गोरी-चट्टी याल घनी सी दूध ऐसी पोशाक बदन की लाम्बे नाज़ुक माथे पर मेहंदी का घाव उड़ती-गिरती ख़ाक सुमों की मुट्ठी-भर कर मुँह पर मिल कर दिल की प्यास बुझाओ सदियों के दुख झेलते जाओ रहे सफ़र में हरे महकते खेतों में ख़ुश-बाश फिरे अपने पीछे आती क़ुव्वत के नशे में खोया रस्ते के हर भारी पत्थर को ठोकर से तोड़े आगे ही आगे को दौड़े आज यहाँ तक आ पहुँचा है पर वो कल अब दूर नहीं है जब उस के क़दमों के भाले क़र्या क़स्बा शहर सभी को पल-भर में मिस्मार करेंगे हर शय को ताराज करेंगे इस मरक़द से उस मरक़द तक राज करेंगे और फिर वो दिन भी आएगा जब इक तेज़ सुनहरा नश्तर शह-ए-रग में इस की उतरेगा ख़ून का फ़व्वारा छूटेगा और वो क़ुव्वत रेंगती और फुँकारती क़ुव्वत मौज में आ कर नाच उठेगी ख़ुशी से पागल हो जाएगी
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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आएँगे, अच्छे दिन आएँगे गर्दिश के दिन ये कट जाएँगे सूरज झोपड़ियों में चमकेगा बच्चे सब दूध में नहाएँगे जालिम के पुर्जे उड़ जाएँगे मिल-जुल के प्यार सभी गाएँगे मेहनत के फूल उगाने वाले दुनिया के मालिक बन जाएँगे दुख की रेखाएँ मिट जाएँगी ख़ुशियों के होंठ मुस्कुराएँगे सपनों की सतरंगी डोरी पर मुक्ति के फरहरे लहराएँगे
Gorakh Pandey
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अजीब है ये सिलसिला ये सिलसिला अजीब है हवा चले तो खेतियों में धूम चहचहों की है हवा रुके तो मुर्दनी है मुर्दनी की राख का नुज़ूल है कहाँ है तू कहाँ है तू कहाँ नहीं है तू बता अभी था तेरे गिरते उड़ते आँचलों का सिलसिला और अब उफ़ुक़ पर दूर तक गए दिनों की धूल है गए दिनों की धूल का ये सिलसिला फ़ुज़ूल है मैं रो सकूँ तो क्या ये गदली काएनात धुल सकेगी मेरे आँसुओं के झाग से मैं मुस्कुरा सकूँ तो क्या सफ़र की ख़स्तगी को भूल कर ये कारवाँ नुजूम के बरस पड़ेंगे मोतिए के फूल बन के इस मुहीब कासा-ए-हयात में न तू सुने न मैं कहूँ न मेरे अंग अंग से सदा उठे यूँँ ही मैं आँसुओं को क़हक़हों को अपने दिल में दफ़न कर के गुम लबों पे सिल धरे तिरे नगर में पा-पियादा पा-बरहना शाम के फ़िशार तक रवाँ रहूँ मगर कभी तिरी नज़र के आस्ताँ को पार तक न कर सकूँ कि तू अज़ल से ता-अबद हज़ार सद हज़ार आँख वाले वक़्त की नक़ीब है ये सिलसिला अजीब है ये सिलसिला अजीब है
Wazir Agha
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तह-दर-तह जंगल के अंदर उस का इक छोटा सा घर था और ख़ुद जंगल शब के काले रेशम के इक थान के अंदर दबा पड़ा था चुर-मुर सी आवाज़ बना था और शब गोरे दिन के मकड़ी-जाल में जकड़ी इक काली मक्खी की सूरत लटक रही थी मैं क्या करता मजबूरी सी मजबूरी थी मैं ने ख़ुद को घर छप्पर में उल्टा लटका देख लिया था कितनी ही गिरहों में जकड़ा देख लिया था मकड़ी जाने कहाँ गई थी अपनी तहों के अंदर शायद फँसी हुई थी मैं क्या जानूँ
Wazir Agha
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घुटनों पे रख कर हाथ उठी थकी आवाज़ में बोली बहुत लम्बा सफ़र है उम्र के मुँह ज़ोर दरिया का उखड़ते पत्थरों चिकनी फिसलती साअ'तों का ये सफ़र मुश्किल बहुत है थकन बोझल मनों बोझल बदन अपना उठा कर चल पड़ी चलती रही फिर एक दिन भारी पपोटों को उठा कर उस ने देखा रास्ते के बीच एक बरगद पुराना समाधी ओढ़ कर बैठा हुआ था थकन कुब्ड़े असा को टेकती बरगद के साए में चली आई मअन ठिटकी ठिठक कर रुक गई बोली चलो हम भी यहाँ रुक कर समाधी ओढ़ लेते हैं चलो हम भी उतरते हैं ख़ुद अपनी तह के अंदर और ख़ुद को ढूँडते हैं अबद तक नींद के दरिया में हम भी ऊँघते हैं थकन घुटनों पे रख कर हाथ उठी थकी आवाज़ में बोली बहुत लम्बा सफ़र है
Wazir Agha
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कभी हवा इक झोंका है जो दीवारों को फाँद के अक्सर हल्की सी एक चाप में ढल कर सहन में फिरता रहता है कभी हवा इक सरगोशी है जो खिड़की से लग कर पहरों ख़ुद से बातें करती है कभी हवा वो मौज-ए-सबा है जिस के पहले ही बोसे पर नन्ही मुन्नी कलियों की निन्दिया से बोझल सूजी आँखें खुल जाती हैं कभी हवा अब कैसे बताएँ हवा के रूप तो लाखों हैं पर उस का वो इक रूप तुझे भी याद तो होगा जब सन्नाटे पोरी पोरी टूट गिरे थे चाप के पाँव उखड़ गए थे सरगोशी पर कितनी चीख़ें झपट पड़ी थीं और फूलों की आँखों से शबनम की बूँदें फ़र्श-ए-ज़मीं पर चारों जानिब बिखर गई थीं
Wazir Agha
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अजब जादू भरी आँखें थीं उस की वो जब पलकें उठा कर इक नज़र तकती तो आँखों की सियह झीलों में जैसे मछलियों को आग लग जाती हज़ारों सुर्ख़ डोरे तिलमिला कर जस्त भरते आब-ए-ग़म की क़ैद से बाहर निकलने के लिए सौ सौ जतन करते मगर मजबूर थे चारों तरफ़ आँसू के गुम्बद थे नमी के बुलबुले थे और इक दीवार-ए-गिर्या जो अज़ल से ता-अबद फैली हुई थी अजब जादू भरी आँखें थीं उस की ब-ज़ाहिर आने वाले को न आने के लिए कहती ब-बातिन चाहती दीवार को वो तोड़ कर उस तक पहुँच जाएँ खड़ा हूँ मैं पस-ए-दीवार-ए-गिर्या नमी के बुलबुलों को इस की पलकों पर लरज़ते झिलमिलाते देखता हूँ उँगलियों से छू भी सकता हूँ मगर दीवार-ए-गिर्या को उफ़ुक़ से ता उफ़ुक़ फैली हुई शीशे की इस शफ़्फ़ाफ़ चादर को कभी अब तक तो कोई तोड़ कर आगे नहीं आया मैं इक आँसू भरे लम्हे की सिलवट मैं कैसे पार कर सकता हूँ इस को
Wazir Agha
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