"नहीं सोचा था" हर इक दिन एक सा मौसम ही देखेंगे नहीं सोचा था ये दिन हम भी देखेंगे न होगा शख़्स कोई थामने को हाथ फ़क़त तन्हाई के आलम ही देखेंगे दिनों-दिन शब-ब-शब लम्हा-ब-लम्हा हम ग़म-ओ-कर्ब-ओ-अलम हर दम ही देखेंगे गला भर जाएगा लाचारियों में यूँँ कि दोनों आँख में शबनम सी देखेंगे नसों का ख़ून भी कम होता जाएगा जिगर भी दरहम-ओ-बरहम ही देखेंगे गिरेंगी लड़खड़ा के धड़कनें सारी बिखरती साँस की सरगम भी देखेंगे नहीं था ये हमें अंदाज़ा हम इक दिन ख़ुद अपनी मौत का मातम भी देखेंगे
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"रोओ लड़को" रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा गुल के जैसे नाज़ुक मन को चुभता नश्तर कर डालेगा मर्द नहीं रोते हैं आँसू रोना काम औरतों का है इस में तुम न फँसना लड़को कि ये काम लड़कियों का है रोने पे क्या मर्द या औरत हूक किसी को उठ सकती है तुम भी खुल के रो सकते हो रोना काम राहतों का है पलकों को बोझल कर देगा आँखें बंजर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा बैठा है जो दिल की तह में उस ग़म को ऊपर लाओ तुम पलकों के कोनों से उस का फिर क़तरा-क़तरा बहाओ तुम सोचो न कोई क्या सोचेगा रोओ गर आता है रोना ख़ाली कर दो आँखें अपनी अब और न अश्क दबाओ तुम दिल ज़िंदा कर देगा मुर्दा हँसना दूभर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा कोई देता नहीं सहारा कोई गले लगाता नहीं गर तो दीवार को काँधा समझो तो दीवार पे ही रख के सर झर-झर अश्क बहाओ लड़को तुम को बेहद चैन मिलेगा चेहरे पे इक हँसी खिलेगी मन भी थोड़ा होगा बेहतर एक उदासी से भर देगा हालत बदतर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा
Mohit Subran
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इस दफ़ा इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है हर दफ़ा हर मर्तबा ही पिछले कुछ इक साल जैसे सिर्फ़ अपनी ही सुनाने को नहीं आओगी जानाँ इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है उन सभी बोसीदा बातों के गिले-शिकवे उठा के टीस सीने में बढ़ाने को नहीं आओगी जानाँ इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है झूठ से भर के ठसा-ठस तोहमतों का बोझ फिर से मेरे माथे पे गिराने को नहीं आओगी जानाँ इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है जो बची साँसें हैं मुझ में वो भी मुझ से छीन के तुम ज़िन्दगी मेरी मिटाने को नहीं आओगी जानाँ
Mohit Subran
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बर्बाद होती दुनिया हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला हर दिशा में एक सी आवाज़ का ही ज़ोर है मार डालो काट डालो बस यही इक शोर है जिस तरफ़ भी देखो तुम नफ़रत की अंधी भीड़ है ख़ूँ ही सर पे ख़ूँ ही लब पे ख़ूँ की प्यासी भीड़ है क्या हुआ इस को अचानक इस ने बदला रंग क्यूँ और आख़िर हो गई जल्लाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला युद्ध हो तो फिर निपटना चाहती है ढंग से अब नहीं डरती ये दंगे या किसी भी जंग से अब तो खुल के फूँकती है जंग का ही शंख ये अम्न की जो बात की तो नोच लेगी पंख ये सख़्त-दिल ज़ालिम सितम-गर जंगली क्यूँ हो गई हो गई है इन दिनों सय्याद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला मारने में काटने में ज़ुल्म में मसरूफ़ है जो भरा है ज़ेहन में उस ज़हर का ये रूप है आएगी जब होश में होगी ख़बर जब क्या किया रोएगी पछताएगी अपने किए पर देखना नफ़रतें हैवानियत ज़ुल्म-ओ-सितम की बेड़ियाँ तोड़ कर होती नहीं आज़ाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला है अभी भी वक़्त चाहे तो सँभल सकती है ये जो भरी नफ़रत है उल्फ़त में बदल सकती है ये थूक सकती है ये विष लेकिन उगलती क्यूँ नहीं चल रही जिस राह पे उस को बदलती क्यूँ नहीं रंज-ओ-ग़म दर्द-ओ-अलम अश्कों का दामन छोड़ कर आख़िरश होती नहीं पुर-शाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला
Mohit Subran
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