ऐ शांति अहिंसा की उड़ती हुई परी आ तू भी आ कि आ गई छब्बीस जनवरी सर पर बसंत घास ज़मीं पर हरी हरी फूलों से डाली डाली चमन की भरी भरी आई न तू तो सब की सुनूँगा खरी खरी तुझ बिन उदास है मिरी खेती हरी-भरी आ जल्द आ कि आ गई छब्बीस जनवरी घूँघट उलट रही है चमन की कली कली शाख़ें तो टेढ़ी-मेढ़ी हैं सूरत भली भली रंगीनियाँ हैं बाग़ में ख़ुशबू गली गली शबनम से है कली की पियाली भरी भरी आ तू भी आ कि आ गई छब्बीस जनवरी मुस्का रही है मुझ पे मिरे बाग़ की कली आँखें दिखा रही है मुझे कल की छोकरी ऐसा न हो कि फूल उड़ाएँ मिरी हँसी अब तैरने लगी मिरी आँखों में जल-परी आ जल्द आ कि आ गई छब्बीस जनवरी काँटे हों चाहे फूल हों फ़स्ल-ए-बहार के पाले हैं दोनों एक ही परवरदिगार के हम भारती शिकार हैं अपने ही वार के ऐ शांति अहिंसा की उड़ती हुई परी धरती पे आ कि आ गई छब्बीस जनवरी
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"शनासाई" रात के हाथ पे जलती हुई इक शम-ए-वफ़ा अपना हक़ माँगती है दूर ख़्वाबों के जज़ीरे में किसी रौज़न से सुब्ह की एक किरन झाँकती है वो किरन दरपा-ए-आज़ार हुई जाती है मेरी ग़म-ख़्वार हुई जाती है आओ किरनों को अँधेरों का कफ़न पहनाएँ इक चमकता हुआ सूरज सर-ए-मक़्तल लाएँ तुम मिरे पास रहो और यही बात कहो आज भी हर्फ़-ए-वफ़ा बाइस-ए-रुस्वाई है अपने क़ातिल से मिरी ख़ूब शनासाई है
Akhtar Payami
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"नज़्म क्या है" शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ और आज़ाद में भी है इस का निशाँ नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़ इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़ नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का एक दरिया सा है देखो जज़्बात का वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो 'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह नज़्म में जो कहानी कही जाएगी शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा
Amjad Husain Hafiz Karnataki
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इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है इस के साए में सदा प्यार के चर्चे होंगे ख़त्म जो हो न सकेगी वो कहानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल ताज वो शम्अ' है उल्फ़त के सनम-ख़ाने की जिस के परवानों में मुफ़्लिस भी हैं ज़रदार भी हैं संग-ए-मरमर में समाए हुए ख़्वाबों की क़सम मरहले प्यार के आसाँ भी हैं दुश्वार भी हैं दिल को इक जोश इरादों को जवानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल ताज इक ज़िंदा तसव्वुर है किसी शाएर का उस का अफ़्साना हक़ीक़त के सिवा कुछ भी नहीं इस के आग़ोश में आ कर ये गुमाँ होता है ज़िंदगी जैसे मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं ताज ने प्यार की मौजों को रवानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल ये हसीं रात ये महकी हुई पुर-नूर फ़ज़ा हो इजाज़त तो ये दिल इश्क़ का इज़हार करे इश्क़ इंसान को इंसान बना देता है किस की हिम्मत है मोहब्बत से जो इनकार करे आज तक़दीर ने ये रात सुहानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज महल सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल
Shakeel Badayuni
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तमाम रात सितारों से बात रहती थी कि सुब्ह होते ही घर से फूल आते थे वो किस के नक़्श उभरते थे तेग़ पर अपनी वो किस ख़याल में हम जंग जीत जाते थे हमें भी क़हत में एक चश्म-ए-ज़र मुयस्सर थी कोई हथेलियाँ भर-भर के मय पिलाता था भरा हुआ था समुंदर इन्हीं ख़जानों से निकाल लेते थे जो ख़्वाब रास आता था वो मेरे साथ रहा करता ख़ुशदिली से बहुत कि उन दिनों मेरा दुनिया पर हाथ पड़ता था हमारी जेब भरी रहती दास्तानों से हमें ख़याल का जंगल भी साथ पड़ता था वो सारे दिन का थका ख़्वाब-गाह में आता थपक थपक के सुलाता तो हाथ सो जाते नसीम-ए-सुब्ह किसी लहर में जगाती हमें और उठते उठते हमें दिन के एक हो जाते सरों से खेंच लिया वक़्त ने वफ़ा का लिहाफ़ वो पर्दे उठ गए जो तायनात रहते थे बिछड़ गया है वो संगीन मौसमों में कहीं वो मेरे दिल पर सदा जिस के हाथ रहते थे वो बू-ए-गुल हमें जिस गुलिस्ताँ में लाई थी वहाँ भी जा के उस का निशान देख लिया ये शाख़-ए-वस्ल दुबारा हरी नहीं होती हवा-ए-हिज्र ने मेरा मकान देख लिया वो अब्र जिस की तग-ओ-दौ में जिस्म सूख गए दुबारा छत पे है और छत पे सीढ़ी जाती है ठहर ठहर के उस सम्त ऐसे बढ़ रहा हूँ कि जैसे हामला औरत कदम उठाती है ये ज़हर बादा-ए-इशरत है और दे मेरे रब वो फिर चला गया मैं फिर ज़मीन चाटूँगा मैं फिर से हाथ में तेशा उठाए सोचता हूँ मैं कोहकन वही ख़ुश-ख़त पहाड़ काटूँगा बदन की बर्फ़ पिघलने के बा'द पूछेंगे बहुत पता है तहम्मुल के साथ बहते हो अज़ल के हाथ पे खेंची हुई समय की लकीर किसी से पहले मिटी है जो मुझ सेे कहते हो
