nazmKuch Alfaaz

"गुमशुदा" इन पहाड़ों के पीछे दूर घने जंगलों में इस दरिया के उस पार काली अँधेरी गुफ़ाओं में एक परी रहती थी जो अब वहाँ नहीं है अब वो मेरे दिल में है और मेरा दिल अब भी वहीं है जहाँ वो परी रहती थी न दिल की ख़बर अब न परी का पता है दोनों ही गुमशुदा हैं

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

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"तशवीश" मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा आज का दिन निकला है जैसे यूँँॅं कल का भी निकल जाएगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा मेरी सालों की मेहनत पर ये क़िस्मत पानी फेरेगी मैं अल्हड़-पन से निकलूॅंगा और ज़िम्मेदारी घेरेगी कॉलेज ख़त्म हो जाएगा फिर नौकरी करूँॅंगा मैं और दस पंद्रह हज़ार के ख़ातिर दिन और रात मरूॅंगा मैं दिन दफ़्तर में जाएगा और रात ख़यालों में जाएगी फिर इस सोच में दिन निकलेंगे अपनी बारी आएगी मगर नहीं आएगी इक इतवार ज़रूर आएगा छह दिन बा'द कहीं जा कर के एक महीने की तनख़्वाह इक हफ़्ते में ख़त्म फिर दूर-दूर तक नहीं दिखेंगे नाज़ ग़ज़ल और नज़्म शौक़ दबाता जाऊॅंगा फ़र्ज़ निभाता जाऊॅंगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा शादी की बातें होंगी दिन दफ़्तर में जाएगा साथ किसी के रातें होंगी जो शाख-ए-उम्मीद पकड़ के बैठा हूँ ये भी इक दिन जल जाएगी फिर धीरे-धीरे क्या होगा नाज़ जवानी ढल जाएगी मुझ को कुछ करना था मुझ को कुछ बनना था मगर नहीं कर पाया मैं बाक़ी सब तो कर लेंगे कुछ अपना ही रह जाएगा ये दुनिया घूमने का सपना सपना ही रह जाएगा फिर हर रोज़ पशेमाँ हो के मैं बीती बातें सोचूॅंगा और ख़ुद को कोसूॅंगा ये भी किया जा सकता था वो भी किया जा सकता था यूँँॅं ज़िन्दगी गुज़ार दी है खुल के जिया जा सकता था और फिर अपनी नज़्म पढूॅंगा उम्र निकलती जाएगी मौत का ख़ौफ़ रहेगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा इक दिन इन सब से तंग आके मैं शायद ख़ुद-कुशी करूँॅंगा शे'र लिखा होगा दीवार-ओ-दर पर एक बहुत अच्छा सा लगता है हर रोज़ यही इक ऐसा दिन भी आएगा मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा

Naaz ishq

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"मोहब्बत" हम जो तिरे दिल में समाए है यहाँ से हिजरत कर जाएँगे एक वक़्त कयामत को आना है ये सितारे भुझा दिए जाएँगे मेरी आँखें एक दरिया है हम कभी सेलाब लाएँगे तुम अगर कहो हम से मिलना है हम पहाड़ों का सीना चीर कर आएँगे मौत आने की हज़ार क़िस्में हैं हम मोहब्बत में मारे जाएँगे

ALI ZUHRI

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"लव ट्राईऐंगल" जब ख़यालों में मैं उस के पीछे पीछे जाता भाव खाती देखो फिर मैं उस सेे रुठ जाता ऐसे वैसे कैसे कैसे मुझ को वो मनाती जान थी मेरी वो कैसे मैं ना मान पाता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता तू सवाल और तेरा मैं जवाब होता काश जो तू मेरी आँखों में वो झाँक जाती तेरे पास में जो महका मैं गुलाब होता अगर ये ख़्वाब सच हुआ तो सुनले ऐ हसीं मैं पूरी उम्र तेरे दिल में ही गुज़ार दूँ तू जो चले तो दिन हो जब रूके तो रात हो ये काएनात तेरे क़दमों में उतार दूँ अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता काश जो तू बोले तेरी मैं आवाज़ होता तू शबाब तेरी धुन में मैं शराब होता सबके चेहरों को तो तू यूँँ निहार जाती तेरे नैनों का कभी तो मैं शिकार होता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता

Rohit tewatia 'Ishq'

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"ख़्वाब" सौ सदियों में सिर्फ़ इक दफ़ा जब तुम मुझ सेे मिलने आई थी अचानक से गुल खिलने लगे थे सहरा में बारिश छाई थी उस दिन आफ़ताब शब में रौशन हुआ था क़मर आग की लपटों में जल रहा था जैसे हमारा इश्क़ जल रहा था जिस ने पिघला दिया था सारे हिमालय को और सारे समंदरों को ख़ुश्क कर दिया था ये प्रलय का दिन था ये हक़ीक़त का दिन था उस दिन पहली मर्तबा सब जागे हुए थे पहली बार था कि सब अपने ख़्वाब से बाहर आए थे या रब ये ख़्वाब कितना हसीन था

