जब मैं बच्चा था रावी के गालों से डरता था अब दुश्मन की चालों से डरता हूँ मेरे बचपन में आग की अतराफ़ द्राविड़ लड़कियाँ गीत गाती थी और अब मैं एक होटल में बैंड बजाता हूँ और लोमड़ी की खाल से अपना लिबास सीता हूँ
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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तमाम रात सितारों से बात रहती थी कि सुब्ह होते ही घर से फूल आते थे वो किस के नक़्श उभरते थे तेग़ पर अपनी वो किस ख़याल में हम जंग जीत जाते थे हमें भी क़हत में एक चश्म-ए-ज़र मुयस्सर थी कोई हथेलियाँ भर-भर के मय पिलाता था भरा हुआ था समुंदर इन्हीं ख़जानों से निकाल लेते थे जो ख़्वाब रास आता था वो मेरे साथ रहा करता ख़ुशदिली से बहुत कि उन दिनों मेरा दुनिया पर हाथ पड़ता था हमारी जेब भरी रहती दास्तानों से हमें ख़याल का जंगल भी साथ पड़ता था वो सारे दिन का थका ख़्वाब-गाह में आता थपक थपक के सुलाता तो हाथ सो जाते नसीम-ए-सुब्ह किसी लहर में जगाती हमें और उठते उठते हमें दिन के एक हो जाते सरों से खेंच लिया वक़्त ने वफ़ा का लिहाफ़ वो पर्दे उठ गए जो तायनात रहते थे बिछड़ गया है वो संगीन मौसमों में कहीं वो मेरे दिल पर सदा जिस के हाथ रहते थे वो बू-ए-गुल हमें जिस गुलिस्ताँ में लाई थी वहाँ भी जा के उस का निशान देख लिया ये शाख़-ए-वस्ल दुबारा हरी नहीं होती हवा-ए-हिज्र ने मेरा मकान देख लिया वो अब्र जिस की तग-ओ-दौ में जिस्म सूख गए दुबारा छत पे है और छत पे सीढ़ी जाती है ठहर ठहर के उस सम्त ऐसे बढ़ रहा हूँ कि जैसे हामला औरत कदम उठाती है ये ज़हर बादा-ए-इशरत है और दे मेरे रब वो फिर चला गया मैं फिर ज़मीन चाटूँगा मैं फिर से हाथ में तेशा उठाए सोचता हूँ मैं कोहकन वही ख़ुश-ख़त पहाड़ काटूँगा बदन की बर्फ़ पिघलने के बा'द पूछेंगे बहुत पता है तहम्मुल के साथ बहते हो अज़ल के हाथ पे खेंची हुई समय की लकीर किसी से पहले मिटी है जो मुझ सेे कहते हो
Tehzeeb Hafi
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अव्वल हल्क़ा-ए-याराँ में कनआँ रात के पिछले पहर बस्तियों से दूर नहरों के किनारे ख़ेमा-ज़न वो दरख़्तों की हवाओं में सितारे ख़ेमा-ज़न बस्तियों से दूर सहरा के नज़ारे ख़ेमा-ज़न हल्क़ा-ए-याराँ में कितने नाज़नीं नाज़ुक कमर दोम रक़्स के हंगाम कितने बाज़ुओं का पेच-ओ-ख़म देखने वालों की नज़रों में उतर आने को है ये बदन का लोच जैसे रूह बल खाने को है ये नज़र के सामने कितने ही आलम ख़्वाब से रक़्स के हंगाम उभर आते हैं कितने शोख़ रंग और कितने तेज़ हो जाते हैं नज़रों के ख़दंग ये ख़यालों के गुलिस्ताँ ये निगाहों के क़फ़स रक़्स के ये दाएरे शोला-ब-दामाँ हर नफ़स सोयम रस्म अदा होने न पाई थी कि ख़ेमों के क़रीब शह-नशीं की सम्त दौड़े इस तरह वहशी नक़ीब कितने अरमाँ कितने ग़म अश्कों में ढल कर रह गए ऐन जश्न-ए-रस्म के हंगाम कनआँ का गुरेज़ कितने मंज़र आरिज़-ओ-लब के पिघल कर रह गए कितने लब हसरत-चाशीदा कितनी आँखें अश्क-रेज़ जैसे साग़र आएँ हाथों में मगर टूटे हुए छेड़ियो मत ज़िंदगी के बाल-ओ-पर टूटे हुए तार हैं इस साज़ के ऐ नग़्मा-गर टूटे हुए चहारुम ये क़बीलों के शुयूख़-ए-पुख़्ता-उम्र ओ सख़्त-कोश वादी-ए-दजला के शहरी कुर्द के ख़ाना-ब-दोश लड़ रहे हैं अपनी अपनी कज-कुलाही के लिए कौन दारू बन के आए कम-निगाही के लिए गर्मी-ए-गुफ़्तार से मुमकिन नहीं दिल का रफ़ू गुफ़्तुगू से और बढ़ जाता है जोश-ए-गुफ़्तुगू