Tehzeeb Hafi
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जिस का है सब को ज्ञान यही है सारे जहाँ की जान यही है जिस से है अपनी आन यही है मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है हँसता पर्बत हँसमुख झरना पाँव पसारे गंगा जमुना गोदी खोले धरती माता मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है एक तो ऊँचा सब से हिमाला उस पर मेरे देश का झंडा धरती पर आकाश का धोका मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है पर्बत कितना जम के अड़े हैं कैसे कैसे भीम खड़े हैं झरने गिर गिर पाँव पड़े हैं मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है पर्बत ऊँची चोटी वाले बाँके तिरछे नोक निकाले 'अर्जुन' जैसे बान सँभाले मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है आरती उस की चाँद उतारे ऊषा उस की माँग सँवारे सूरज उस पर सब कुछ वारे मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है झूमती गाएँ नाचते पंछी सारी दुनिया रक़्स-ओ-मस्ती 'कृष्ण' की बंसी हाए रे बंसी मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है जाल बिछाए जाल सँभाले कमसिन सड़कें माँग निकाले बाल बिखेरे नद्दी नाले मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है रात की नारी डूब गई है सुब्ह की देवी जाग चुकी है पनघट पर इक भीड़ लगी है मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है सुंदर नारी नार सँभाले घूँघट काढ़े और हटाए चलते फिरते प्रेम शिवाले मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है धरती की पोशाक नई है खेती जैसे सब्ज़ परी है मेहनत अपने बल पे खड़ी है मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है पड़ती बूँदें बजती पायल धरती जल-थल पंछी घाएल बोले पपीहा कूके कोयल मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है देश का एक इक नयन कटोरा सारे जहाँ पर डाले डोरा अपना जनता अपना एलोरा मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है ताज-महल बे-मिस्ल हसीना इस में मिला कितनों का पसीना जब कहीं चमका है ये नगीना मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है अहद-ए-वफ़ा की लाज तो देखो शाह के दिल पर राज तो देखो प्रेम के सर पर ताज तो देखो मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है भारत की तक़दीर को देखो जन्नत की तस्वीर को देखो आओ ज़रा कश्मीर को देखो मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है एक इसी कश्मीर का दर्शन कितनों के दुख दर्द का दर्पन आस नहाए बरसे जीवन मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है एक तरफ़ बंगाल का जादू सर से कमर तक गेसू ही गेसू फैली हुई 'टैगोर' की ख़ुशबू मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है काली बलाएँ सर पर पाले शाम अवध की डेरा डाले ऐसे में कौन अपने को सँभाले मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है हुस्न की तस्कीन इश्क़ की ढारस वाह रे अपनी सुब्ह-ए-बनारस घाट के पत्थर जैसे पारस मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है मंदिर मस्जिद और शिवाले मानवता का भार सँभाले कितने युगों को देखे-भाले मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है फूलों के मुखड़े चूम रहे हैं काले भँवरे घूम रहे हैं अम्न के बादल झूम रहे हैं मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है
Nazeer Banarasi
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नफ़रत की आग बढ़ने न पाए बुझा के चल उठ और प्रेम-प्यार की गंगा बहा के चल क़दमों से अपने चाँद सितारे उगा के चल चल और आसमाँ को ज़मीं पर बिछा के चल जो राह रोकती हो वो दीवार ढा के चल रस्ता अगर नहीं है तो रस्ता बना के चल फिर हादसे ने ख़ून दिया लोकतंत्र को फिर आई ज़िन्दगी, कदम आगे बढ़ा के चल होने लगेंगी प्यार के फूलों की बारिशें राहों से इख़्तिलाफ़ [1] के काँटे हटा के चल फ़रमान वक़्त का है ये हर भारती के नाम मतभेद सारे अपने दिलों से मिटा के चल होती है शाम, मस्जिदो-मन्दिर हैं सामने इक एक दीप दोनों में पहले जला के चल होना है सर बुलन्द अगर फिर जहान में साख अपने प्यारे देश की ऊँची उठा के चल आज़ाद हिन्द फौज की मानिन्द ऐ ’नजीर’ सबके क़दम से अपने क़दम को मिला के चल
