nazmKuch Alfaaz

कहाँ गया वो ज़माना कि जिस की याद में आज भुलाए बैठा हूँ ख़ुद को पता नहीं मिलता गई कहाँ है वो अब सूरतें मोहब्बत की ज़माने भर में कहीं नक़्श-ए-पा नहीं मिलता मैं पूछूँ किस से पता और कहाँ कहाँ ढूँडूँ वहाँ का कोई भी आया गया नहीं मिलता वो अस्पताल की शब भी थी क्या क़यामत की वहाँ क़फ़स से जो ताइर उड़ा नहीं मिलता नहीफ़ बाज़ू थे मेरे लिए हिसार-ए-अमाँ मज़ा कहीं भी उस आग़ोश का नहीं मिलता वो बुझती आँखें थी मेरे लिए चराग़-ए-हयात निगाह-ए-मेहर का अब वो दिया नहीं मिलता तमीज़ कैसे करूँँ रहज़न-ओ-रफ़ीक़ में अब रह-ए-हयात का वो रहनुमा नहीं मिलता बस एक दम से वो बदली हवा ज़माने की कि शैख़ मिलते हैं दिल बा-सफ़ा नहीं मिलता बला का शोर है उल्फ़त के मय-कदे में मगर शराब मिलती है लेकिन नशा नहीं मिलता हुई है रूह वो अब जज़्ब-ए-रूह-ए-पाक-ए-अज़ीम मिला जो ज़ात में उस की जुदा नहीं मिलता वो गोया अब्र का साया था ले उड़ी जो हवा बिखर के फूल का जैसे पता नहीं मिलता वो एक नग़्मा था गुम हो गया फ़ज़ाओं में कि जैसे बहर में क़तरा गिरा नहीं मिलता तलाश उन की यहाँ है 'हबीब' ला-हासिल कि चश्म-ए-तर से जो आँसू गिरा नहीं मिलता

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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मेरी सोई हुई क़िस्मत को जगाने आ जा आ जा आ जा मिरी बिगड़ी को बनाने आ जा खो गया अक़्ल की राहों में मिरा अहद-ए-शबाब अज़-सर-ए-नौ मुझे दीवाना बनाने आ जा सर्द लाशा है मिरा इश्क़ से ख़ाली सीना इक नया सोज़ नई आग लगाने आ जा बाग़ में फूल है पज़मुर्दा-ओ-पामाल सभी हर रविश पर तू नए फूल खिलाने आ जा कान अब पक गए सुन सुन के पुराने नग़्में अन-सुने गीत नए राग सुनाने आ जा सख़्त हमवार है यकसाँ है मिरी राह-ए-हयात कोई सहरा कोई वीराना दिखाने आ जा ज़ाहिद-ए-ख़ुश्क रहा ख़ौफ़-ए-गुनह से लेकिन अब मोहब्बत का गुनहगार बनाने आ जा कैफ़ बन जा मिरे दिल का मेरी नज़रों का सुरूर मिस्ल-ए-बादा मिरी रग रग में समाने आ जा मंज़िल-ए-ज़ीस्त किधर है नहीं मा'लूम 'हबीब' थाम कर हाथ मुझे राह दिखाने आ जा

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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शहर मशहूर-ए-ज़माना देखने आया हूँ मैं राजधानी तेरी रा'ना देखने आया हूँ मैं क्या कहूँ कैसे कहूँ क्या देखने आया हूँ मैं दीदनी हर इक नज़ारा देखने आया हूँ मैं सर-ज़मीन-ए-पदमनी गहवारा-ए-प्रतापी भीम रश्क-ए-फ़िरदौस-ए-ज़माना देखने आया हूँ मैं ख़ुशनुमा झीलों में लर्ज़ां जिन का है अक्स-ए-जमील उन हसीं महलों का नक़्शा देखने आया हूँ मैं अब भी बाक़ी जिस ज़मीं पर है गुज़िश्ता अज़्मतें वो ज़मीं बा-चश्म-ए-बीनी देखने आया हूँ मैं सर ज़मीं वो जिस में थीं इस्मत से अर्ज़ां ज़िंदगी कर के पत्थर का कलेजा देखने आया हूँ मैं जिस की ख़ातिर पी गए जाम-ए-शहादत सूरमा राजपूतों का वो का'बा देखने आया हूँ मैं जिस से बाक़ी आज तक है आन राजस्थान की वो जमाल-ए-हुस्न-आरा देखने आया हूँ मैं सर ज़मीं रंगी है जिन की ख़ूँ से हल्दी घाट की उन की उम्मीदों की दुनियाँ देखने आया हूँ मैं उस की मिट्टी में हवा में आब में कोहसार में शान-ए-ख़ुद्दारी का जल्वा देखने आया हूँ मैं थी फ़ज़ा मख़मूर जिन से अपने बचपन की 'हबीब' उन हसीं ख़्वाबों की दुनिया देखने आया हूँ मैं

