वही है शोर-ए-हाए-ओ-हू, वही हुजूम-ए-मर्द-ओ-ज़न मगर वो हुस्न-ए-ज़िंदगी, मगर वो जन्नत-ए-वतन वही ज़मीं, वहीं ज़माँ, वही मकीं, वही मकाँ मगर सुरूर-ए-यक-दिली, मगर नशात-ए-अंजुमन वही है शौक़-ए-नौ-ब-नौ, वही जमाल-ए-रंग-रंग मगर वो इस्मत-ए-नज़र, तहारत-ए-लब-ओ-दहन तरक़्क़ियों पे गरचे हैं, तमद्दुन-ओ-मुआशरत मगर वो हुस्न-ए-सादगी, वो सादगी का बाँकपन शराब-ए-नौ की मस्तियाँ, कि अल-हफ़ीज़-ओ-अल-अमाँ मगर वो इक लतीफ़ सा सुरूर-ए-बादा-ए-कुहन ये नग़्मा-ए-हयात है कि है अजल तराना-संज ये दौर-ए-काएनात है कि रक़्स में है अहरमन हज़ार-दर-हज़ार हैं अगरचे रहबरान-ए-मुल्क मगर वो पीर-ए-नौजवाँ, वो एक मर्द-ए-सफ़-शिकन वही महात्मा वही शहीद-ए-अम्न-ओ-आश्ती प्रेम जिस की ज़िंदगी, ख़ुलूस जिस का पैरहन वही सितारे हैं, मगर कहाँ वो माहताब-ए-हिन्द वही है अंजुमन, मगर कहाँ वो सद्र-ए-अंजुमन
Related Nazm
तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
81 likes
मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
107 likes
"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
50 likes
दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
66 likes
"मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम" मेरी शोहरत मेरा डंका मेरे ए'जाज़ का सुन कर कभी ये न समझ लेना मैं चोटी का लिखारी हूँ मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं छोटा सा ब्योपारी हूँ मेरी आरत पे बरसों से जो महँगे दाम बिकता है वो तेरे ग़म का सौदा है तेरी आँखें तेरे आँसू तेरी चाहत तेरे जज़्बे यहाँ सेल्फों पे रखे हैं वही तो मैं ने बेचे हैं तुम्हारी बात छिड़ जाए तो बातें बेच देता हूँ ज़रूरत कुछ ज़ियादा हो तो यादें बेच देता हूँ तुम्हारे नाम के सदके बहुत पैसा कमाया है नई गाड़ी ख़रीदी है नया बँगला बनाया है मगर क्यूँँ मुझ को लगता है मेरे अंदर का ब्योपारी तुम्हीं को बेच आया है मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम
Khalil Ur Rehman Qamar
34 likes
More from Jigar Moradabadi
पहले तो हुस्न-ए-अमल हुस्न-ए-यक़ीं पैदा कर फिर इसी ख़ाक से फ़िरदौस-ए-बरीं पैदा कर यही दुनिया कि जो बुत-ख़ाना बनी जाती है इसी बुत-ख़ाने से काबे की ज़मीं पैदा कर रूह-ए-आदम निगराँ कब से है तेरी जानिब उठ और इक जन्नत-ए-जावेद यहीं पैदा कर ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-तवहहुम को जला कर रख दे या'नी आतिश-कदा-ए-सोज़-ए-यक़ीं पैदा कर ग़म मुयस्सर है तो इस को ग़म-ए-कौनैन बना दिल हसीं है तो मोहब्बत भी हसीं पैदा कर आसमाँ मरकज़-ए-तख़्ईल-ओ-तसव्वुर कब तक आसमाँ जिस से ख़जिल हो वो ज़मीं पैदा कर दिल के हर क़तरे में तूफ़ान-ए-तजल्ली भर दे बत्न-ए-हर-ज़र्रा से इक महर-ए-मुबीं पैदा कर बंदगी यूँँ तो है इंसान की फ़ितरत लेकिन नाज़ जिस पे करें सज्दे वो जबीं पैदा कर पस्ती-ए-ख़ाक पे कब तक तिरी बे-बाल-ओ-परी फिर मक़ाम अपना सर-ए-अर्श-ए-बरीं पैदा कर इश्क़ ही ज़िंदा ओ पाइंदा हक़ीक़त है 'जिगर' इश्क़ को आम बना ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा कर