Prit

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"मैं मोहब्बत हूँ" मेरे बा'द दुनिया का क्या होगा कि मैं तो मोहब्बत हूँ मैं शबरी के जूठे लबों से राम के पेट तक जाता बैर हूँ जिस के लिए कृष्ण ने शाही भोजन ठुकराया मैं विदुर का कुबेर हूँ मैं हर बार आता हूँ पर जहाँ मुझे पहचान नहीं पाता अगर पहचान भी ले प्रीत तो ठीक से जान नहीं पाता कहीं रोमियो-जूलियट के मरकज़ की दीवार हूँ जिसे खोदता हुआ फ़रहाद मर गया नहर का वो पार हूँ जिस के किनारों पर सागर-ए-सहरा है जिस में कोई क़ैस मजनू हो कर गाम-ब-गाम भटक रहा है लैला की कलाई हूँ मैं ख़य्याम की रूबाई हूँ मैं नज़्म-ए-फ़ैज़ हूँ मैं सब सेे तेज़ हूँ मैं सय्याद हूँ चाक-ए-क़फ़स हूँ जिस्म-ओ-दिल के दरमियाँ हूँ इश्क़ हूँ हवस हूँ बे-वफ़ाई का ख़ुदा हूँ वफ़ादारों का पीर हूँ सब मुझ सेे रहाइश-पज़ीर हैं और मैं सबका असीर हूँ मुझ से सब की ये हालत है मैं हालात से पशेमाँ हूँ मैं दस्त-ए-ज़ुलेखा भी हूँ मैं ही चाक-गरेबाँ हूँ मैं मीर-ओ-ग़ालिब की ग़ज़ल हूँ कीचड़ हूँ कमल हूँ जो मेरे अंदर उतरे कभी बाहर न आने पाए कि मैं तो दलदल हूँ मैं हीर-राँझा के मरकज़ हिज्र हूँ महबूब की गाली हूँ माँ की फ़िक्र हूँ मैं वो लफ़्ज़ जिसे सुन कर शाह भरी महफ़िल औरत का पैरहन उतरता है मैं वो दुआ जिसे पढ़ने पर कोई कृष्ण आ के उसे बचाता है मैं वो अल्फ़ाज़ जिसे गा कर जवान सरहद पार से प्रेमिका को पुकारता है मैं वो कंगन जो विधवा के लिए विरह के गीत गाता है मैं श्रृंगार मैं ही विरह गीत हूँ दुनिया शाइ'र जाने मुझ को लेकिन मैं तो प्रीत हूँ मेरी दुनिया को चाहत है कि मैं रस्म-ए-अदावत हूँ आज़ाद की गोली हूँ भगत सिंह की बग़ावत हूँ मेरे बा'द दुनिया का क्या होगा कि मैं तो मोहब्बत हूँ

Prit

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"एक दिन" एक दिन तुम उठोगी बिस्तर से तुम्हें मेरा ख़्याल आएगा और याद आएगी मेरी मोहब्बत, मेरी बातें कैसे एक शख़्स ने तुम्हें चाहा था बेइंतहा और फिर तुम मेरी तस्वीर देखोगी तुम्हारी आँखों में आँसू होंगे तुम चाहकर भी मुझे भुला नहीं पाओगी अभी तो तुम मुक़र जाओगी मगर उस वक़्त किधर जाओगी? घर की दर-ओ-दीवार देखोगी मेरी तस्वीरें बनती नज़र आएगी दहलीज़ से मेरी सदाएँ आएगी तुम मेरी यादों में ख़ुद को तन्हा पाओगी और सोचोगी अपने इस अंदाज़ पर जिस तरह तुम ने मुझे रुलाया, सताया मगर तब मैं वहाँ नहीं रहूँगा फूलों की ख़ुशबुओं में बारिश की बूंदों में सुब्ह की चाय में मुझे देखोगी, मुझे ही पाओगी हर शख़्स में मेरा चेहरा दिखेगा निगाहों में मेरे ख़्वाबों का पहरा होगा ज़ेहन में बस मेरे ख़याल आएँगे मेरी पाक मोहब्बत होगी और तुम्हारा दिल उस वक़्त तुम सेे सवाल पूछेगा क्या कमी थी उस में जो इस तरह तन्हा किया वो शख़्स जो मुझ सेे मोहब्बत करता था उसे इस तरह रुस्वा किया इसी सोच में डूबी तुम ख़ुद ही रोने लग जाओगी पछताओगी और उस वक़्त, बस उस वक़्त मेरी यादों में खो जाओगी

Prit

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"तुम्हारा ख़याल" भोर में सूरज की हल्की रौशनी से जब नदी का जल चमक जाता है तुम्हारा अक्स मुझे नज़र आता है निशा में; महताब की चाँदनी तले टिमटिमाते तारों को देखता हूँ तुम्हारा चेहरा निखर आता है हल्की बारिश के बा'द मिट्टी से आने वाली गंध सी हो तुम किसी पवित्र ग्रंथ सी हो तुम लापता हूँ मैं ख़ुद ही में मुझ में बसी हो तुम रूह की रूहानियत हो आँखों की नमी हो तुम तुम्हारी आवाज़ कोयल की मीठी बोली सी लगती हँ तुम हो तो मैं हूँ तुम्हीं से मेरी साँसे चलती हैं पंछियों की चहचहाहट से तुम्हारा मुस्कुराना याद आता है जब भी इबादत करे 'प्रीत' तुम्हारा ज़िक्र हो ही जाता है

Prit

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“नसीहत” बदन कीड़ों से भर जाए तेरा आशिक़ भी मर जाए न होगा जब कोई भी पास न डालेगा कोई जब घास हो मेरे इश्क़ का एहसास लगाना "प्रीत" को आवाज़ मैं आऊँगा ये बतलाने कि मैं सच कहता था तुम सेे ये दुनिया झूठ है जानाँ हवस का खेल है इस को मोहब्बत मत समझ जाना नहीं तो फिर बुरा होगा मगर सुनती कहाँ थी तुम जहाँ नफ़रत वहाँ थी तुम सो नफ़रत ही से खेलो तुम मेरा दिल तोड़ने वाली तुम्हारा टूटा, झेलो तुम

Prit

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