nazmKuch Alfaaz

"अब तो लौट आओ" ये घर अब मकाँ हो चुका है, अब तो लौट आओ सारा गाँव वीराँ हो चुका है, अब तो लौट आओ गाँव के आख़िर में एक दरिया था ये कहूँ कि मेरा नज़रिया था शीतल था जल उस का, मद्धम मद्धम बहता था आ कर मेरे कानों में, कोई ग़ज़ल कहता था वो मीठा जल अब सूख चुका है कहीं समुंदर में जा कर मिल चुका है वो दरिया अब दरिया नहीं रहा खारे पानी की दुकाँ हो चुका है, अब तो लौट आओ दरिया किनारे वो पीपल का पेड़, शीतल छाँव देता था, हवा संग लहराता था मैं पूरे दिन बस वहीं रहता था एक हवा का झोंका था सुकून भरा, सादगी भरा तन को, मन को, जो करता हरा सुब्ह को जाता था, शाम हुए लौट कर आता था अब वो झोंका भी कई दिनों से लौटा नहीं मालूम हुआ भयंकर तूफाँ हो चुका है, अब तो लौट आओ वो गाँव का चबूतरा, वो बरगद का पेड़ उस के बाजू में वो मिट्टी का ढेर बच्चे जहाँ घरौंदे बना कर खेलते थे उस पेड़ के साए में कुछ पंछी रहते थे वो बूढ़ा बाज़, मेरा दर्द, मेरे दिल की आवाज़ वो मोर जो बरसात में नाचता था आँखें भीग आती थी, तेरी याद दिलाता था वो चिड़िया जो रोज़ दाना चुगने जाती थी हक़ीक़त में वो तुम्हें ढूंँढने आती थी वो कबूतर जो सब सेे सयाना था मेरे पास बैठ कर, सुनता तेरा अफ़साना था तेरी आँखें, तेरी ज़ुल्फ़ें, तेरी ख़ामोशी, तेरी बातें जो भी मैं लिखता, वो सब कुछ पढ़ता वो ख़त देने को तुझे, हर दिशा में उड़ता हज़ारों कोशिशों के बा'द वो नाकाम हो चुका है उड़ते उड़ते थक गया है, गिर कर मर चुका है अब तो लौट आओ वो ख़ेतों में उगती फ़सल, जहाँ पनपती थी मेरी ग़ज़ल वो गाँव का तालाब, जहाँ ऊगा था सुंदर कमल तालाब किनारे वो कीचड़ जिस से मैं ने ताजमहल बनाया था मेरी रूह क़ैद थी, उस में तेरा साया था एक दिन सुनामी आई, सब कुछ बह गया वो मुहब्बत का ताजमहल, वहीं पर ढह गया सब तबाह हो गया, कुछ न बचा अब बस "प्रीत" बाकी था तेरी याद में लिखता रहता रोज़ थोड़ा थोड़ा मरता रहता एक दिन ऐसा आया सब्र इंतहा कर गया तेरी याद में रोते रोते तेरा "प्रीत" मर गया अब कुछ भी न रहा, कुछ भी न बचा सब कुछ शमशान हो चुका है, अब तो लौट आओ

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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"वजहें" सुनो! जाने से ऐतराज़ नहीं मुझे पर जाओ, तो लौट आने की वजहें छोड़ जाना आज न सही कल सुलझ जाएंगी क्या सही है इन्हें खींच कर तोड़ देना? या बेहतर है गिरहें रहने देना और वक़्त पर छोड़ देना अदद राब्तों में लाज़िम हैं रुस्वाइयाँ भी जब मनाये कोई तो और रूठना जिरह करना फिर मान जाना बात बिगड़ जाती है चुप रहने से भी सब चुप-चाप सहने से भी कहना कह देना कहने देना ख़ामोशियों के भरोसे मत रहना अब जाओ पर लौट आने की वजहें छोड़ जाना

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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'वो मैं हूँ' याद आएँगे हज़ार मौसम भीग न पाओगे जिस में तुम वो मैं हूँ याद आएगा सब कुछ तुम को भुला ना पाओगे कभी जो तुम वो मैं हूँ जाओगे इश्क़ की गली में जब भी पाओगे मेरी कमी करोगे याद फ़रियाद तावीज़ वज़ीफ़ा आऊँगा न लौट कर वो मैं हूँ एक हादसा जो भूलता नहीं कोई ग़ुस्से में तुम कहोगे सारे ज़माने से उस के सिवा दूसरा नहीं कोई फिर न जो तुम को मिल पाऊँगा वो मैं हूँ वो हूँ

Shadab khan

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"शायद मेरा दुख समझ पाओ तुम" कभी अंदाज़ा तो लगाओ तुम शायद मेरा दुख समझ पाओ तुम हर घड़ी मैं ने बस तुम्हारा इंतिज़ार किया अपने ख़्वाबों में, ख़यालों में तुम्हें प्यार किया इक दफ़ा ही सही, मुझे सीने से लगाओ तुम हाँ शायद मेरा दुख समझ पाओ तुम पल-पल डरता रहा हूँ तुम्हें खोने से भी पास आने से भी दूर होने से भी मुझे ख़ुद में छुपा सको तो छुपाओ तुम हाँ शायद मेरा दुख समझ पाओ तुम सूना सूना तुम बिन मुझे जहाँ लगे जैसे चाँद बिन सूना आसमाँ लगे फिर से मेरी दुनिया में लौट आओ तुम हाँ शायद मेरा दुख समझ पाओ तुम

Vikas Sangam

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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

