nazmKuch Alfaaz

अजनबी अपने क़दमों को रोको ज़रा जानती हूँ तुम्हारे लिए ग़ैर हूँ फिर भी ठहरो ज़रा सुनते जाओ ये अश्कों-भरी दास्ताँ साथ लेते चलो ये मुजस्सम फ़ुग़ाँ आज दुनिया में मेरा कोई भी नहीं मेरी अम्मी नहीं मेरे अब्बा नहीं मेरी आपा नहीं मेरे नन्हे से मासूम भय्या नहीं मेरी इस्मत की मग़रूर किरनें नहीं वो घरौंदा नहीं जिस के साए-तले बोरियों के तरन्नुम को सुनती रही फूल चुनती रही गीत गाती रही मुस्कुराती रही आज कुछ भी नहीं आज कुछ भी नहीं मेरी नज़रों के सह में हुए आईने मेरी अम्मी के अब्बा के आपा के और मेरे नन्हे से मासूम भय्या के ख़ूँ से हैं दहशत-ज़दा आज मेरी निगाहों की वीरानियाँ चंद मजरूह यादों से आबाद हैं आज मेरी उमंगों के सूखे कँवल मेरे अश्कों के पानी से शादाब हैं आज मेरी तड़पती हुई सिसकियाँ एक साज़-ए-शिकस्ता की फ़रियाद हैं और कुछ भी नहीं भूक मिटती नहीं तन पे कपड़ा नहीं आस मादूम है आज दुनिया में मेरा कोई भी नहीं आज दुनिया में मेरा कोई भी नहीं अजनबी अपने क़दमों को रोको ज़रा सुनते जाओ ये अश्कों-भरी दास्ताँ सुनते जाओ ये अश्कों-भरी दास्ताँ साथ लेते चलो ये मुजस्सम फ़ुग़ाँ मेरी अम्मी बनो मेरे अब्बा बन्नो मेरी आपा बनो मेरे नन्हे से मासूम भय्या बनो मेरे इस्मत की मग़रूर किरनें बनो मेरे कुछ तो बनो मेरे कुछ तो बनो मेरे कुछ तो बनो

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"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ

Ammar Iqbal

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"सौदाई" अजब दिल है न जीता है न मरता है न सीने में ठहरता है न बाहर ही निकलता है अजब जाँ है तरसती है कि तू आए झिझकती है कि तू आए तो ना-मालूम क्या होगा परेशाँ है कि दुनिया क्या कहेगी पशेमाँ है कि अपने बा-हमी रिश्ते में वो दम है न वो ख़म है मगर फिर भी बिलखती है कि तन्हाई ने ऐसा मार रक्खा है न तू आई तो मेरा क्या बनेगा अजब तू है न अपनों में न ग़ैरों में न ग़म-अंदोज़ ख़ल्वत में न जाँ-अफ़रोज़ जल्वत में मुझे डर है कि तुझ सेे मेल होगा तो कहाँ होगा किसी सर-सब्ज़ वादी में के इस वीरान कुटिया में इसी दुनिया में या फिर सरहदों के पार उक़्बा में अजब मैं हूँ मुफ़क्किर भी मुहक़्क़िक़ भी मुसन्निफ़ भी मगर अफ़सोस आशिक़ भी गया-गुज़रा सा शाइ'र भी बईद-अज़-अक़्ल भी और रस्म-ए-दुनिया से भी बे-गाना जो अनजाने में तुझ सेे ढेर सारा प्यार कर बैठा ब-हर-सूरत अगर कुछ वाक़िया है तो फ़क़त ये है मिरा दिल तुझ पे शैदा है मिरी जाँ तुझ पे वारी है मगर फिर भी ये हसरत है कि कोई मरहम-ए-दिल दिल को समझाए कोई गिरवीदा-ए-जाँ जाँ को बतलाए कि तू इक पैकर-ए-दिलकश नहीं है एक नागन है जो अपनों ही को डसने के लिए बेताब रहती है ये सब कुछ जान कर भी मैं तिरे इन गेसुओं के पेच-ओ-ख़म का सिर-फिरा क़ैदी तड़पता रहता हूँ मैं इस लिए शायद के तू आए तू आ कर मुझ को पहले की तरह दोबारा डस जाए