Qamar Jameel
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एशिया की इस वीरान पहाड़ी पर मौत एक ख़ाना-ब-दोश लड़की की तरह घूम रही है मेरी रौशनी और अनार के दरख़्तों में क़ज़्ज़ाक़ों के चाक़ू चमकते हैं और सर पर वो चाँद है जो इस पहाड़ी का पहला पैग़म्बर है इस पहाड़ी पर फ़ातिमा रहती है उस के कपड़ों में वो कबूतर हैं जो कभी उड़ नहीं सकते ख़ुदा ने हमें एक ग़ार में बंद कर दिया है और हमारे सरों पर सियाह रात जैसा पत्थर रख दिया है
Qamar Jameel
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ख़्वाबों की अफ़्सुर्दा हवा में रहने वाले सुर्ख़ गुलाब जंगल की तारीक फ़ज़ा में ले के निकल आते हैं चराग़ रात गए जब चाँद का चेहरा देखते हैं शरमाते हैं और किसी ग़मगीन शजर के साए में सो जाते हैं देखो अपने दिल की लगन में बहने वाले सुर्ख़ गुलाब आख़िर अपने दिल की लगन में अपना पा जाते हैं सुराग़ या'नी ख़्वाब में सूरज बन के जंगल में लहराते हैं वो जो किसी ग़मगीन शजर के साए में सो जाते हैं
Qamar Jameel
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मैं हुस्न-ए-मुत्लक़ की कुर्सी पर बैठ कर एक गदागर से शहर का फ़साना सुन रहा हूँ
Qamar Jameel
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ये अदाएँ रक़्स के हंगाम कितनी रक़्स-ख़ेज़ वो जवानान-ए-क़बीला होश से बाहर चले काकुलों के सुंबुलिस्ताँ आरिज़ों पर अक्स-रेज़ जैसे साहिल का नज़ारा आब-ए-दरिया पर चले इक तअस्सुर है कि रक़्साँ हो रहा है हर तरफ़ शमएँ रौशन हैं चराग़ाँ हो रहा है हर तरफ़ आग के अतराफ़ रौशन जैसे इक फ़ानूस-ए-रक़्स रक़्स करती लड़कियाँ कुछ आग के अतराफ़ यूँँ जैसे सतह-ए-आब पर महताब के हाले का अक्स जिस को झूले में झुलाएँ मौज-हा-ए-सीमगूँ मिल के जब झुकती हैं लगती हैं कली मुँह-बंद सी और जब तनती हैं किस दर्जा भली दिल-बन्द सी इक तरफ़ वो सुर्ख़ मिशअल हाथ में ले कर चले कुछ हसीं कुछ नाज़नीं कुछ सर्व-क़द कुछ सीम-तन जैसे कुछ फूलों के नाज़ुक नर्म-रौ लश्कर चले नर्म-रफ़्तारी में दजला के तमव्वुज की फबन जैसे सहराओं के आहू महव-ए-गुल-गश्त-ए-चमन ये हसीं आहू-क़दम आहू-नफ़स आहू-मिज़ाज ले रहे हैं नौ-जवानान-ए-क़बीला से ख़िराज जल्वा-पैरा जल्वा-सामाँ कितने दिलकश माहताब कितने अफ़्सानों के पैकर कितने रंग-ओ-बू के ख़्वाब वो जबीनों के अरक़ में जैसे शोलों के सराब जैसे संदल में शरारों के तबस्सुम महव-ए-ख़्वाब शोला-अफ़्शाँ काकुलों में सुर्ख़ फूलों के चराग़ जैसे तारीकी में मिल जाएँ उजाले के सुराग़ आरिज़ों की चाँदनी फैली हुई सी हर तरफ़ हर तरफ़ है एक तरकश एक आहू हर क़दम कर रहे हैं रक़्स दफ़ पर महविशान-ए-जल्वा-ताब हर तरफ़ बिखरे हुए हैं वादी-ए-दजला के ख़्वाब कुछ कँवल कुछ नस्तरन कुछ सुंबुलिस्ताँ कुछ गुलाब
Qamar Jameel
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