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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ज़िंदगी बहती रही आब-ए-रवाँ की मानिंद कभी हल्की सी कभी ख़्वाब-ए-गिराँ की मानिंद वक़्त की लहरों पे मा'सूम सा चेहरा उभरा और फिर हो गया गुम वहम-ओ-गुमाँ की मानिंद दिलरुबा चेहरे पे क्यूँ छाया क़ज़ा का साया क्यूँ बहारों का हुआ रंग ख़िज़ाँ के मानिंद हो गई क्यूँ वो चहकती हुई बुलबुल ख़ामोश क्यूँ गिरा फूल जो गुलशन में था जाँ की मानिंद रिंद झूम उठते थे मस्तान अदा पर जिस की अब यहाँ कौन है उस पीर-ए-मुग़ाँ की मानिंद ख़ाक उड़ती है जहाँ क़हक़हे होते थे बुलंद नग़्मा-ए-बज़्म है अब आह-ओ-फ़ुग़ाँ की मानिंद गर्मी-ए-दिल थी वही उस की वही ज़ौक़-ए-तलब ढलते सायों में वो था मर्द-ए-जवाँ की मानिंद उम्र भर याद-ए-चतर हम को रुलाएगी 'हबीब' ग़म सताएगी सदा दर्द-ए-निहाँ की मानिंद