Dharmesh bashar

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"मशवरा" बदलेंगे लोग बदलेंगे उन के तेवर भी जाने अनजाने में हर तेवर समझता हूँ मैं अपने अलफ़ाज़ को दिल-ओ-दिमाग़ से लिखता हूँ दिल टूटा आशिक़ हूँ हर रंग को परखता हूँ अपनी उन हरकत और बे-वजह प्यार पर होने पर एक शाम ख़ुद में कहीं खटकता हूँ तस्वीर को देख कर तेरी ले कर तेरा नाम उन पुरानी याद में हर रोज़ कहीं भटकता हूँ तेरी सब चीज़ और सब तोहफ़ों को ख़ूब उनहें सँवार कर और सँभाले रखता हूँ भूल कर तुझ को अपने मन से रद्द कर के तेरी यादें शुरू करने एक नई ज़िंदगी सुब्ह-सवेरे निकलता हूँ बे-वफ़ा मैं न तुझे कहूँगा न ही ख़ुद को मतलबी रहो हमेशा तुम ख़ुशहाल मिन्नतें इस की करता हूँ मशवरा-ए-ज़फ़र सुन लो दोस्तों आज मैं तुम को कहता हूँ पहले राज़ी वालिदैन को बा'द ही इश्क़ करना रोज़ ऐसे कितने आशिक़ों मैं देखता बिछड़ता हूँ

ZafarAli Memon

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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हमारे मुन्ने को चाह थी रेडियो ख़रीदें कि अब हमारे यहाँ फ़राग़त की रौशनी थी मैं अपनी देरीना तंग-दस्ती की दास्ताँ उस को क्या सुनाता उठा के ले आया तंग-ओ-तारीक कोठरी से क़लील तनख़्वाह के चिचोड़े हुए निवाले और उन में मेरी नहीफ़ बीवी ने अपनी दो-चार बाक़ी-माँदा शिकस्त-आमेज़ आरज़ूओं का ख़ून डाला न जाने कब से था प्यारे मुन्ने ने रेडियो का ये ख़्वाब पाला ये एक हफ़्ते की बात है और कल से मुन्ना ये कह रहा है ये जानवर सुब्ह-ओ-शाम बे-कार बोलता है मुहीब ख़बरों का ज़हर गीतों में घोलता है गली में कोई फ़क़ीर आए तो उस को दे दो मुझे इकन्नी का मोर ले दो

Balraj Komal

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मैं रात और दिन की मसाफ़त में रंगों की तफ़्सीर में अपने सारे अज़ीज़ों के अपने ही हाथों से क़त्ल-ए-मुसलसल में मसरूफ़ हूँ फिर मैं क्यूँँ सोचता हूँ सर-ए-जाम, हर शब कि दीदा-वरी की मता-ए-फ़िरोज़ाँ से सरशार होता तो हर ख़ुफ़्ता सर-बस्ता तहरीर से मैं गले मिल के रोता सदाओं की सरगोशियों में उतरता अजब हादसा है कि कुछ देर पहले मिरे सामने एक घाइल परिंदा गिरा है मिरे पाँव में सामने के फ़सुर्दा ओ बे-बर्ग बे-रंग से पेड़ से मेरे जाम-ए-शिकस्ता में बाक़ी थे क़तरे मय-ए-ख़ाम के कुछ इन्हें चश्म-ए-मिन्क़ार से ये मुसाफ़िर बड़े ग़ौर से देखता है इन्हें गिन रहा है ये शायद मैं सैलाब-ए-तहलील में हूँ यहाँ से कहाँ जाऊँगा दूर गर जा सकता तो वहाँ से यहाँ लौट कर किस तरह आऊँगा मैं

