nazmKuch Alfaaz

जाने कितने सपने देखे जीवन के इस रूप नगर में वर्षा रुत में जैसे मुसाफ़िर प्रीत-डगर पर प्रेम-सफ़र में सपने जिन में कोमल परियाँ पर फैलाए डोल रही हैं आशाओं के गीत की लय पर अमृत-रस को घोल रही हैं मैं ने सोचा मीत सभी हैं ये सारा संसार है अपना सारे जग की रीत यही है कड़वी नींदें मीठा सपना धरती की इस फुलवारी में चाँद सितारों के दर्पन में मैं ने देखी अपनी छाया जग में सब अपने हैं तो फिर कोई किसी का बैरी क्यूँ हो होंटों पर मुस्कान तो बिखरे मन में उलझन ठेरी क्यूँ हो

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"जन्मदिन मुबारक" दिन ये सोने से, रातें ये रंगीन मुबारक ऐ मेरी साँसों की रवानी तुझ को तेरा जन्मदिन मुबारक भवरें मुस्काएँ, फूलों की डाली-डाली हँसें जब तू मुस्काए, तेरे होंठों की लाली हँसें मेरा कत़्ल करे, तेरे नैन कजरारे काले मजरूह हुए ना जाने कितने मतवाले तुझ को ये बहारें शौकीन मुबारक ऐ मेरी तसव्वुर की रानी तुझ को तेरा जन्मदिन मुबारक

Vikas Sangam

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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"कब तक ख़ैर मनाते हम" उल्फ़त के कूचों से साबित कैसे बचकर आते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम बड़ी बड़ी बातें कर दी थीं उन पर जान लुटाएंगे हुक़्म करें वो, आसमान से तारे भी ले आएँगे पर क़िस्मत और क़ुदरत इक थाली के चट्टे बट्टे थे कोशिश अपनी पूरी रहती पर अंगूर तो खट्टे थे बिगड़ा स्वाद जो उन के मुँह का उन को चटनी खानी थी बेचारा दिल, बेवकूफ़ था कुछ अपनी नादानी थी अदने से दिल की ख़ातिर क्या मूसल से डर जाते हम? हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम हम ने पूरी जुगत लगाई मगर सफलता ना मिल पाई फिर हम ने उम्मीद छोड़ दी ख़ुदस छेड़ी एक लड़ाई अब बातों में ना आएँगे उन जैसे ही बन जाएँगे उन की जानिब ना देखेंगे नाम 'नयनसुख' कह लाएँगे लेकिन हम थे सावन वाले और ऊपर से दिल के छाले छोड़ रेवड़ी उन की ख़ातिर हम ने रूखी सूखी खाई ऊँट सो गया उलटी करवट जमके ली उस ने जम्हाई पड़ते ओलों में अब देखो अपना सर मुंडवाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम इधर प्रिये मधु है, और हम हैं तुम उस पार नज़र आते हो कैसे बीन बजाएँ हिय की तुम तो ऐसे पगुराते हो कान पे जूँ रेंगाने ख़ातिर हम प्रयत्न करते रहते हैं तिस पर तुम क्रोधित होते हो हम तुम सेे डरते रहते हैं ख़ैर, हुआ सो बिसरा देते तुम थोड़ा सा इतरा लेते हम थोड़ी मनुहार लगाकर कोप तुम्हारा छितरा देते किन्तु अतिप्रिय तुम्हें क्रोध था और ना इस का कोई बोध था हम सेे तुम कटते जाते थे यथा दुग्ध, फटते जाते थे इतने फटे हुए में कैसे अपनी टांग अड़ाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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आओ बच्चो बातें बताओ देश का अपने नक़्शा बनाओ गंगा नदी है कहाँ से निकली कहाँ कहाँ ये जा कर फैली संगम का वो कौन नगर है जिस पर सब की लगी नज़र है झांसी क्यूँ मशहूर हुई है किस के नाम से वो चमकी है कैसे अमर पंजाब बना है कौन वहाँ मशहूर हुआ है कहाँ हुए गाँधी जी पैदा काम उन्हों ने किए हैं क्या क्या कौन थे 'शौकत' कौन थे 'जौहर' क्यूँ है इन का चर्चा घर घर पैदा हुए 'अश्फ़ाक़' कहाँ पर नाम है क्यूँ हर एक ज़बाँ पर देश का अपने कौन नगर है जो जन्नत से भी बढ़ कर है दिल्ली को हम क्या हैं कहते जहाँ सफ़ीर हर मुल्क के रहते

