नफ़रत की आग बढ़ने न पाए बुझा के चल उठ और प्रेम-प्यार की गंगा बहा के चल क़दमों से अपने चाँद सितारे उगा के चल चल और आसमाँ को ज़मीं पर बिछा के चल जो राह रोकती हो वो दीवार ढा के चल रस्ता अगर नहीं है तो रस्ता बना के चल फिर हादसे ने ख़ून दिया लोकतंत्र को फिर आई ज़िन्दगी, कदम आगे बढ़ा के चल होने लगेंगी प्यार के फूलों की बारिशें राहों से इख़्तिलाफ़ [1] के काँटे हटा के चल फ़रमान वक़्त का है ये हर भारती के नाम मतभेद सारे अपने दिलों से मिटा के चल होती है शाम, मस्जिदो-मन्दिर हैं सामने इक एक दीप दोनों में पहले जला के चल होना है सर बुलन्द अगर फिर जहान में साख अपने प्यारे देश की ऊँची उठा के चल आज़ाद हिन्द फौज की मानिन्द ऐ ’नजीर’ सबके क़दम से अपने क़दम को मिला के चल
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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"शिकवा" दिल तो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया है फिर कैसा ये शिकवा गिला रह गया घर का कोना कोना फूँक दिया हम ने भला आईना ये कैसे बचा रह गया रौशनी बन संग तुम्हारे चलूँगा कभी वो जो कहता था मैं भी जलूँगा कभी जा कर देखे कोई उस दिए को ज़रा वो दिया तो बुझा का बुझा रह गया
Vikas Sangam
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“ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ” ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ ख़्वाब में तुझ को बाल बनाते छत पर देखा करता हूँ तेरी गली के बच्चों में फिर मैं भी खेला करता हूँ छत पर आने की मैं तुझ सेे रोज़ गुज़ारिश करता हूँ हाल-ए-दिल भी काग़ज़ पर लिख लिख के फेंका करता हूँ आज भी तेरी गलियों में मैं रास रचाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ लट बिखराकर एक तरफ़ तू मुझ को देखा करती है आँख दिखाया करती है सब घर हैं बताया करती है जल्दी से फिर काग़ज़ तू घूँघट में छुपाया करती है मेरे लिए और ग़ुस्से में तू चाँट दिखाया करती है ग़ुस्सा अच्छा लगता है ग़ुस्सा दिलवाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ ख़्वाब-नगर की राज-कुमारी दिल में मुझ को रहने दे इश्क़ का दरिया दिल के साथ निगाहों से भी बहने दे तेरा दिल जो भी कहता है रोक न उस को कहने दे तेरा ग़म मेरा भी ग़म है साथ में मिल के सहने दे ख़्वाबों ही ख़्वाबों में तेरा दिल धड़काने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ तेरी निगाहें सुर की देवी छेड़ दें पल में साज़ अभी ये चाहे तो बदल के रख दें शाइ'र का अंदाज़ अभी आँखों ही आँखों में छुपाए तू ने दिल के राज़ अभी इश्क़ मोहब्बत का जल्दी से कर दे तू आग़ाज़ अभी मैं भी इतनी दूर से तुझ पर जान लुटाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ बात तो सुन ख़ातून मिरी ये दिल है मेरा प्रेम-नगर मैं तो अभी आ जाऊँ रहने कह दे तू इक बार अगर तू हो मेरे साथ अगर तो चाँद पे भी कर लूँगा घर तेरे बिना लगता है अधूरा इश्क़ मोहब्बत का ये सफ़र इस दुनिया में मैं तुझ सेे ही ब्याह रचाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ
Prashant Kumar
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जिस का है सब को ज्ञान यही है सारे जहाँ की जान यही है जिस से है अपनी आन यही है मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है हँसता पर्बत हँसमुख झरना पाँव पसारे गंगा जमुना गोदी खोले धरती माता मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है एक तो ऊँचा सब से हिमाला उस पर मेरे देश का झंडा धरती पर आकाश का धोका मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है पर्बत कितना जम के अड़े हैं कैसे कैसे भीम खड़े हैं झरने गिर गिर पाँव पड़े हैं मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है पर्बत ऊँची चोटी वाले बाँके तिरछे नोक