Jigar Moradabadi
0 likes
वो कब के आए भी और गए भी नज़र में अब तक समा रहे हैं ये चल रहे हैं, वो फिर रहे हैं, ये आ रहे हैं वो जा रहे हैं वही क़यामत है कद्द-ए-बाला वही है सूरत, वही सरापा लबों को जुम्बिश, निगह को लर्ज़िश, खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैं वही लताफ़त, वही नज़ाकत, वही तबस्सुम, वही तरन्नुम मैं नक़्श-ए-हिरमाँ बना हुआ था वो नक़्श-ए-हैरत बना रहे हैं ख़िराम रंगीं, निज़ाम रंगीं, कलाम रंगीं, पयाम रंगीं क़दम क़दम पर, रविश रविश पर नए नए गुल खिला रहे हैं शबाब रंगीं, जमाल रंगीं, वो सर से पा तक तमाम रंगीं तमाम रंगीं बने हुए हैं, तमाम रंगीं बना रहे हैं तमाम रानाइयों के मज़हर, तमाम रंगीनियों के मंज़र सँभल सँभल कर सिमट सिमट कर सब एक मरकज़ पर आ रहे हैं बहार-ए-रंग-ओ-शबाब ही क्या सितारा ओ माहताब ही क्या तमाम हस्ती झुकी हुई है, जिधर वो नज़रें झुका रहे हैं तुयूर सरशार-ए-साग़र-ए-मुल हलाक-ए-तनवीर-ए-लाला-ओ-गुल सब अपनी अपनी धुनों में मिल कर अजब अजब गीत गा रहे हैं शराब आँखों से ढल रही है, नज़र से मस्ती उबल रही है छलक रही है उछल रही है, पिए हुए हैं पिला रहे हैं ख़ुद अपने नश्शे में झूमते हैं, वो अपना मुँह आप चूमते हैं ख़राब-ए-मस्ती बने हुए हैं, हलाक-ए-मस्ती बना रहे हैं फ़ज़ा से नश्शा बरस रहा है, दिमाग़ फूलों में बस रहा है वो कौन है जो तरस रहा है? सभी को मय-कश पिला रहे हैं ज़मीन नश्शा, ज़मान नश्शा, जहान नश्शा, मकान नश्शा मकान क्या? ला-मकान नश्शा, डुबो रहे हैं पिला रहे हैं वो रू-ए-रंगीं ओ माैजा-ए-यम, कि जैसे दामान-ए-गुल पे शबनम ये गरमी-ए-हुस्न का है आलम, अरक़ अरक़ में नहा रहे हैं ये मस्त बुलबुल बहक रहे हैं, क़रीब-ए-आरिज़ चहक रहे है गुलों की छाती धड़क रही है, वो दस्त-ए-रंगीं बढ़ा रहे हैं ये मौज-ओ-दरिया, ये रेग-ओ-सहरा ये ग़ुंचा-ओ-गुल, ये माह-ओ-अंजुम ज़रा जो वो मुस्कुरा दिए हैं वो सब के सब मुस्कुरा रहे हैं फ़ज़ा ये नग़्मों से भर गई है कि मौज-ए-दरिया ठहर गई है सुकूत-ए-नग़्मा बना हुआ है, वो जैसे कुछ गुनगुना रहे हैं अब आगे जो कुछ भी हो मुक़द्दर, रहेगा लेकिन ये नक़्श दिल पर हम उन का दामन पकड़ रहे हैं, वो अपना दामन छुड़ा रहे हैं ये अश्क जो बह रहे हैं पैहम, अगरचे सब हैं ये हासिल-ए-ग़म मगर ये मालूम हो रहा है, कि ये भी कुछ मुस्कुरा रहे हैं ज़रा जो दम भर को आँख झपकी, ये देखता हूँ नई तजल्ली तिलिस्म सूरत मिटा रहे हैं, जमाल मअ'नी बना रहे हैं ख़ुशी से लबरेज़ शश-जिहत है, ज़बान पर शोर-ए-तहनियत है ये वक़्त वो है 'जिगर' के दिल को वो अपने दिल से मिला रहे हैं
Jigar Moradabadi
0 likes
