nazmKuch Alfaaz

“नसीहत” बदन कीड़ों से भर जाए तेरा आशिक़ भी मर जाए न होगा जब कोई भी पास न डालेगा कोई जब घास हो मेरे इश्क़ का एहसास लगाना "प्रीत" को आवाज़ मैं आऊँगा ये बतलाने कि मैं सच कहता था तुम सेे ये दुनिया झूठ है जानाँ हवस का खेल है इस को मोहब्बत मत समझ जाना नहीं तो फिर बुरा होगा मगर सुनती कहाँ थी तुम जहाँ नफ़रत वहाँ थी तुम सो नफ़रत ही से खेलो तुम मेरा दिल तोड़ने वाली तुम्हारा टूटा, झेलो तुम

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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना

Rishabh Sharma

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"वजहें" सुनो! जाने से ऐतराज़ नहीं मुझे पर जाओ, तो लौट आने की वजहें छोड़ जाना आज न सही कल सुलझ जाएंगी क्या सही है इन्हें खींच कर तोड़ देना? या बेहतर है गिरहें रहने देना और वक़्त पर छोड़ देना अदद राब्तों में लाज़िम हैं रुस्वाइयाँ भी जब मनाये कोई तो और रूठना जिरह करना फिर मान जाना बात बिगड़ जाती है चुप रहने से भी सब चुप-चाप सहने से भी कहना कह देना कहने देना ख़ामोशियों के भरोसे मत रहना अब जाओ पर लौट आने की वजहें छोड़ जाना

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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"गुमशुदा" इन पहाड़ों के पीछे दूर घने जंगलों में इस दरिया के उस पार काली अँधेरी गुफ़ाओं में एक परी रहती थी जो अब वहाँ नहीं है अब वो मेरे दिल में है और मेरा दिल अब भी वहीं है जहाँ वो परी रहती थी न दिल की ख़बर अब न परी का पता है दोनों ही गुमशुदा हैं

Prit

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"तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है!" गुल है, गुलाब हैं, हर तरफ़ बहार है ख़िज़ाँ में भी रंगत आई है ना जाने फिर भी क्यो मायूसी छाई है तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है उन की याद आना जैसे साँस लेना है ये बात जानलेवा है उन की तस्वीर कुछ ऐसी बसी है हम ने उन्हें बंद आँखों से पहचान लेना है यादों ने उन की हमारी बेक़रारी और बढ़ाई है तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है यादों में उन की हम रोए जा रहे हैं बेवजह पलकें भिगोए जा रहे हैं जो कभी हमारे थे ही नहीं हम उन के हुए जा रहे हैं क्या करें, अपनी मौत हमनें ख़ुद बुलाई है तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है

Prit

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"इज़हार" तू ही मेरी काइ‌नात है क़यामत तक तेरा इंतिज़ार है मेरे अल्फ़ाज़ की तरन्नुम तुझ ही पे कुर्बान हैं बे-सबब तुझ सेे उल्फ़त है हर दम लबों पर तेरा ही नाम है तू मेरी सहर; तू ही शाम है हया है; इश्क़ ज़ाहिर नहीं करते उलझे हुए से जज़्बात हैं कशिश है तुझ से और तू ही अनजान है मुख़्तसर ही सही मुलाक़ात हो रब से यही फ़रियाद है दिल का क्या किसी पर भी आ जाए ये परिंदा नादान है ज़माना छेड़ेगा मुझे ज़माना बड़ा अय्यार है पर आज फिर अल्फ़ाज़ों से 'प्रीत' करता इज़हार है

Prit

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"ख़्वाब" सौ सदियों में सिर्फ़ इक दफ़ा जब तुम मुझ सेे मिलने आई थी अचानक से गुल खिलने लगे थे सहरा में बारिश छाई थी उस दिन आफ़ताब शब में रौशन हुआ था क़मर आग की लपटों में जल रहा था जैसे हमारा इश्क़ जल रहा था जिस ने पिघला दिया था सारे हिमालय को और सारे समंदरों को ख़ुश्क कर दिया था ये प्रलय का दिन था ये हक़ीक़त का दिन था उस दिन पहली मर्तबा सब जागे हुए थे पहली बार था कि सब अपने ख़्वाब से बाहर आए थे या रब ये ख़्वाब कितना हसीन था

Prit

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"मैं मोहब्बत हूँ" मेरे बा'द दुनिया का क्या होगा कि मैं तो मोहब्बत हूँ मैं शबरी के जूठे लबों से राम के पेट तक जाता बैर हूँ जिस के लिए कृष्ण ने शाही भोजन ठुकराया मैं विदुर का कुबेर हूँ मैं हर बार आता हूँ पर जहाँ मुझे पहचान नहीं पाता अगर पहचान भी ले प्रीत तो ठीक से जान नहीं पाता कहीं रोमियो-जूलियट के मरकज़ की दीवार हूँ जिसे खोदता हुआ फ़रहाद मर गया नहर का वो पार हूँ जिस के किनारों पर सागर-ए-सहरा है जिस में कोई क़ैस मजनू हो कर गाम-ब-गाम भटक रहा है लैला की कलाई हूँ मैं ख़य्याम की रूबाई हूँ मैं नज़्म-ए-फ़ैज़ हूँ मैं सब सेे तेज़ हूँ मैं सय्याद हूँ चाक-ए-क़फ़स हूँ जिस्म-ओ-दिल के दरमियाँ हूँ इश्क़ हूँ हवस हूँ बे-वफ़ाई का ख़ुदा हूँ वफ़ादारों का पीर हूँ सब मुझ सेे रहाइश-पज़ीर हैं और मैं सबका असीर हूँ मुझ से सब की ये हालत है मैं हालात से पशेमाँ हूँ मैं दस्त-ए-ज़ुलेखा भी हूँ मैं ही चाक-गरेबाँ हूँ मैं मीर-ओ-ग़ालिब की ग़ज़ल हूँ कीचड़ हूँ कमल हूँ जो मेरे अंदर उतरे कभी बाहर न आने पाए कि मैं तो दलदल हूँ मैं हीर-राँझा के मरकज़ हिज्र हूँ महबूब की गाली हूँ माँ की फ़िक्र हूँ मैं वो लफ़्ज़ जिसे सुन कर शाह भरी महफ़िल औरत का पैरहन उतरता है मैं वो दुआ जिसे पढ़ने पर कोई कृष्ण आ के उसे बचाता है मैं वो अल्फ़ाज़ जिसे गा कर जवान सरहद पार से प्रेमिका को पुकारता है मैं वो कंगन जो विधवा के लिए विरह के गीत गाता है मैं श्रृंगार मैं ही विरह गीत हूँ दुनिया शाइ'र जाने मुझ को लेकिन मैं तो प्रीत हूँ मेरी दुनिया को चाहत है कि मैं रस्म-ए-अदावत हूँ आज़ाद की गोली हूँ भगत सिंह की बग़ावत हूँ मेरे बा'द दुनिया का क्या होगा कि मैं तो मोहब्बत हूँ

Prit

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