद! ये तेरी शोख़ी-ए-रिन्दाना देखना रहमत को बातों बातों में बहला के पी गया सर-मस्ती-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गई दुनिया-ए-ए'तिबार को ठुकरा के पी गया आज़ुर्दगी-ए-ख़ातिर-ए-साक़ी को देख कर मुझ को ये शर्म आई कि शर्मा के पी गया ऐ रहमत-ए-तमाम मिरी हर ख़ता मुआ'फ़ मैं इंतिहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गया पीता बग़ैर इज़्न ये कब थी मिरी मजाल दर-पर्दा चश्म-ए-यार की शह पा के पी गया उस जान-ए-मय-कदा की क़सम बारहा 'जिगर' कुल आलम-ए-बसीत पे मैं छा के पी गया
Jigar Moradabadi
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आई जब उन की याद तो आती चली गई हर नक़्श-ए-मा-सिवा को मिटाती चली गई हर मंज़र-ए-जमाल दिखाती चली गई जैसे उन्हीं को सामने लाती चली गई हर वाक़िआ' क़रीब-तर आता चला गया हर शय हसीन-तर नज़र आती चली गई वीराना-ए-हयात के एक एक गोशे में जोगन कोई सितार बजाती चली गई दिल फुंक रहा था आतिश-ए-ज़ब्त-ए-फ़िराक़ से दीपक को मय-गुसार बनाती चली गई बे-हर्फ़ ओ बे-हिकायत ओ बे-साज़ ओ बे-सदा रग रग में नग़्मा बन के समाती चली गई जितना ही कुछ सुकून सा आता चला गया उतना ही बे-क़रार बनाती चली गई कैफ़िय्यतों को होश सा आता चला गया बे-कैफ़ियों को नींद सी आती चली गई क्या क्या न हुस्न-ए-यार से शिकवे थे इश्क़ को क्या क्या न शर्मसार बनाती चली गई तफ़रीक़-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का झगड़ा नहीं रहा तमईज़-ए-क़ुर्ब-ओ-बोद मिटाती चली गई मैं तिश्ना-काम-ए-शौक़ था पीता चला गया वो मस्त अँखड़ियों से पिलाती चली गई इक हुस्न-ए-बे-जिहत की फ़ज़ा-ए-बसीत में उड़ती गई मुझे भी उड़ाती चली गई फिर मैं हूँ और इश्क़ की बेताबियाँ 'जिगर' अच्छा हुआ वो नींद की माती चली गई
Jigar Moradabadi
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वो कब के आए भी और गए भी नज़र में अब तक समा रहे हैं ये चल रहे हैं, वो फिर रहे हैं, ये आ रहे हैं वो जा रहे हैं वही क़यामत है कद्द-ए-बाला वही है सूरत, वही सरापा लबों को जुम्बिश, निगह को लर्ज़िश, खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैं वही लताफ़त, वही नज़ाकत, वही तबस्सुम, वही तरन्नुम मैं नक़्श-ए-हिरमाँ बना हुआ था वो नक़्श-ए-हैरत बना रहे हैं ख़िराम रंगीं, निज़ाम रंगीं, कलाम रंगीं, पयाम रंगीं क़दम क़दम पर, रविश रविश पर नए नए गुल खिला रहे हैं शबाब रंगीं, जमाल रंगीं, वो सर से पा तक तमाम रंगीं तमाम रंगीं बने हुए हैं, तमाम रंगीं बना रहे हैं तमाम रानाइयों के मज़हर, तमाम रंगीनियों के मंज़र सँभल सँभल कर सिमट सिमट कर सब एक मरकज़ पर आ रहे हैं बहार-ए-रंग-ओ-शबाब ही क्या सितारा ओ माहताब ही क्या तमाम हस्ती झुकी हुई है, जिधर