मैं एक बूढे बरगद का दरख़्त हूँ जिस की शाख़ें कट चुकी हैं और पत्ते बिखर चुके हैं मेरे सीने में एक ख़ला है जिस में एक दिन एक बूढे बंदर ने पनाह ली थी नहीं ऐ बूढे बरगद तुम उस गुम्बद वाली इमारत से बेहतर हो जिस में एक ज़ालिम बादशाह की क़ब्र है नहीं तुम नहीं जानते उस गुम्बद के पीछे झोंपड़ियों में कुछ दिए जल रहे थे जिन हवाओं ने ये दिए बुझाए हैं मैं उन हवाओं से अब भी लड़ रहा हूँ
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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मैं हुस्न-ए-मुत्लक़ की कुर्सी पर बैठ कर एक गदागर से शहर का फ़साना सुन रहा हूँ
Qamar Jameel
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जब मैं बच्चा था रावी के गालों से डरता था अब दुश्मन की चालों से डरता हूँ मेरे बचपन में आग की अतराफ़ द्राविड़ लड़कियाँ गीत गाती थी और अब मैं एक होटल में बैंड बजाता हूँ और लोमड़ी की खाल से अपना लिबास सीता हूँ
Qamar Jameel
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ये समाँ और रात की जादूगरी चाँद का ले कर चली हाथों में ताज कुछ तिलिस्मी लोग पथराए हुए कुछ तिलिस्मी लड़कियाँ जैसे तमन्नाओं के मोर जिन से आ कर खेलती है रात की नीलम-परी और जा कर नाचती है शाम तक हर क़दम पर एक शहज़ादे की मौत
Qamar Jameel
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अव्वल हल्क़ा-ए-याराँ में कनआँ रात के पिछले पहर बस्तियों से दूर नहरों के किनारे ख़ेमा-ज़न वो दरख़्तों की हवाओं में सितारे ख़ेमा-ज़न बस्तियों से दूर सहरा के नज़ारे ख़ेमा-ज़न हल्क़ा-ए-याराँ में कितने नाज़नीं नाज़ुक कमर दोम रक़्स के हंगाम कितने बाज़ुओं का पेच-ओ-ख़म देखने वालों की नज़रों में उतर आने को है ये बदन का लोच जैसे रूह बल खाने को है ये नज़र के सामने कितने ही आलम ख़्वाब से रक़्स के हंगाम उभर आते हैं कितने शोख़ रंग और कितने तेज़ हो जाते हैं नज़रों के ख़दंग ये ख़यालों के गुलिस्ताँ ये निगाहों के क़फ़स रक़्स के ये दाएरे शोला-ब-दामाँ हर नफ़स सोयम रस्म अदा होने न पाई थी कि ख़ेमों के क़रीब शह-नशीं की सम्त दौड़े इस तरह वहशी नक़ीब कितने अरमाँ कितने ग़म अश्कों में ढल कर रह गए ऐन जश्न-ए-रस्म के हंगाम कनआँ का गुरेज़ कितने मंज़र आरिज़-ओ-लब के पिघल कर रह गए कितने लब हसरत-चाशीदा कितनी आँखें अश्क-रेज़ जैसे साग़र आएँ हाथों में मगर टूटे हुए छेड़ियो मत ज़िंदगी के बाल-ओ-पर टूटे हुए तार हैं इस साज़ के ऐ नग़्मा-गर टूटे हुए चहारुम ये क़बीलों के शुयूख़-ए-पुख़्ता-उम्र ओ सख़्त-कोश वादी-ए-दजला के शहरी कुर्द के ख़ाना-ब-दोश लड़ रहे हैं अपनी अपनी कज-कुलाही के लिए कौन दारू बन के आए कम-निगाही के लिए गर्मी-ए-गुफ़्तार से मुमकिन नहीं दिल का रफ़ू गुफ़्तुगू से और बढ़ जाता है जोश-ए-गुफ़्तुगू
Qamar Jameel
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एशिया की इस वीरान पहाड़ी पर मौत एक ख़ाना-ब-दोश लड़की की तरह घूम रही है मेरी रौशनी और अनार के दरख़्तों में क़ज़्ज़ाक़ों के चाक़ू चमकते हैं और सर पर वो चाँद है जो इस पहाड़ी का पहला पैग़म्बर है इस पहाड़ी पर फ़ातिमा रहती है उस के कपड़ों में वो कबूतर हैं जो कभी उड़ नहीं सकते ख़ुदा ने हमें एक ग़ार में बंद कर दिया है और हमारे सरों पर सियाह रात जैसा पत्थर रख दिया है
Qamar Jameel
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