nazmKuch Alfaaz

बर्बाद होती दुनिया हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला हर दिशा में एक सी आवाज़ का ही ज़ोर है मार डालो काट डालो बस यही इक शोर है जिस तरफ़ भी देखो तुम नफ़रत की अंधी भीड़ है ख़ूँ ही सर पे ख़ूँ ही लब पे ख़ूँ की प्यासी भीड़ है क्या हुआ इस को अचानक इस ने बदला रंग क्यूँ और आख़िर हो गई जल्लाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला युद्ध हो तो फिर निपटना चाहती है ढंग से अब नहीं डरती ये दंगे या किसी भी जंग से अब तो खुल के फूँकती है जंग का ही शंख ये अम्न की जो बात की तो नोच लेगी पंख ये सख़्त-दिल ज़ालिम सितम-गर जंगली क्यूँ हो गई हो गई है इन दिनों सय्याद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला मारने में काटने में ज़ुल्म में मसरूफ़ है जो भरा है ज़ेहन में उस ज़हर का ये रूप है आएगी जब होश में होगी ख़बर जब क्या किया रोएगी पछताएगी अपने किए पर देखना नफ़रतें हैवानियत ज़ुल्म-ओ-सितम की बेड़ियाँ तोड़ कर होती नहीं आज़ाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला है अभी भी वक़्त चाहे तो सँभल सकती है ये जो भरी नफ़रत है उल्फ़त में बदल सकती है ये थूक सकती है ये विष लेकिन उगलती क्यूँ नहीं चल रही जिस राह पे उस को बदलती क्यूँ नहीं रंज-ओ-ग़म दर्द-ओ-अलम अश्कों का दामन छोड़ कर आख़िरश होती नहीं पुर-शाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"रोओ लड़को" रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा गुल के जैसे नाज़ुक मन को चुभता नश्तर कर डालेगा मर्द नहीं रोते हैं आँसू रोना काम औरतों का है इस में तुम न फँसना लड़को कि ये काम लड़कियों का है रोने पे क्या मर्द या औरत हूक किसी को उठ सकती है तुम भी खुल के रो सकते हो रोना काम राहतों का है पलकों को बोझल कर देगा आँखें बंजर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा बैठा है जो दिल की तह में उस ग़म को ऊपर लाओ तुम पलकों के कोनों से उस का फिर क़तरा-क़तरा बहाओ तुम सोचो न कोई क्या सोचेगा रोओ गर आता है रोना ख़ाली कर दो आँखें अपनी अब और न अश्क दबाओ तुम दिल ज़िंदा कर देगा मुर्दा हँसना दूभर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा कोई देता नहीं सहारा कोई गले लगाता नहीं गर तो दीवार को काँधा समझो तो दीवार पे ही रख के सर झर-झर अश्क बहाओ लड़को तुम को बेहद चैन मिलेगा चेहरे पे इक हँसी खिलेगी मन भी थोड़ा होगा बेहतर एक उदासी से भर देगा हालत बदतर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा

Mohit Subran

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इस दफ़ा इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है हर दफ़ा हर मर्तबा ही पिछले कुछ इक साल जैसे सिर्फ़ अपनी ही सुनाने को नहीं आओगी जानाँ इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है उन सभी बोसीदा बातों के गिले-शिकवे उठा के टीस सीने में बढ़ाने को नहीं आओगी जानाँ इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है झूठ से भर के ठसा-ठस तोहमतों का बोझ फिर से मेरे माथे पे गिराने को नहीं आओगी जानाँ इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है जो बची साँसें हैं मुझ में वो भी मुझ से छीन के तुम ज़िन्दगी मेरी मिटाने को नहीं आओगी जानाँ

Mohit Subran

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"नहीं सोचा था" हर इक दिन एक सा मौसम ही देखेंगे नहीं सोचा था ये दिन हम भी देखेंगे न होगा शख़्स कोई थामने को हाथ फ़क़त तन्हाई के आलम ही देखेंगे दिनों-दिन शब-ब-शब लम्हा-ब-लम्हा हम ग़म-ओ-कर्ब-ओ-अलम हर दम ही देखेंगे गला भर जाएगा लाचारियों में यूँँ कि दोनों आँख में शबनम सी देखेंगे नसों का ख़ून भी कम होता जाएगा जिगर भी दरहम-ओ-बरहम ही देखेंगे गिरेंगी लड़खड़ा के धड़कनें सारी बिखरती साँस की सरगम भी देखेंगे नहीं था ये हमें अंदाज़ा हम इक दिन ख़ुद अपनी मौत का मातम भी देखेंगे

Mohit Subran

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