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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एक रुख़ साज़-ए-दरूँ से जल न उठें जिस्म-ओ-जाँ कहीं रग रग न मेरी फूँक दे क़ल्ब-ए-तपाँ कहीं गुम-सुम हूँ और शश्दर-ओ-हैराँ कुछ इस तरह जैसे कि खो चुका हूँ मैं रूह-ए-रवाँ कहीं उस नाव की तरह हूँ मैं मौजों के रहम पर लंगर हो जिस के टूटे कहीं बादबाँ कहीं या मस्त नाज़ सर्व सा कोई निहाल-ए-सब्ज़ आ जाए ज़िद में बर्क़ की जो ना-गहाँ कहीं या जिस तरह बहार में मुर्ग़-ए-शिकस्ता पर हसरत से देखता हूँ सू-ए-आसमाँ कहीं मग़्लूब इस क़दर हूँ मैं एहसास-ए-ग़म से आज खो जाए सिसकियों में न ये दास्ताँ कहीं बीते दिनों के ख़्वाब हैं आँखों के सामने फ़र्दा का एक ख़ौफ़ है दिल में निहाँ कहीं निकले थे जब वतन से हम अपने ब-हाल-ए-ज़ार मंज़िल का था ख़याल न नाम-ओ-निशाँ कहीं कुछ ऐसी मुंतशिर सी हुई दोस्ती की बज़्म पत्ते बिखेर देती है जैसे ख़िज़ाँ कहीं ज़िंदा है यार सोहबतें बाक़ी मगर कहाँ दीवार खिंच गई है नई दरमियाँ कहीं फ़र्दा पे क्या यक़ीन हो नालाँ हूँ हाल पर माज़ी की सम्त ले चले उम्र-ए-रवाँ कहीं बाद-ए-सबा के शानों पे अमवाज-ए-नूर पर ले जाओ मुझ को दोस्तों के दरमियाँ कहीं या शम्अ'' मेरी यादों की गुल कर दो एक एक तारीक दिल का गोशा न हो ज़ौ-फ़िशाँ कहीं रूदाद-ए-ग़म सुनाते ही यूँँ आई उन की याद मैं हूँ कहीं ख़याल कहीं दास्ताँ कहीं ओझल हैं गो निगाह से दिल से कहीं हैं दूर ज़िक्र-ए-हबीब अब भी है विर्द-ए-ज़बाँ कहीं दूसरा रुख़ क्यूँ इंक़िलाब-ए-दहरस अब मुज़्तरिब है तू देखा है एक हाल पे दौर-ए-ज़माँ कहीं आग़ोश-ए-इंक़लाब में पलना है इर्तिक़ा मर जाएँ घुट के बदलें न गर ये जहाँ कहीं महशर-ब-दामाँ लहजा है दुनिया का एक एक माज़ी के ढूँढ़ता है मगर तू निशाँ कहीं तूफ़ाँ ने बढ़ के क़स्र को क़ैसर के जा लिया रोता है तू कि मेरा नहीं आशियाँ कहीं पैहम रवाँ है नित नई मंज़िल की राह में रुकता है ज़िंदगी का भला कारवाँ कहीं दुख दर्द आते देख के होता है ये गुमाँ हो ज़ब्त का हमारे न ये इम्तिहाँ कहीं आई ख़िज़ाँ बहार भी होगी क़रीब ही फ़ितरत का ये न राज़ हो ग़म में निहाँ कहीं कब तक तू रहम खाएगा ख़ुद अपने हाल पर कब तक तिरी तलाश दिल-ए-मेहरबाँ कहीं ख़ुश कर न तू किसी को क़सीदे सुना सुना झुकने न पाए सर ब-दर-ए-आस्ताँ कहीं फ़ुर्सत कहाँ किसे जो तेरा हाल-ए-ग़म सुने दुनियाँ को अपनी कम है परेशानियाँ कहीं सीने के अपने घाव को हँस हँस के तू छुपा दुनिया पे होने पाए न हरगिज़ अयाँ कहीं ग़म के तराने छोड़ के ख़ुशियों के गीत गा मुश्किल को सहल करते हैं आह-ओ-फ़ुग़ाँ कहीं पा-ए-तलब न लंग हो और अज़्म हो जवाँ मर्द-ए-ख़ुदा पे तंग है हिन्दोस्ताँ कहीं गो सब्र-आज़मा है मसाफ़त की मुश्किलें हाइल है राह-ए-शौक़ में संग-ए-गिराँ कहीं छूटा चमन है एक हज़ारों नज़र में हैं फिर होगा शाख़-ए-गुल पे नया आशियाँ कहीं सहन-ए-चमन में धूम से जाएगी फिर बहार ख़ंदा है गुल तुयूर भी है नग़्मा-ख़्वाँ कहीं लुट कर 'हबीब' ख़ुश है कि ताजिर है शौक़ का है फ़िक्र-ए-रोज़गार न सूद-ओ-ज़ियाँ कहीं

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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जहाँ में ग़म भी है रौशन-तरीं सितारों में दिखाता राह है ज़ुल्मत के ख़ारज़ारों में नहीं सुरूद में चंग-ओ-रबाब में भी नहीं वो एक लय कि है टूटे दिलों के तारों में ख़िज़ाँ की शौकत-ओ-अज़्मत है उन पे सब ज़ाहिर जो ढूँडते उसे फिरते रहे बहारों में ख़ुशी से हुस्न निखरता है ज़ाहिरी लेकिन जमील रूहों को पाओगे ग़म के मारों में बग़ैर दर्द नहीं है कभी ज़ुहूर-ए-हयात जिगर का ख़ून उभरता है शाहकारों में मकीं हरम के मुसीबत को उन की क्या जानें जो ख़ाक छानते हैं अजनबी दयारों में पसंद आया जो टूटे दिलों का इज़्ज़-ओ-नियाज़ तो बस गया है ख़ुदा भी गुनहगारों में कभी तो देखते तुम आ के ग़म नसीबों को हसीन दाग़ है सीने के लाला-ज़ारों में

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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