Balraj Komal

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तीरगी में भयानक सदाएँ उठीं और धुआँ सा फ़ज़ाओं में लहरा गया मौत की सी सपेदी उफ़ुक़-ता-उफ़ुक़ तिलमिलाने लगी और फिर एक दम सिसकियाँ चार-सू थरथरा कर उठीं एक माँ सीना-कूबी से थक कर गिरी इक बहन अपनी आँखों में आँसू लिए राह तकती रही एक नन्हा खिलौने की उम्मीद में सर को दहलीज़ पर रख के सोता रहा एक मा'सूम सूरत दरीचे से सर को लगाए हुए ख़्वाब बुनती रही मुंतज़िर थीं निगाहें बड़ी देर से मुंतज़िर ही रहीं मौत की सी सपेदी उफ़ुक़-ता-उफ़ुक़ तिलमिलाती रही

Balraj Komal

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रात को सोने से पहले मुझ से नन्हा कह रहा था चाँद लाखों मील क्यूँँकर दूर है क्यूँँ चमकते हैं सितारे दो ग़ुबारे काली बिल्ली क्या हुई मेरे हाथी को पिलाओ गर्म पानी वो कहानी मुझ को नींद आने लगी निस्फ़ शब को आते-जाते बादलों के दरमियाँ कुछ हुरूफ़-ए-ना-तवाँ बूंदियों के रूप में काग़ज़ के इक पुर्ज़े पे मेरे सामने देर तक गिरते रहे नज़्म के नक़्श-ए-गुरेज़ाँ ने सितम लाखों सहे अन-गिनत बरसों पे फैली चश्म-ओ-दिल की दास्ताँ रात के पिछले-पहर की गोद में तेज़-तर होती हुई बारिश के लोरी सुन के शायद सो गई सुब्ह-दम खिल उठे चारों तरफ़ बच्चों के रंगीं क़हक़हों और तालियों के शोख़ फूल रात-भर की तेज़ बारिश की बनाई झील में डगमगाती डोलती चल रही थीं छोटी छोटी कश्तियाँ मैं ने देखा इन में नन्हे की भी थी प्यारी सी नाव नज़्म का नक़्श-ए-गुरेज़ाँ जाना-पहचाना सा काग़ज़ जाने-पहचाने हुरूफ़ नन्हा बोला आज जो ताली न पीटे बेवक़ूफ़

Balraj Komal

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मुंजमिद ख़ून जब सुर्ख़ से कल सियह हो गया ख़ाक-ए-पा वाक़िआ'' हो गया ज़र्द लड़की का चेहरा फ़रिश्तों ने देखा था रंगों की तरतीब में जाने पहचाने चेहरों से मेरी मुलाक़ात जब अजनबी सी लगी आइना देखने के लिए मैं उठा आइना हो गया तीरगी से गुज़रती हुई रौशनी बर्ग-ए-असरार थी आँख के सामने रौशनी ख़ून थी ख़ून पहले गिरा मुंजमिद हो गया फिर सियह हो गया ज़र्द लड़की का चेहरा गुज़रता हुआ बर्ग-ए-असरार था रहगुज़र से लपक कर मकाँ में गया फिर दरीचे में उभरा फ़रिश्तों ने देखा था मैं ने भी देखा था मैं भी फ़रिश्ता था कल के फ़साने की तरतीब में लफ़्ज़ मुझ से जुदा थे मगर आज मेरे हैं क्यूँ आज भी अजनबी हो गए उन को क्या हो गया उन को क्या हो गया मुंजमिद ख़ून पहले सियह हो गया फिर फ़क़त वाक़िआ'' था मगर ज़र्द लड़की का चेहरा अजब नक़्श था मैं मिटाता था लेकिन वो मिटता न था दीद का हादिसा पहले मंज़र बना फिर फ़क़त एक मंज़र से बे-कार सा सिलसिला हो गया ज़र्द लड़की का चेहरा ख़ुदा से बड़ा ख़्वाब था

Balraj Komal

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