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प्यार वफ़ा के दीप जलाएँ घर को अपने स्वर्ग बनाएँ खेलें कूदें और मुस्काएँ देख के ख़ुश हों जिस को माएँ पहला मकतब घर है हमारा दर्स उसी से हम सब पाएँ जिस से मिलें फल इल्म के हम को इस में ऐसे पौदे लगाएँ पहले माँ और बाप से सीखें फिर सब को आदाब सिखाएँ जो भी हमारे घर में आए प्यार से उस को दिल में बिठाएँ बात करें हम मीठी मीठी लफ़्ज़ों के हम फूल खिलाएँ अपने हों या बेगाने हों सब को अपना दोस्त बनाएँ ख़ुश होंगे माँ-बाप हमारे आओ हम ऐसे बन जाएँ और फिर इस के आगे चल कर देश-पुजारी हम कहलाएँ नाम हो रौशन जिस से घर का ऐसे सुंदर दीप जलाएँ

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"ख़ूब-सूरत अजनबी" मिला है सफ़र में मुझे एक चेहरा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत ख़ुदा ने बनाया है जो उस का मुखड़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत मुसलसल उसी को फ़क़त तक रहा हूँ उसी पर मैं इक नज़्म भी कह रहा हूँ वो रक्खी है जो अपने सर पर दुपट्टा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत बहुत क़ातिलाना है उस की निगाहें बहुत जानलेवा है उस की अदाएँ लगाई है जो उस ने आँखों पे चश्मा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत उसे हूर कह के पुकारा है मैं ने ज़रा गुफ़्तुगू कर के देखा है मैं ने उसे बात करने का जो है तरीक़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत है मालूम 'दानिश' वो इक अजनबी है मगर उस में हरगिज़ न कोई कमी है जो गुज़रा है उस का मेरे साथ लम्हा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत

Danish Balliavi

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अब की गर्मी की छुट्टी में या'नी इस गुज़री गर्मी में गए लखनऊ हम ख़ाला के घर देखे तरह तरह के मंज़र भूल-भुलय्याँ हम ने देखी जा के न निकले जिस में कोई देखा हुसैनाबाद का फाटक देखा सिनेमा देखा नाटक लाट शहीदों वाली देखी पार्क गए हम हाथी वाली कौंसिल चैम्बर देखा हम ने ज़ू भी जा कर भालू देखे नाच दिखाते कालू देखे बेली-गारद हम ने देखी जिस में चले थे गोले गोली गए अमीनाबाद भी यारो और हुए हम शाद भी यारो गंज की हम ने सैर भी कर ली हर मंज़र से झोली भर ली गुज़रे क़ैसर-बाग़ से हो कर चार-बाग़ का चलता मंज़र देख के हर मंज़र को आए लौट के अपने घर को आए

Jauhar Rahmani

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आओ बच्चो बातें बताओ देश का अपने नक़्शा बनाओ गंगा नदी है कहाँ से निकली कहाँ कहाँ ये जा कर फैली संगम का वो कौन नगर है जिस पर सब की लगी नज़र है झांसी क्यूँ मशहूर हुई है किस के नाम से वो चमकी है कैसे अमर पंजाब बना है कौन वहाँ मशहूर हुआ है कहाँ हुए गाँधी जी पैदा काम उन्हों ने किए हैं क्या क्या कौन थे 'शौकत' कौन थे 'जौहर' क्यूँ है इन का चर्चा घर घर पैदा हुए 'अश्फ़ाक़' कहाँ पर नाम है क्यूँ हर एक ज़बाँ पर देश का अपने कौन नगर है जो जन्नत से भी बढ़ कर है दिल्ली को हम क्या हैं कहते जहाँ सफ़ीर हर मुल्क के रहते

Jauhar Rahmani

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दादी अम्माँ जल्दी आओ आ कर एक कहानी सुनाओ आओ बैठो पास हमारे शाही शालू पप्पी दुलारे इक बच्चा था नेक और अच्छा दिल का साफ़ ज़बाँ का सच्चा माँ से अपनी कर के मिन्नत सफ़र की माँगी उस ने इजाज़त माँ ने रक़म सदरी में सी कर कर दिया रुख़्सत आँसू पी कर चलते चलते की ये नसीहत चाहे जितनी आए मुसीबत झूट कभी लब पर मत आए चाहे जान भले ही जाए चला सफ़र पर जब वो बच्चा मन का साफ़ ज़बाँ का सच्चा रस्ते में कुछ डाकू आए ज़ुल्म-ओ-सितम हर इक पर ढाए आख़िर में बच्चे से पूछा पास तिरे जो कुछ हो बतला बच्चे ने कुछ ख़ौफ़ न खाया जो कुछ सच था उन को बताया चीर के सदरी रक़म दिखा दी माँ की नसीहत उन को बता दी बच्चे की जो देखी सदाक़त पाई उस डाकू ने नसीहत तौबा बुरे कामों से कर ली और ईमान से झोली भर ली शैख़ अबदुल-क़ादिर जीलानी दुनिया उन्हें इस नाम से जानी

Jauhar Rahmani

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जाने कितने सपने देखे जीवन के इस रूप नगर में वर्षा रुत में जैसे मुसाफ़िर प्रीत-डगर पर प्रेम-सफ़र में सपने जिन में कोमल परियाँ पर फैलाए डोल रही हैं आशाओं के गीत की लय पर अमृत-रस को घोल रही हैं मैं ने सोचा मीत सभी हैं ये सारा संसार है अपना सारे जग की रीत यही है कड़वी नींदें मीठा सपना धरती की इस फुलवारी में चाँद सितारों के दर्पन में मैं ने देखी अपनी छाया जग में सब अपने हैं तो फिर कोई किसी का बैरी क्यूँ हो होंटों पर मुस्कान तो बिखरे मन में उलझन ठेरी क्यूँ हो

Jauhar Rahmani

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प्यारा प्यारा भोला बचपन खेला जो माँ बाप के आँगन प्यारी भोली बातें इस की सपनों वाली रातें इस की पानी को कहता है मानी दौड़ के लाए उस की नानी रोटी माँगे आटी कह कर दोस्ती तोड़े कट्टी कह कर ज़िद पर अपनी जब आ जाए अपनी सी कर के वो दिखाए प्यारे प्यारे इस के खिलौने खेले गुड्डू और सलोने सब पे हुकूमत इस की रहती कोई बात न इस की टलती गिरता पड़ता और सँभलता रोता-धोता और मचलता

Jauhar Rahmani

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