प्यारा प्यारा भोला बचपन खेला जो माँ बाप के आँगन प्यारी भोली बातें इस की सपनों वाली रातें इस की पानी को कहता है मानी दौड़ के लाए उस की नानी रोटी माँगे आटी कह कर दोस्ती तोड़े कट्टी कह कर ज़िद पर अपनी जब आ जाए अपनी सी कर के वो दिखाए प्यारे प्यारे इस के खिलौने खेले गुड्डू और सलोने सब पे हुकूमत इस की रहती कोई बात न इस की टलती गिरता पड़ता और सँभलता रोता-धोता और मचलता
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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो
Ibn E Insha
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से वहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ से मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ से मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है बंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीना नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीना रिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम-ए-फ़लक का ज़ीना जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
Allama Iqbal
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"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र
ZafarAli Memon
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"शनासाई" रात के हाथ पे जलती हुई इक शम-ए-वफ़ा अपना हक़ माँगती है दूर ख़्वाबों के जज़ीरे में किसी रौज़न से सुब्ह की एक किरन झाँकती है वो किरन दरपा-ए-आज़ार हुई जाती है मेरी ग़म-ख़्वार हुई जाती है आओ किरनों को अँधेरों का कफ़न पहनाएँ इक चमकता हुआ सूरज सर-ए-मक़्तल लाएँ तुम मिरे पास रहो और यही बात कहो आज भी हर्फ़-ए-वफ़ा बाइस-ए-रुस्वाई है अपने क़ातिल से मिरी ख़ूब शनासाई है
Akhtar Payami
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प्यार वफ़ा के दीप जलाएँ घर को अपने स्वर्ग बनाएँ खेलें कूदें और मुस्काएँ देख के ख़ुश हों जिस को माएँ पहला मकतब घर है हमारा दर्स उसी से हम सब पाएँ जिस से मिलें फल इल्म के हम को इस में ऐसे पौदे लगाएँ पहले माँ और बाप से सीखें फिर सब को आदाब सिखाएँ जो भी हमारे घर में आए प्यार से उस को दिल में बिठाएँ बात करें हम मीठी मीठी लफ़्ज़ों के हम फूल खिलाएँ अपने हों या बेगाने हों सब को अपना दोस्त बनाएँ ख़ुश होंगे माँ-बाप हमारे आओ हम ऐसे बन जाएँ और फिर इस के आगे चल कर देश-पुजारी हम कहलाएँ नाम हो रौशन जिस से घर का ऐसे सुंदर दीप जलाएँ
Jauhar Rahmani
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आओ बच्चो बातें बताओ देश का अपने नक़्शा बनाओ गंगा नदी है कहाँ से निकली कहाँ कहाँ ये जा कर फैली संगम का वो कौन नगर है जिस पर सब की लगी नज़र है झांसी क्यूँ मशहूर हुई है किस के नाम से वो चमकी है कैसे अमर पंजाब बना है कौन वहाँ मशहूर हुआ है कहाँ हुए गाँधी जी पैदा काम उन्हों ने किए हैं क्या क्या कौन थे 'शौकत' कौन थे 'जौहर' क्यूँ है इन का चर्चा घर घर पैदा हुए 'अश्फ़ाक़' कहाँ पर नाम है क्यूँ हर एक ज़बाँ पर देश का अपने कौन नगर है जो जन्नत से भी बढ़ कर है दिल्ली को हम क्या हैं कहते जहाँ सफ़ीर हर मुल्क के रहते
Jauhar Rahmani
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जाने कितने सपने देखे जीवन के इस रूप नगर में वर्षा रुत में जैसे मुसाफ़िर प्रीत-डगर पर प्रेम-सफ़र में सपने जिन में कोमल परियाँ पर फैलाए डोल रही हैं आशाओं के गीत की लय पर अमृत-रस को घोल रही हैं मैं ने सोचा मीत सभी हैं ये सारा संसार है अपना सारे जग की रीत यही है कड़वी नींदें मीठा सपना धरती की इस फुलवारी में चाँद सितारों के दर्पन में मैं ने देखी अपनी छाया जग में सब अपने हैं तो फिर कोई किसी का बैरी क्यूँ हो होंटों पर मुस्कान तो बिखरे मन में उलझन ठेरी क्यूँ हो
Jauhar Rahmani
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बरखा रुत में आते हैं बादल पानी भर कर लाते हैं बादल आँगन आँगन बरसाते हैं खेतों को तर कर जाते हैं प्यासी धरती के होंटों पर भर जाते हैं अमृत ला कर वर्षा के ये दूत हैं बादल करते हैं धरती को जल-थल फूलों को देते हैं तबस्सुम कोयल को देते हैं तरन्नुम चम-चम बिजली चमकाते हैं एक किरन सी लहराते हैं शोर मचाते हैं गाते हैं चारों तरफ़ ये मंडलाते हैं गीतों की रुत झूलों के दिन कलियों की शब फूलों के दिन वर्षा की रुत भर के लाते बरसाते लहराते जाते
Jauhar Rahmani
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अब की गर्मी की छुट्टी में या'नी इस गुज़री गर्मी में गए लखनऊ हम ख़ाला के घर देखे तरह तरह के मंज़र भूल-भुलय्याँ हम ने देखी जा के न निकले जिस में कोई देखा हुसैनाबाद का फाटक देखा सिनेमा देखा नाटक लाट शहीदों वाली देखी पार्क गए हम हाथी वाली कौंसिल चैम्बर देखा हम ने ज़ू भी जा कर भालू देखे नाच दिखाते कालू देखे बेली-गारद हम ने देखी जिस में चले थे गोले गोली गए अमीनाबाद भी यारो और हुए हम शाद भी यारो गंज की हम ने सैर भी कर ली हर मंज़र से झोली भर ली गुज़रे क़ैसर-बाग़ से हो कर चार-बाग़ का चलता मंज़र देख के हर मंज़र को आए लौट के अपने घर को आए
Jauhar Rahmani
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