मैं अपने घर में दिए की तरह जलना चाहता था मगर अब एक फ़्लैट में बल्ब की सूरत जल रहा हूँ अगर कोई मुझे बुझाना चाहता है तो मेरे बच्चे फिर मुझे जला देते हैं
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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मैं हुस्न-ए-मुत्लक़ की कुर्सी पर बैठ कर एक गदागर से शहर का फ़साना सुन रहा हूँ
Qamar Jameel
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अव्वल हल्क़ा-ए-याराँ में कनआँ रात के पिछले पहर बस्तियों से दूर नहरों के किनारे ख़ेमा-ज़न वो दरख़्तों की हवाओं में सितारे ख़ेमा-ज़न बस्तियों से दूर सहरा के नज़ारे ख़ेमा-ज़न हल्क़ा-ए-याराँ में कितने नाज़नीं नाज़ुक कमर दोम रक़्स के हंगाम कितने बाज़ुओं का पेच-ओ-ख़म देखने वालों की नज़रों में उतर आने को है ये बदन का लोच जैसे रूह बल खाने को है ये नज़र के सामने कितने ही आलम ख़्वाब से रक़्स के हंगाम उभर आते हैं कितने शोख़ रंग और कितने तेज़ हो जाते हैं नज़रों के ख़दंग ये ख़यालों के गुलिस्ताँ ये निगाहों के क़फ़स रक़्स के ये दाएरे शोला-ब-दामाँ हर नफ़स सोयम रस्म अदा होने न पाई थी कि ख़ेमों के क़रीब शह-नशीं की सम्त दौड़े इस तरह वहशी नक़ीब कितने अरमाँ कितने ग़म अश्कों में ढल कर रह गए ऐन जश्न-ए-रस्म के हंगाम कनआँ का गुरेज़ कितने मंज़र आरिज़-ओ-लब के पिघल कर रह गए कितने लब हसरत-चाशीदा कितनी आँखें अश्क-रेज़ जैसे साग़र आएँ हाथों में मगर टूटे हुए छेड़ियो मत ज़िंदगी के बाल-ओ-पर टूटे हुए तार हैं इस साज़ के ऐ नग़्मा-गर टूटे हुए चहारुम ये क़बीलों के शुयूख़-ए-पुख़्ता-उम्र ओ सख़्त-कोश वादी-ए-दजला के शहरी कुर्द के ख़ाना-ब-दोश लड़ रहे हैं अपनी अपनी कज-कुलाही के लिए कौन दारू बन के आए कम-निगाही के लिए गर्मी-ए-गुफ़्तार से मुमकिन नहीं दिल का रफ़ू गुफ़्तुगू से और बढ़ जाता है जोश-ए-गुफ़्तुगू
Qamar Jameel
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जब मैं बच्चा था रावी के गालों से डरता था अब दुश्मन की चालों से डरता हूँ मेरे बचपन में आग की अतराफ़ द्राविड़ लड़कियाँ गीत गाती थी और अब मैं एक होटल में बैंड बजाता हूँ और लोमड़ी की खाल से अपना लिबास सीता हूँ
Qamar Jameel
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एशिया की इस वीरान पहाड़ी पर मौत एक ख़ाना-ब-दोश लड़की की तरह घूम रही है मेरी रौशनी और अनार के दरख़्तों में क़ज़्ज़ाक़ों के चाक़ू चमकते हैं और सर पर वो चाँद है जो इस पहाड़ी का पहला पैग़म्बर है इस पहाड़ी पर फ़ातिमा रहती है उस के कपड़ों में वो कबूतर हैं जो कभी उड़ नहीं सकते ख़ुदा ने हमें एक ग़ार में बंद कर दिया है और हमारे सरों पर सियाह रात जैसा पत्थर रख दिया है
Qamar Jameel
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ये समाँ और रात की जादूगरी चाँद का ले कर चली हाथों में ताज कुछ तिलिस्मी लोग पथराए हुए कुछ तिलिस्मी लड़कियाँ जैसे तमन्नाओं के मोर जिन से आ कर खेलती है रात की नीलम-परी और जा कर नाचती है शाम तक हर क़दम पर एक शहज़ादे की मौत
Qamar Jameel
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