अव्वल हल्क़ा-ए-याराँ में कनआँ रात के पिछले पहर बस्तियों से दूर नहरों के किनारे ख़ेमा-ज़न वो दरख़्तों की हवाओं में सितारे ख़ेमा-ज़न बस्तियों से दूर सहरा के नज़ारे ख़ेमा-ज़न हल्क़ा-ए-याराँ में कितने नाज़नीं नाज़ुक कमर दोम रक़्स के हंगाम कितने बाज़ुओं का पेच-ओ-ख़म देखने वालों की नज़रों में उतर आने को है ये बदन का लोच जैसे रूह बल खाने को है ये नज़र के सामने कितने ही आलम ख़्वाब से रक़्स के हंगाम उभर आते हैं कितने शोख़ रंग और कितने तेज़ हो जाते हैं नज़रों के ख़दंग ये ख़यालों के गुलिस्ताँ ये निगाहों के क़फ़स रक़्स के ये दाएरे शोला-ब-दामाँ हर नफ़स सोयम रस्म अदा होने न पाई थी कि ख़ेमों के क़रीब शह-नशीं की सम्त दौड़े इस तरह वहशी नक़ीब कितने अरमाँ कितने ग़म अश्कों में ढल कर रह गए ऐन जश्न-ए-रस्म के हंगाम कनआँ का गुरेज़ कितने मंज़र आरिज़-ओ-लब के पिघल कर रह गए कितने लब हसरत-चाशीदा कितनी आँखें अश्क-रेज़ जैसे साग़र आएँ हाथों में मगर टूटे हुए छेड़ियो मत ज़िंदगी के बाल-ओ-पर टूटे हुए तार हैं इस साज़ के ऐ नग़्मा-गर टूटे हुए चहारुम ये क़बीलों के शुयूख़-ए-पुख़्ता-उम्र ओ सख़्त-कोश वादी-ए-दजला के शहरी कुर्द के ख़ाना-ब-दोश लड़ रहे हैं अपनी अपनी कज-कुलाही के लिए कौन दारू बन के आए कम-निगाही के लिए गर्मी-ए-गुफ़्तार से मुमकिन नहीं दिल का रफ़ू गुफ़्तुगू से और बढ़ जाता है जोश-ए-गुफ़्तुगू
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं अपने घर में दिए की तरह जलना चाहता था मगर अब एक फ़्लैट में बल्ब की सूरत जल रहा हूँ अगर कोई मुझे बुझाना चाहता है तो मेरे बच्चे फिर मुझे जला देते हैं
Qamar Jameel
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मैं हुस्न-ए-मुत्लक़ की कुर्सी पर बैठ कर एक गदागर से शहर का फ़साना सुन रहा हूँ
Qamar Jameel
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मैं एक बूढे बरगद का दरख़्त हूँ जिस की शाख़ें कट चुकी हैं और पत्ते बिखर चुके हैं मेरे सीने में एक ख़ला है जिस में एक दिन एक बूढे बंदर ने पनाह ली थी नहीं ऐ बूढे बरगद तुम उस गुम्बद वाली इमारत से बेहतर हो जिस में एक ज़ालिम बादशाह की क़ब्र है नहीं तुम नहीं जानते उस गुम्बद के पीछे झोंपड़ियों में कुछ दिए जल रहे थे जिन हवाओं ने ये दिए बुझाए हैं मैं उन हवाओं से अब भी लड़ रहा हूँ
Qamar Jameel
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ख़्वाबों की अफ़्सुर्दा हवा में रहने वाले सुर्ख़ गुलाब जंगल की तारीक फ़ज़ा में ले के निकल आते हैं चराग़ रात गए जब चाँद का चेहरा देखते हैं शरमाते हैं और किसी ग़मगीन शजर के साए में सो जाते हैं देखो अपने दिल की लगन में बहने वाले सुर्ख़ गुलाब आख़िर अपने दिल की लगन में अपना पा जाते हैं सुराग़ या'नी ख़्वाब में सूरज बन के जंगल में लहराते हैं वो जो किसी ग़मगीन शजर के साए में सो जाते हैं
Qamar Jameel
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जब मैं बच्चा था रावी के गालों से डरता था अब दुश्मन की चालों से डरता हूँ मेरे बचपन में आग की अतराफ़ द्राविड़ लड़कियाँ गीत गाती थी और अब मैं एक होटल में बैंड बजाता हूँ और लोमड़ी की खाल से अपना लिबास सीता हूँ
Qamar Jameel
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