निकाले 'अर्जुन' जैसे बान सँभाले मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है आरती उस की चाँद उतारे ऊषा उस की माँग सँवारे सूरज उस पर सब कुछ वारे मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है झूमती गाएँ नाचते पंछी सारी दुनिया रक़्स-ओ-मस्ती 'कृष्ण' की बंसी हाए रे बंसी मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है जाल बिछाए जाल सँभाले कमसिन सड़कें माँग निकाले बाल बिखेरे नद्दी नाले मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है रात की नारी डूब गई है सुब्ह की देवी जाग चुकी है पनघट पर इक भीड़ लगी है मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है सुंदर नारी नार सँभाले घूँघट काढ़े और हटाए चलते फिरते प्रेम शिवाले मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है धरती की पोशाक नई है खेती जैसे सब्ज़ परी है मेहनत अपने बल पे खड़ी है मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है पड़ती बूँदें बजती पायल धरती जल-थल पंछी घाएल बोले पपीहा कूके कोयल मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है देश का एक इक नयन कटोरा सारे जहाँ पर डाले डोरा अपना जनता अपना एलोरा मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है ताज-महल बे-मिस्ल हसीना इस में मिला कितनों का पसीना जब कहीं चमका है ये नगीना मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है अहद-ए-वफ़ा की लाज तो देखो शाह के दिल पर राज तो देखो प्रेम के सर पर ताज तो देखो मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है भारत की तक़दीर को देखो जन्नत की तस्वीर को देखो आओ ज़रा कश्मीर को देखो मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है एक इसी कश्मीर का दर्शन कितनों के दुख दर्द का दर्पन आस नहाए बरसे जीवन मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है एक तरफ़ बंगाल का जादू सर से कमर तक गेसू ही गेसू फैली हुई 'टैगोर' की ख़ुशबू मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है काली बलाएँ सर पर पाले शाम अवध की डेरा डाले ऐसे में कौन अपने को सँभाले मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है हुस्न की तस्कीन इश्क़ की ढारस वाह रे अपनी सुब्ह-ए-बनारस घाट के पत्थर जैसे पारस मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है मंदिर मस्जिद और शिवाले मानवता का भार सँभाले कितने युगों को देखे-भाले मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है फूलों के मुखड़े चूम रहे हैं काले भँवरे घूम रहे हैं अम्न के बादल झूम रहे हैं मेरा निवास स्थान यही है प्यारा हिन्दोस्तान यही है
Nazeer Banarasi
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ऐ शांति अहिंसा की उड़ती हुई परी आ तू भी आ कि आ गई छब्बीस जनवरी सर पर बसंत घास ज़मीं पर हरी हरी फूलों से डाली डाली चमन की भरी भरी आई न तू तो सब की सुनूँगा खरी खरी तुझ बिन उदास है मिरी खेती हरी-भरी आ जल्द आ कि आ गई छब्बीस जनवरी घूँघट उलट रही है चमन की कली कली शाख़ें तो टेढ़ी-मेढ़ी हैं सूरत भली भली रंगीनियाँ हैं बाग़ में ख़ुशबू गली गली शबनम से है कली की पियाली भरी भरी आ तू भी आ कि आ गई छब्बीस जनवरी मुस्का रही है मुझ पे मिरे बाग़ की कली आँखें दिखा रही है मुझे कल की छोकरी ऐसा न हो कि फूल उड़ाएँ मिरी हँसी अब तैरने लगी मिरी आँखों में जल-परी आ जल्द आ कि आ गई छब्बीस जनवरी काँटे हों चाहे फूल हों फ़स्ल-ए-बहार के पाले हैं दोनों एक ही परवरदिगार के हम भारती शिकार हैं अपने ही वार के ऐ शांति अहिंसा की उड़ती हुई परी धरती पे आ कि आ गई छब्बीस जनवरी
Nazeer Banarasi
