nazmKuch Alfaaz

"रोओ लड़को" रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा गुल के जैसे नाज़ुक मन को चुभता नश्तर कर डालेगा मर्द नहीं रोते हैं आँसू रोना काम औरतों का है इस में तुम न फँसना लड़को कि ये काम लड़कियों का है रोने पे क्या मर्द या औरत हूक किसी को उठ सकती है तुम भी खुल के रो सकते हो रोना काम राहतों का है पलकों को बोझल कर देगा आँखें बंजर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा बैठा है जो दिल की तह में उस ग़म को ऊपर लाओ तुम पलकों के कोनों से उस का फिर क़तरा-क़तरा बहाओ तुम सोचो न कोई क्या सोचेगा रोओ गर आता है रोना ख़ाली कर दो आँखें अपनी अब और न अश्क दबाओ तुम दिल ज़िंदा कर देगा मुर्दा हँसना दूभर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा कोई देता नहीं सहारा कोई गले लगाता नहीं गर तो दीवार को काँधा समझो तो दीवार पे ही रख के सर झर-झर अश्क बहाओ लड़को तुम को बेहद चैन मिलेगा चेहरे पे इक हँसी खिलेगी मन भी थोड़ा होगा बेहतर एक उदासी से भर देगा हालत बदतर कर डालेगा रोओ लड़को वर्ना ग़म ये तुम को पत्थर कर डालेगा

Related Nazm

"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

37 likes

मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

52 likes

"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है

MAHESH CHAUHAN NARNAULI

16 likes

तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

81 likes

तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

24 likes

More from Mohit Subran

इस दफ़ा इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है हर दफ़ा हर मर्तबा ही पिछले कुछ इक साल जैसे सिर्फ़ अपनी ही सुनाने को नहीं आओगी जानाँ इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है उन सभी बोसीदा बातों के गिले-शिकवे उठा के टीस सीने में बढ़ाने को नहीं आओगी जानाँ इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है झूठ से भर के ठसा-ठस तोहमतों का बोझ फिर से मेरे माथे पे गिराने को नहीं आओगी जानाँ इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है जो बची साँसें हैं मुझ में वो भी मुझ से छीन के तुम ज़िन्दगी मेरी मिटाने को नहीं आओगी जानाँ

Mohit Subran

0 likes

बर्बाद होती दुनिया हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला हर दिशा में एक सी आवाज़ का ही ज़ोर है मार डालो काट डालो बस यही इक शोर है जिस तरफ़ भी देखो तुम नफ़रत की अंधी भीड़ है ख़ूँ ही सर पे ख़ूँ ही लब पे ख़ूँ की प्यासी भीड़ है क्या हुआ इस को अचानक इस ने बदला रंग क्यूँ और आख़िर हो गई जल्लाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला युद्ध हो तो फिर निपटना चाहती है ढंग से अब नहीं डरती ये दंगे या किसी भी जंग से अब तो खुल के फूँकती है जंग का ही शंख ये अम्न की जो बात की तो नोच लेगी पंख ये सख़्त-दिल ज़ालिम सितम-गर जंगली क्यूँ हो गई हो गई है इन दिनों सय्याद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला मारने में काटने में ज़ुल्म में मसरूफ़ है जो भरा है ज़ेहन में उस ज़हर का ये रूप है आएगी जब होश में होगी ख़बर जब क्या किया रोएगी पछताएगी अपने किए पर देखना नफ़रतें हैवानियत ज़ुल्म-ओ-सितम की बेड़ियाँ तोड़ कर होती नहीं आज़ाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला है अभी भी वक़्त चाहे तो सँभल सकती है ये जो भरी नफ़रत है उल्फ़त में बदल सकती है ये थूक सकती है ये विष लेकिन उगलती क्यूँ नहीं चल रही जिस राह पे उस को बदलती क्यूँ नहीं रंज-ओ-ग़म दर्द-ओ-अलम अश्कों का दामन छोड़ कर आख़िरश होती नहीं पुर-शाद दुनिया क्यूँ भला हो रही है इस तरह बर्बाद दुनिया क्यूँ भला हो नहीं जाती है ये आबाद दुनिया क्यूँ भला

Mohit Subran

0 likes

"नहीं सोचा था" हर इक दिन एक सा मौसम ही देखेंगे नहीं सोचा था ये दिन हम भी देखेंगे न होगा शख़्स कोई थामने को हाथ फ़क़त तन्हाई के आलम ही देखेंगे दिनों-दिन शब-ब-शब लम्हा-ब-लम्हा हम ग़म-ओ-कर्ब-ओ-अलम हर दम ही देखेंगे गला भर जाएगा लाचारियों में यूँँ कि दोनों आँख में शबनम सी देखेंगे नसों का ख़ून भी कम होता जाएगा जिगर भी दरहम-ओ-बरहम ही देखेंगे गिरेंगी लड़खड़ा के धड़कनें सारी बिखरती साँस की सरगम भी देखेंगे नहीं था ये हमें अंदाज़ा हम इक दिन ख़ुद अपनी मौत का मातम भी देखेंगे

Mohit Subran

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Mohit Subran.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Mohit Subran's nazm.