Nazeer Banarasi
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"दिवाली" मिरी साँसों को गीत और आत्मा को साज़ देती है ये दिवाली है सब को जीने का अंदाज़ देती है हृदय के द्वार पर रह रह के देता है कोई दस्तक बराबर ज़िंदगी आवाज़ पर आवाज़ देती है सिमटता है अँधेरा पाँव फैलाती है दिवाली हँसाए जाती है रजनी हँसे जाती है दिवाली क़तारें देखता हूँ चलते-फिरते माह-पारों की घटाएँ आँचलों की और बरखा है सितारों की वो काले काले गेसू सुर्ख़ होंट और फूल से आरिज़ नगर में हर तरफ़ परियाँ टहलती हैं बहारों की निगाहों का मुक़द्दर आ के चमकाती है दिवाली पहन कर दीप-माला नाज़ फ़रमाती है दिवाली उजाले का ज़माना है उजाले की जवानी है ये हँसती जगमगाती रात सब रातों की रानी है वही दुनिया है लेकिन हुस्न देखो आज दुनिया का है जब तक रात बाक़ी कह नहीं सकते कि फ़ानी है वो जीवन आज की रात आ के बरसाती है दिवाली पसीना मौत के माथे पे छलकाती है दिवाली सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या गगन की जगमगाहट पड़ गई है आज मद्धम क्यूँँ मुंडेरों और छज्जों पर उतर आए हैं तारे क्या हज़ारों साल गुज़रे फिर भी जब आती है दिवाली महल हो चाहे कुटिया सब पे छा जाती है दिवाली इसी दिन द्रौपदी ने कृष्ण को भाई बनाया था वचन के देने वाले ने वचन अपना निभाया था जनम दिन लक्ष्मी का है भला इस दिन का क्या कहना यही वो दिन है जिस ने राम को राजा बनाया था कई इतिहास को एक साथ दोहराती है दिवाली मोहब्बत पर विजय के फूल बरसाती है दिवाली गले में हार फूलों का चरण में दीप-मालाएँ मुकुट सर पर है मुख पर ज़िंदगी की रूप-रेखाएँ लिए हैं कर में मंगल-घट न क्यूँँ घट घट पे छा जाएँ अगर परतव पड़े मुर्दा-दिलों पर वो भी जी जाएँ अजब अंदाज़ से रह रह के मस़्काती है दिवाली मोहब्बत की लहर नस नस में दौड़ाती है दिवाली तुम्हारा हूँ तुम अपनी बात मुझ से क्यूँँ छुपाते हो मुझे मालूम है जिस के लिए चक्कर लगाते हो बनारस के हो तुम को चाहिए त्यौहार घर करना बुतों को छोड़ कर तुम क्यूँँ इलाहाबाद जाते हो न जाओ ऐसे में बाहर 'नज़ीर' आती है दिवाली ये काशी है यहीं तो रंग दिखलाती है दिवाली
Nazeer Banarasi
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कहीं पड़े न मोहब्बत की मार होली में अदास प्रेम करो दिल से प्यार होली में गले में डाल दो बाँहों का हार होली में उतारो एक बरस का ख़ुमार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में लगा के आग बढ़ी आगे रात की जोगन नए लिबास में आई है सुब्ह की मालन नज़र नज़र है कुँवारी अदा अदा कमसिन हैं रंग रंग से सब रंग-बार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में हवा हर एक को चल फिर के गुदगुदाती है नहीं जो हँसते उन्हें छेड़ कर हंसाती है हया गुलों को तो कलियों को शर्म आती है बढ़ाओ बढ़ के चमन का वक़ार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में ये किस ने रंग भरा हर कली की प्याली में गुलाल रख दिया किस ने गुलों की थाली में कहाँ की मस्ती है मालन में और माली में यही हैं सारे चमन की पुकार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में तुम्हीं से फूल चमन के तुम्हीं से फुलवारी सजाए जाओ दिलों के गुलाब की क्यारी चलाए जाओ नशीली नज़र से पिचकारी लुटाए जाओ बराबर बहार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में मिले हो बारा महीनों की देख-भाल के ब'अद ये दिन सितारे दिखाते हैं कितनी चाल के ब'अद ये दिन गया तो फिर आएगा एक साल के ब'अद निगाहें करते चलो चार यार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में बुराई आज न ऐसे रहे न वैसे रहे सफ़ाई दिल में रहे आज चाहे जैसे रहे ग़ुबार दिल में किसी के रहे तो कैसे रहे अबीर उड़ती है बन कर ग़ुबार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में हया में डूबने वाले भी आज उभरते हैं हसीन शोख़ियाँ करते हुए गुज़रते हैं जो चोट से कभी बचते थे चोट करते हैं हिरन भी खेल रहे हैं शिकार होली में
Nazeer Banarasi
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