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ये अदाएँ रक़्स के हंगाम कितनी रक़्स-ख़ेज़ वो जवानान-ए-क़बीला होश से बाहर चले काकुलों के सुंबुलिस्ताँ आरिज़ों पर अक्स-रेज़ जैसे साहिल का नज़ारा आब-ए-दरिया पर चले इक तअस्सुर है कि रक़्साँ हो रहा है हर तरफ़ शमएँ रौशन हैं चराग़ाँ हो रहा है हर तरफ़ आग के अतराफ़ रौशन जैसे इक फ़ानूस-ए-रक़्स रक़्स करती लड़कियाँ कुछ आग के अतराफ़ यूँँ जैसे सतह-ए-आब पर महताब के हाले का अक्स जिस को झूले में झुलाएँ मौज-हा-ए-सीमगूँ मिल के जब झुकती हैं लगती हैं कली मुँह-बंद सी और जब तनती हैं किस दर्जा भली दिल-बन्द सी इक तरफ़ वो सुर्ख़ मिशअल हाथ में ले कर चले कुछ हसीं कुछ नाज़नीं कुछ सर्व-क़द कुछ सीम-तन जैसे कुछ फूलों के नाज़ुक नर्म-रौ लश्कर चले नर्म-रफ़्तारी में दजला के तमव्वुज की फबन जैसे सहराओं के आहू महव-ए-गुल-गश्त-ए-चमन ये हसीं आहू-क़दम आहू-नफ़स आहू-मिज़ाज ले रहे हैं नौ-जवानान-ए-क़बीला से ख़िराज जल्वा-पैरा जल्वा-सामाँ कितने दिलकश माहताब कितने अफ़्सानों के पैकर कितने रंग-ओ-बू के ख़्वाब वो जबीनों के अरक़ में जैसे शोलों के सराब जैसे संदल में शरारों के तबस्सुम महव-ए-ख़्वाब शोला-अफ़्शाँ काकुलों में सुर्ख़ फूलों के चराग़ जैसे तारीकी में मिल जाएँ उजाले के सुराग़ आरिज़ों की चाँदनी फैली हुई सी हर तरफ़ हर तरफ़ है एक तरकश एक आहू हर क़दम कर रहे हैं रक़्स दफ़ पर महविशान-ए-जल्वा-ताब हर तरफ़ बिखरे हुए हैं वादी-ए-दजला के ख़्वाब कुछ कँवल कुछ नस्तरन कुछ सुंबुलिस्ताँ कुछ गुलाब

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"मुझ सेे पहले" मुझ सेे पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा खो चुका है जो किसी और की रा'नाई में शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में मैं ने माना कि शब-ओ-रोज़ के हंगामों में वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ता चाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़ मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ता फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं ज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता है दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं ये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशीमाँ हो कर तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले और मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझा एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ

Ahmad Faraz

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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??

Shadab Javed

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"कच्ची दीवारें" मेरी माँ हर दिन अपने बूढे हाथों से इधर उधर से मिट्टी ला कर घर की कच्ची दीवारों के ज़ख़्मों को भरती रहती है तेज़ हवाओं के झोंकों से बेचारी कितना डरती है मेरी माँ कितनी भोली है बरसों की सीली दीवारें छोटे-मोटे पैवंदों से आख़िर कब तक रुक पाएँगी जब कोई बादल गरजेगा हर हर करती ढह जाएँगी

Nida Fazli

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"कछुएं" ख़बर आई की काशी से बहते-बहते चले आए है कुछ बेजान कछुएं सूबा-ए-मगध की ओर करते साँसों की डोर गंगा में प्रवाहित तभी एक और ख़बर चल पड़ी इस के ठीक विपरीत दोनों तरफ़ से चलता रहा ख़बरों का पुरज़ोर खंडन होता रहा बखान की किस की कमीज़ है कितनी दागदार कितने शफ़ीक़ हैं दोनों के ताजदार पर सामने न आया कोई दावेदार क्योंकि वो कछुएं - न तो थे कोई स्वर्णमयी हंस जिन्हे गढ़कर बन सके किसी शासक का राज-मुकुट और न ही कोई जमीन का टुकड़ा जिसे पाने की सनक में भिड जाए दो देशों की सेनाएँ वो तो थे केवल मामूली कछुएं जिन्हें पहली साँस के साथ ही सिखाया गया रेंगना ताकि रेंगते-रेंगते गल जाए सारी उन की हड्डियाँ और मृत्योपरांत भी मुयस्सर हो न पाए चंद लकड़ियाँ मगर निर्माणाधीन रहे बादशाह के रथ का पहिया मैं भी रोज़ की तरह रेंग रहा हूँ पढ़ते हुए अपना अखबार आज की सुर्खियाँ कहती है - "अंत्येष्टि का अधिकार आर्टिकल इक्कीस आर्टिकल पच्चीस"