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"ख़्वाब" सौ सदियों में सिर्फ़ इक दफ़ा जब तुम मुझ सेे मिलने आई थी अचानक से गुल खिलने लगे थे सहरा में बारिश छाई थी उस दिन आफ़ताब शब में रौशन हुआ था क़मर आग की लपटों में जल रहा था जैसे हमारा इश्क़ जल रहा था जिस ने पिघला दिया था सारे हिमालय को और सारे समंदरों को ख़ुश्क कर दिया था ये प्रलय का दिन था ये हक़ीक़त का दिन था उस दिन पहली मर्तबा सब जागे हुए थे पहली बार था कि सब अपने ख़्वाब से बाहर आए थे या रब ये ख़्वाब कितना हसीन था

Prit

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"गुमशुदा" इन पहाड़ों के पीछे दूर घने जंगलों में इस दरिया के उस पार काली अँधेरी गुफ़ाओं में एक परी रहती थी जो अब वहाँ नहीं है अब वो मेरे दिल में है और मेरा दिल अब भी वहीं है जहाँ वो परी रहती थी न दिल की ख़बर अब न परी का पता है दोनों ही गुमशुदा हैं

Prit

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"मैं मोहब्बत हूँ" मेरे बा'द दुनिया का क्या होगा कि मैं तो मोहब्बत हूँ मैं शबरी के जूठे लबों से राम के पेट तक जाता बैर हूँ जिस के लिए कृष्ण ने शाही भोजन ठुकराया मैं विदुर का कुबेर हूँ मैं हर बार आता हूँ पर जहाँ मुझे पहचान नहीं पाता अगर पहचान भी ले प्रीत तो ठीक से जान नहीं पाता कहीं रोमियो-जूलियट के मरकज़ की दीवार हूँ जिसे खोदता हुआ फ़रहाद मर गया नहर का वो पार हूँ जिस के किनारों पर सागर-ए-सहरा है जिस में कोई क़ैस मजनू हो कर गाम-ब-गाम भटक रहा है लैला की कलाई हूँ मैं ख़य्याम की रूबाई हूँ मैं नज़्म-ए-फ़ैज़ हूँ मैं सब सेे तेज़ हूँ मैं सय्याद हूँ चाक-ए-क़फ़स हूँ जिस्म-ओ-दिल के दरमियाँ हूँ इश्क़ हूँ हवस हूँ बे-वफ़ाई का ख़ुदा हूँ वफ़ादारों का पीर हूँ सब मुझ सेे रहाइश-पज़ीर हैं और मैं सबका असीर हूँ मुझ से सब की ये हालत है मैं हालात से पशेमाँ हूँ मैं दस्त-ए-ज़ुलेखा भी हूँ मैं ही चाक-गरेबाँ हूँ मैं मीर-ओ-ग़ालिब की ग़ज़ल हूँ कीचड़ हूँ कमल हूँ जो मेरे अंदर उतरे कभी बाहर न आने पाए कि मैं तो दलदल हूँ मैं हीर-राँझा के मरकज़ हिज्र हूँ महबूब की गाली हूँ माँ की फ़िक्र हूँ मैं वो लफ़्ज़ जिसे सुन कर शाह भरी महफ़िल औरत का पैरहन उतरता है मैं वो दुआ जिसे पढ़ने पर कोई कृष्ण आ के उसे बचाता है मैं वो अल्फ़ाज़ जिसे गा कर जवान सरहद पार से प्रेमिका को पुकारता है मैं वो कंगन जो विधवा के लिए विरह के गीत गाता है मैं श्रृंगार मैं ही विरह गीत हूँ दुनिया शाइ'र जाने मुझ को लेकिन मैं तो प्रीत हूँ मेरी दुनिया को चाहत है कि मैं रस्म-ए-अदावत हूँ आज़ाद की गोली हूँ भगत सिंह की बग़ावत हूँ मेरे बा'द दुनिया का क्या होगा कि मैं तो मोहब्बत हूँ

Prit

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"याद मेरी आएगी" जब दुनिया अपना रंग दिखाएगी जब तुम्हें वफ़ा समझ आएगी जब सब छोड़ कर जा रहे होंगे जब तुम्हारी आँखें भर आएँगी तुम्हें याद आएगी मेरी जब सब कुछ तबाह हो जाएगा साँसें थमने को होंगी तुम्हारी तुम्हें याद आएगी मेरी अन्तिम क्षणों में सिसकियाँ भर रही होगी मन ही मन रो रही होगी किसी से जब कुछ न कह पाओगी अपना दर्द न जाता पाओगी जब कोई न होगा हमदर्द तुम्हारा जब न होगी किसे परवाह तुम्हारी तुम्हें याद आएगी मेरी याद मेरी क़यामत है इक न इक दिन तो आएगी ही जो आज इतना हँस रहे हो ना देखना इक दिन रुलाएगी ही हमें रुला कर तुम हँसते हो अरे जनाब मूर्ख बनते हो देखना ये क़ुदरत इक दिन तुम्हें सताएगी, तड़पाएगी ये दुनिया जब अपना नकाब हटाएगी तुम्हें याद मेरी आएगी

Prit

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"तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है!" गुल है, गुलाब हैं, हर तरफ़ बहार है ख़िज़ाँ में भी रंगत आई है ना जाने फिर भी क्यो मायूसी छाई है तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है उन की याद आना जैसे साँस लेना है ये बात जानलेवा है उन की तस्वीर कुछ ऐसी बसी है हम ने उन्हें बंद आँखों से पहचान लेना है यादों ने उन की हमारी बेक़रारी और बढ़ाई है तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है यादों में उन की हम रोए जा रहे हैं बेवजह पलकें भिगोए जा रहे हैं जो कभी हमारे थे ही नहीं हम उन के हुए जा रहे हैं क्या करें, अपनी मौत हमनें ख़ुद बुलाई है तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है

Prit

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