बंगाल की मैं शाम-ओ-सहर देख रहा हूँ हर चंद कि हूँ दूर मगर देख रहा हूँ इफ़्लास की मारी हुई मख़्लूक़ सर-ए-राह बे-गोर-ओ-कफ़न ख़ाक-ब-सर देख रहा हूँ बच्चों का तड़पना वो बिलकना वो सिसकना माँ-बाप की मायूस नज़र देख रहा हूँ इंसान के होते हुए इंसान का ये हश्र देखा नहीं जाता है मगर देख रहा हूँ रहमत का चमकने को है फिर नय्यर-ए-ताबाँ होने को है इस शब की सहर देख रहा हूँ ख़ामोश निगाहों में उमँडते हुए जज़्बात जज़्बात में तूफ़ान-ए-शरर देख रहा हूँ बेदारी-ए-एहसास है हर सम्त नुमायाँ बे-ताबी-ए-अर्बाब-ए-नज़र देख रहा हूँ अंजाम-ए-सितम अब कोई देखे कि न देखे मैं साफ़ उन आँखों से मगर देख रहा हूँ सय्याद ने लूटा था अनादिल का नशेमन सय्याद का जलते हुए घर देख रहा हूँ इक तेग़ की जुम्बिश सी नज़र आती है मुझ को इक हाथ पस-ए-पर्दा-ए-दर देख रहा हूँ
Jigar Moradabadi
0 likes
पहले तो हुस्न-ए-अमल हुस्न-ए-यक़ीं पैदा कर फिर इसी ख़ाक से फ़िरदौस-ए-बरीं पैदा कर यही दुनिया कि जो बुत-ख़ाना बनी जाती है इसी बुत-ख़ाने से काबे की ज़मीं पैदा कर रूह-ए-आदम निगराँ कब से है तेरी जानिब उठ और इक जन्नत-ए-जावेद यहीं पैदा कर ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-तवहहुम को जला कर रख दे या'नी आतिश-कदा-ए-सोज़-ए-यक़ीं पैदा कर ग़म मुयस्सर है तो इस को ग़म-ए-कौनैन बना दिल हसीं है तो मोहब्बत भी हसीं पैदा कर आसमाँ मरकज़-ए-तख़्ईल-ओ-तसव्वुर कब तक आसमाँ जिस से ख़जिल हो वो ज़मीं पैदा कर दिल के हर क़तरे में तूफ़ान-ए-तजल्ली भर दे बत्न-ए-हर-ज़र्रा से इक महर-ए-मुबीं पैदा कर बंदगी यूँँ तो है इंसान की फ़ितरत लेकिन नाज़ जिस पे करें सज्दे वो जबीं पैदा कर पस्ती-ए-ख़ाक पे कब तक तिरी बे-बाल-ओ-परी फिर मक़ाम अपना सर-ए-अर्श-ए-बरीं पैदा कर इश्क़ ही ज़िंदा ओ पाइंदा हक़ीक़त है 'जिगर' इश्क़ को आम बना ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा कर
Jigar Moradabadi
3 likes
आई जब उन की याद तो आती चली गई हर नक़्श-ए-मा-सिवा को मिटाती चली गई हर मंज़र-ए-जमाल दिखाती चली गई जैसे उन्हीं को सामने लाती चली गई हर वाक़िआ' क़रीब-तर आता चला गया हर शय हसीन-तर नज़र आती चली गई वीराना-ए-हयात के एक एक गोशे में जोगन कोई सितार बजाती चली गई दिल फुंक रहा था आतिश-ए-ज़ब्त-ए-फ़िराक़ से दीपक को मय-गुसार बनाती चली गई बे-हर्फ़ ओ बे-हिकायत ओ बे-साज़ ओ बे-सदा रग रग में नग़्मा बन के समाती चली गई जितना ही कुछ सुकून सा आता चला गया उतना ही बे-क़रार बनाती चली गई कैफ़िय्यतों को होश सा आता चला गया बे-कैफ़ियों को नींद सी आती चली गई क्या क्या न हुस्न-ए-यार से शिकवे थे इश्क़ को क्या क्या न शर्मसार बनाती चली गई तफ़रीक़-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का झगड़ा नहीं रहा तमईज़-ए-क़ुर्ब-ओ-बोद मिटाती चली गई मैं तिश्ना-काम-ए-शौक़ था पीता चला गया वो मस्त अँखड़ियों से पिलाती चली गई इक हुस्न-ए-बे-जिहत की फ़ज़ा-ए-बसीत में उड़ती गई मुझे भी उड़ाती चली गई फिर मैं हूँ और इश्क़ की बेताबियाँ 'जिगर' अच्छा हुआ वो नींद की माती चली गई
Jigar Moradabadi
3 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Jigar Moradabadi.
Similar Moods
More moods that pair well with Jigar Moradabadi's nazm.