Vishwajeet Gudadhe

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सुन मेरे ऐ प्यारे रब सुन मेरे ऐ प्यारे रब सारी मुश्किल कर दे हल तू तो वाक़िफ़ है कैसे कटता है मेरा हर पल फ़िक्र-ए-फ़र्दा या तंगी मर्ज़-ए-तन या मजबूरी मुश्किल मुश्किल हर-सू है कितनी क़िस्में हैं इस की माना इन सब के पीछे कुछ तो बेहतर ही होगा मेरी भी ख़ातिर तू ने कुछ है बेहतर ही सोचा पर फिर भी घबराए जी जब सोचूँ मैं मुस्तक़बिल आँखें हो जाती हैं नम अंदर से जलता है दिल चारो जानिब तारीकी दिखती है मुझ को जब जब दिल तब तब ये कहता है सुन मेरे ऐ प्यारे रब

Zaan Farzaan

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अव्वल हल्क़ा-ए-याराँ में कनआँ रात के पिछले पहर बस्तियों से दूर नहरों के किनारे ख़ेमा-ज़न वो दरख़्तों की हवाओं में सितारे ख़ेमा-ज़न बस्तियों से दूर सहरा के नज़ारे ख़ेमा-ज़न हल्क़ा-ए-याराँ में कितने नाज़नीं नाज़ुक कमर दोम रक़्स के हंगाम कितने बाज़ुओं का पेच-ओ-ख़म देखने वालों की नज़रों में उतर आने को है ये बदन का लोच जैसे रूह बल खाने को है ये नज़र के सामने कितने ही आलम ख़्वाब से रक़्स के हंगाम उभर आते हैं कितने शोख़ रंग और कितने तेज़ हो जाते हैं नज़रों के ख़दंग ये ख़यालों के गुलिस्ताँ ये निगाहों के क़फ़स रक़्स के ये दाएरे शोला-ब-दामाँ हर नफ़स सोयम रस्म अदा होने न पाई थी कि ख़ेमों के क़रीब शह-नशीं की सम्त दौड़े इस तरह वहशी नक़ीब कितने अरमाँ कितने ग़म अश्कों में ढल कर रह गए ऐन जश्न-ए-रस्म के हंगाम कनआँ का गुरेज़ कितने मंज़र आरिज़-ओ-लब के पिघल कर रह गए कितने लब हसरत-चाशीदा कितनी आँखें अश्क-रेज़ जैसे साग़र आएँ हाथों में मगर टूटे हुए छेड़ियो मत ज़िंदगी के बाल-ओ-पर टूटे हुए तार हैं इस साज़ के ऐ नग़्मा-गर टूटे हुए चहारुम ये क़बीलों के शुयूख़-ए-पुख़्ता-उम्र ओ सख़्त-कोश वादी-ए-दजला के शहरी कुर्द के ख़ाना-ब-दोश लड़ रहे हैं अपनी अपनी कज-कुलाही के लिए कौन दारू बन के आए कम-निगाही के लिए गर्मी-ए-गुफ़्तार से मुमकिन नहीं दिल का रफ़ू गुफ़्तुगू से और बढ़ जाता है जोश-ए-गुफ़्तुगू

Qamar Jameel

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जब मैं बच्चा था रावी के गालों से डरता था अब दुश्मन की चालों से डरता हूँ मेरे बचपन में आग की अतराफ़ द्राविड़ लड़कियाँ गीत गाती थी और अब मैं एक होटल में बैंड बजाता हूँ और लोमड़ी की खाल से अपना लिबास सीता हूँ

Qamar Jameel

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मैं हुस्न-ए-मुत्लक़ की कुर्सी पर बैठ कर एक गदागर से शहर का फ़साना सुन रहा हूँ

Qamar Jameel

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एशिया की इस वीरान पहाड़ी पर मौत एक ख़ाना-ब-दोश लड़की की तरह घूम रही है मेरी रौशनी और अनार के दरख़्तों में क़ज़्ज़ाक़ों के चाक़ू चमकते हैं और सर पर वो चाँद है जो इस पहाड़ी का पहला पैग़म्बर है इस पहाड़ी पर फ़ातिमा रहती है उस के कपड़ों में वो कबूतर हैं जो कभी उड़ नहीं सकते ख़ुदा ने हमें एक ग़ार में बंद कर दिया है और हमारे सरों पर सियाह रात जैसा पत्थर रख दिया है

Qamar Jameel

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ख़्वाबों की अफ़्सुर्दा हवा में रहने वाले सुर्ख़ गुलाब जंगल की तारीक फ़ज़ा में ले के निकल आते हैं चराग़ रात गए जब चाँद का चेहरा देखते हैं शरमाते हैं और किसी ग़मगीन शजर के साए में सो जाते हैं देखो अपने दिल की लगन में बहने वाले सुर्ख़ गुलाब आख़िर अपने दिल की लगन में अपना पा जाते हैं सुराग़ या'नी ख़्वाब में सूरज बन के जंगल में लहराते हैं वो जो किसी ग़मगीन शजर के साए में सो जाते हैं

Qamar Jameel

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