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कहीं पड़े न मोहब्बत की मार होली में अदास प्रेम करो दिल से प्यार होली में गले में डाल दो बाँहों का हार होली में उतारो एक बरस का ख़ुमार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में लगा के आग बढ़ी आगे रात की जोगन नए लिबास में आई है सुब्ह की मालन नज़र नज़र है कुँवारी अदा अदा कमसिन हैं रंग रंग से सब रंग-बार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में हवा हर एक को चल फिर के गुदगुदाती है नहीं जो हँसते उन्हें छेड़ कर हंसाती है हया गुलों को तो कलियों को शर्म आती है बढ़ाओ बढ़ के चमन का वक़ार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में ये किस ने रंग भरा हर कली की प्याली में गुलाल रख दिया किस ने गुलों की थाली में कहाँ की मस्ती है मालन में और माली में यही हैं सारे चमन की पुकार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में तुम्हीं से फूल चमन के तुम्हीं से फुलवारी सजाए जाओ दिलों के गुलाब की क्यारी चलाए जाओ नशीली नज़र से पिचकारी लुटाए जाओ बराबर बहार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में मिले हो बारा महीनों की देख-भाल के ब'अद ये दिन सितारे दिखाते हैं कितनी चाल के ब'अद ये दिन गया तो फिर आएगा एक साल के ब'अद निगाहें करते चलो चार यार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में बुराई आज न ऐसे रहे न वैसे रहे सफ़ाई दिल में रहे आज चाहे जैसे रहे ग़ुबार दिल में किसी के रहे तो कैसे रहे अबीर उड़ती है बन कर ग़ुबार होली में मिलो गले से गले बार बार होली में हया में डूबने वाले भी आज उभरते हैं हसीन शोख़ियाँ करते हुए गुज़रते हैं जो चोट से कभी बचते थे चोट करते हैं हिरन भी खेल रहे हैं शिकार होली में
Nazeer Banarasi
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"दिवाली" मिरी साँसों को गीत और आत्मा को साज़ देती है ये दिवाली है सब को जीने का अंदाज़ देती है हृदय के द्वार पर रह रह के देता है कोई दस्तक बराबर ज़िंदगी आवाज़ पर आवाज़ देती है सिमटता है अँधेरा पाँव फैलाती है दिवाली हँसाए जाती है रजनी हँसे जाती है दिवाली क़तारें देखता हूँ चलते-फिरते माह-पारों की घटाएँ आँचलों की और बरखा है सितारों की वो काले काले गेसू सुर्ख़ होंट और फूल से आरिज़ नगर में हर तरफ़ परियाँ टहलती हैं बहारों की निगाहों का मुक़द्दर आ के चमकाती है दिवाली पहन कर दीप-माला नाज़ फ़रमाती है दिवाली उजाले का ज़माना है उजाले की जवानी है ये हँसती जगमगाती रात सब रातों की रानी है वही दुनिया है लेकिन हुस्न देखो आज दुनिया का है जब तक रात बाक़ी कह नहीं सकते कि फ़ानी है वो जीवन आज की रात आ के बरसाती है दिवाली पसीना मौत के माथे पे छलकाती है दिवाली सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या गगन की जगमगाहट पड़ गई है आज मद्धम क्यूँँ मुंडेरों और छज्जों पर उतर आए हैं तारे क्या हज़ारों साल गुज़रे फिर भी जब आती है दिवाली महल हो चाहे कुटिया सब पे छा जाती है दिवाली इसी दिन द्रौपदी ने कृष्ण को भाई बनाया था वचन के देने वाले ने वचन अपना निभाया था जनम दिन लक्ष्मी का है भला इस दिन का क्या कहना यही वो दिन है जिस ने राम को राजा बनाया था कई इतिहास को एक साथ दोहराती है दिवाली मोहब्बत पर विजय के फूल बरसाती है दिवाली गले में हार फूलों का चरण में दीप-मालाएँ मुकुट सर पर है मुख पर ज़िंदगी की रूप-रेखाएँ लिए हैं कर में मंगल-घट न क्यूँँ घट घट पे छा जाएँ अगर परतव पड़े मुर्दा-दिलों पर वो भी जी जाएँ अजब अंदाज़ से रह रह के मस़्काती है दिवाली मोहब्बत की लहर नस नस में दौड़ाती है दिवाली तुम्हारा हूँ तुम अपनी बात मुझ से क्यूँँ छुपाते हो मुझे मालूम है जिस के लिए चक्कर लगाते हो बनारस के हो तुम को चाहिए त्यौहार घर करना बुतों को छोड़ कर तुम क्यूँँ इलाहाबाद जाते हो न जाओ ऐसे में बाहर 'नज़ीर' आती है दिवाली ये काशी है यहीं तो रंग दिखलाती है दिवाली
Nazeer Banarasi
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