Jauhar Rahmani

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अब की गर्मी की छुट्टी में या'नी इस गुज़री गर्मी में गए लखनऊ हम ख़ाला के घर देखे तरह तरह के मंज़र भूल-भुलय्याँ हम ने देखी जा के न निकले जिस में कोई देखा हुसैनाबाद का फाटक देखा सिनेमा देखा नाटक लाट शहीदों वाली देखी पार्क गए हम हाथी वाली कौंसिल चैम्बर देखा हम ने ज़ू भी जा कर भालू देखे नाच दिखाते कालू देखे बेली-गारद हम ने देखी जिस में चले थे गोले गोली गए अमीनाबाद भी यारो और हुए हम शाद भी यारो गंज की हम ने सैर भी कर ली हर मंज़र से झोली भर ली गुज़रे क़ैसर-बाग़ से हो कर चार-बाग़ का चलता मंज़र देख के हर मंज़र को आए लौट के अपने घर को आए

Jauhar Rahmani

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प्यार वफ़ा के दीप जलाएँ घर को अपने स्वर्ग बनाएँ खेलें कूदें और मुस्काएँ देख के ख़ुश हों जिस को माएँ पहला मकतब घर है हमारा दर्स उसी से हम सब पाएँ जिस से मिलें फल इल्म के हम को इस में ऐसे पौदे लगाएँ पहले माँ और बाप से सीखें फिर सब को आदाब सिखाएँ जो भी हमारे घर में आए प्यार से उस को दिल में बिठाएँ बात करें हम मीठी मीठी लफ़्ज़ों के हम फूल खिलाएँ अपने हों या बेगाने हों सब को अपना दोस्त बनाएँ ख़ुश होंगे माँ-बाप हमारे आओ हम ऐसे बन जाएँ और फिर इस के आगे चल कर देश-पुजारी हम कहलाएँ नाम हो रौशन जिस से घर का ऐसे सुंदर दीप जलाएँ

Jauhar Rahmani

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दादी अम्माँ जल्दी आओ आ कर एक कहानी सुनाओ आओ बैठो पास हमारे शाही शालू पप्पी दुलारे इक बच्चा था नेक और अच्छा दिल का साफ़ ज़बाँ का सच्चा माँ से अपनी कर के मिन्नत सफ़र की माँगी उस ने इजाज़त माँ ने रक़म सदरी में सी कर कर दिया रुख़्सत आँसू पी कर चलते चलते की ये नसीहत चाहे जितनी आए मुसीबत झूट कभी लब पर मत आए चाहे जान भले ही जाए चला सफ़र पर जब वो बच्चा मन का साफ़ ज़बाँ का सच्चा रस्ते में कुछ डाकू आए ज़ुल्म-ओ-सितम हर इक पर ढाए आख़िर में बच्चे से पूछा पास तिरे जो कुछ हो बतला बच्चे ने कुछ ख़ौफ़ न खाया जो कुछ सच था उन को बताया चीर के सदरी रक़म दिखा दी माँ की नसीहत उन को बता दी बच्चे की जो देखी सदाक़त पाई उस डाकू ने नसीहत तौबा बुरे कामों से कर ली और ईमान से झोली भर ली शैख़ अबदुल-क़ादिर जीलानी दुनिया उन्हें इस नाम से जानी

Jauhar Rahmani

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प्यारा प्यारा भोला बचपन खेला जो माँ बाप के आँगन प्यारी भोली बातें इस की सपनों वाली रातें इस की पानी को कहता है मानी दौड़ के लाए उस की नानी रोटी माँगे आटी कह कर दोस्ती तोड़े कट्टी कह कर ज़िद पर अपनी जब आ जाए अपनी सी कर के वो दिखाए प्यारे प्यारे इस के खिलौने खेले गुड्डू और सलोने सब पे हुकूमत इस की रहती कोई बात न इस की टलती गिरता पड़ता और सँभलता रोता-धोता और मचलता

Jauhar Rahmani

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