वो नज़रें झुका रहे हैं तुयूर सरशार-ए-साग़र-ए-मुल हलाक-ए-तनवीर-ए-लाला-ओ-गुल सब अपनी अपनी धुनों में मिल कर अजब अजब गीत गा रहे हैं शराब आँखों से ढल रही है, नज़र से मस्ती उबल रही है छलक रही है उछल रही है, पिए हुए हैं पिला रहे हैं ख़ुद अपने नश्शे में झूमते हैं, वो अपना मुँह आप चूमते हैं ख़राब-ए-मस्ती बने हुए हैं, हलाक-ए-मस्ती बना रहे हैं फ़ज़ा से नश्शा बरस रहा है, दिमाग़ फूलों में बस रहा है वो कौन है जो तरस रहा है? सभी को मय-कश पिला रहे हैं ज़मीन नश्शा, ज़मान नश्शा, जहान नश्शा, मकान नश्शा मकान क्या? ला-मकान नश्शा, डुबो रहे हैं पिला रहे हैं वो रू-ए-रंगीं ओ माैजा-ए-यम, कि जैसे दामान-ए-गुल पे शबनम ये गरमी-ए-हुस्न का है आलम, अरक़ अरक़ में नहा रहे हैं ये मस्त बुलबुल बहक रहे हैं, क़रीब-ए-आरिज़ चहक रहे है गुलों की छाती धड़क रही है, वो दस्त-ए-रंगीं बढ़ा रहे हैं ये मौज-ओ-दरिया, ये रेग-ओ-सहरा ये ग़ुंचा-ओ-गुल, ये माह-ओ-अंजुम ज़रा जो वो मुस्कुरा दिए हैं वो सब के सब मुस्कुरा रहे हैं फ़ज़ा ये नग़्मों से भर गई है कि मौज-ए-दरिया ठहर गई है सुकूत-ए-नग़्मा बना हुआ है, वो जैसे कुछ गुनगुना रहे हैं अब आगे जो कुछ भी हो मुक़द्दर, रहेगा लेकिन ये नक़्श दिल पर हम उन का दामन पकड़ रहे हैं, वो अपना दामन छुड़ा रहे हैं ये अश्क जो बह रहे हैं पैहम, अगरचे सब हैं ये हासिल-ए-ग़म मगर ये मालूम हो रहा है, कि ये भी कुछ मुस्कुरा रहे हैं ज़रा जो दम भर को आँख झपकी, ये देखता हूँ नई तजल्ली तिलिस्म सूरत मिटा रहे हैं, जमाल मअ'नी बना रहे हैं ख़ुशी से लबरेज़ शश-जिहत है, ज़बान पर शोर-ए-तहनियत है ये वक़्त वो है 'जिगर' के दिल को वो अपने दिल से मिला रहे हैं
Jigar Moradabadi
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वही है शोर-ए-हाए-ओ-हू, वही हुजूम-ए-मर्द-ओ-ज़न मगर वो हुस्न-ए-ज़िंदगी, मगर वो जन्नत-ए-वतन वही ज़मीं, वहीं ज़माँ, वही मकीं, वही मकाँ मगर सुरूर-ए-यक-दिली, मगर नशात-ए-अंजुमन वही है शौक़-ए-नौ-ब-नौ, वही जमाल-ए-रंग-रंग मगर वो इस्मत-ए-नज़र, तहारत-ए-लब-ओ-दहन तरक़्क़ियों पे गरचे हैं, तमद्दुन-ओ-मुआशरत मगर वो हुस्न-ए-सादगी, वो सादगी का बाँकपन शराब-ए-नौ की मस्तियाँ, कि अल-हफ़ीज़-ओ-अल-अमाँ मगर वो इक लतीफ़ सा सुरूर-ए-बादा-ए-कुहन ये नग़्मा-ए-हयात है कि है अजल तराना-संज ये दौर-ए-काएनात है कि रक़्स में है अहरमन हज़ार-दर-हज़ार हैं अगरचे रहबरान-ए-मुल्क मगर वो पीर-ए-नौजवाँ, वो एक मर्द-ए-सफ़-शिकन वही महात्मा वही शहीद-ए-अम्न-ओ-आश्ती प्रेम जिस की ज़िंदगी, ख़ुलूस जिस का पैरहन वही सितारे हैं, मगर कहाँ वो माहताब-ए-हिन्द वही है अंजुमन, मगर कहाँ वो सद्र-ए-अंजुमन
Jigar Moradabadi
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