कल शाम मुझे बारिश मिली बाग़ में रोती हुई उस की सिसकियाँ दरख़्तों की शाख़ों पर अटकी थीं वो बादल का घर छोड़ आई थी मैं ने उसे तअस्सुफ़ से देखा रात को मेरे कमरे की खिड़की पर बिखरे बालों वाले परेशान बादल ने दस्तक दी वो चाँदनी का एक टुकड़ा हाथ में ले कर बारिश को ढूँड रहा था मैं ने खिड़की पे बहते बारिश के आँसुओं की सम्त इशारा किया मोहब्बत के आसमान पर बिछड़ने वालों को ज़मीन भी पनाह नहीं देती इस लिए हाथ छुड़ाने से पहले ये बात ध्यान में रखना मोहब्बत में जुदाई दाइमी होती है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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हमारे सामने हमारा रब मौजूद है मगर हम अपने अपने मस्लक की डेढ़ डेढ़ ईंट वाली मस्जिदों में ख़्वाहिशों के बुत अपनी अपनी बग़लों में दबाए खड़े हैं और हर बार इन बुतों को सज्दा करते हुए हमारा यक़ीन मस्जिद के मीनारों को छू लेता है कि जन्नत में बहती शहद और दूध की नहरों के किनारों पर हूरें हमें ख़ुश-आमदीद कहने को बेताब बैठी हैं अस्फ़ल-उस-साफ़िलीन सज्दों से सर उठे तो अपने अंदर झाँकना तुम जान लोगे हम से बड़ा ना-फ़रमान कोई नहीं
Nahid Akhtar Balooch
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मैं ने कमरे की खूँटी पर तेरा इंतिज़ार टाँग दिया है और मेरी बे-क़रार आँखें कमरे की चौखट पर धरी हैं तेरे फ़िराक़ के सियाह लम्हों की बातें करती मेरी सारी नज़्में कमरे की दीवारों पर चस्पाँ हैं मेरी आती जाती साँसें घड़ी की सूइयों से बंधी हैं और तुम्हारे अमृत-रस टपकाते जुमले मेरे ध्यान का पल्लू पकड़े चुप बैठे हैं तेरे लम्स की ख़्वाहिश मेरे हाथों की पोरों से निकल कर कमरे में चकराती फिरती है तेरे लौट आने का रस्ता तकता हर इक मंज़र हिज्र-ज़दा है और तुम्हारे लौट आने तक मेरे चारों जानिब फैला हिज्र-कदा है
Nahid Akhtar Balooch
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गए वक़्तों में मोहब्बत दिल पे लिखी अनमिट तहरीर होती थी सुना है पत्थर पर लकीर होती थी मगर अब हाथ में था में किसी बर्क़ी आले के बटनों में उलझी है उँगली और अंगूठे पर ब-वक़्त-ए-ज़रूरत थिरकती रहती है बर्क़ी पैग़ामात के ख़ाने में पड़े चंद बे-लिबास फ़िक़रे मोहब्बत की अलामत बन गए हैं किसी पुराने दौर में मोहब्बत दिल से निकालना एक जोखिम था मगर अब सुना है कि इस के लिए डिलीट के कई ऑपशन ईजाद हो चुके हैं रात के चोर अँधेरे में कोई रौशन स्क्रीन पर अपने लम्स से लिखता है तुम्हें छू लूँ बस अब मोहब्बत राब्ते की इस सदी में आख़िरी साँसों के दरमियान एक हिचकी पे अटकी हुई है कि अब मोहब्बत महसूस करने से ज़ियादा छू लेने की कोशिश है
Nahid Akhtar Balooch
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वो जब मुझ से बोलता है तो दुनिया की सारी आवाज़ें मीठी तानें मधुर ज़बानें उस के इक इक मीठे बोल पे सर धुनती हैं उस की बातें सात सुरों में एक अनोखा सुर बनती हैं इतना मीठा लहजा उस का वो बोले तो दुनिया की सारी आवाज़ें चुप रह कर उस को सुनती हैं
Nahid Akhtar Balooch
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हर चेहरा एक कहानी है जब चेहरे पढ़ना सीखोगे तब कोई कहानी लिक्खोगे हर चेहरे पे इक नक़्शा है इस में रस्ते ही रस्ते हैं ये रस्ते भूल-भुलय्याँ हैं जब भूल-भुलय्याँ भटकोगे तब कोई कहानी लिक्खोगे हर चेहरा एक समुंदर है हर नक़्श की उठती लहरों में जब पानी पानी उतरोगे तब कोई कहानी लिक्खोगे हर चेहरा एक इमारत है दो खिड़की जैसी आँखों में कुछ दूर खड़ी हैरानी को जब हैरानी से देखोगे तब कोई कहानी लिक्खोगे हर चेहरा इक महताब भी है और रूप नगर का ख़्वाब भी है इस ख़्वाब का एक अज़ाब सुनो वो रूप नगर है शीशे का जब किरची किरची बिखरोगे तब कोई कहानी लिक्खोगे हर चेहरा एक निशाँ भी है हर चेहरा एक ज़बाँ भी है जब उस की रम्ज़ को जानोगे जब उस की बातें समझोगे तब कोई कहानी लिक्खोगे हर चेहरा एक कहानी है जब चेहरे पढ़ना सीखोगे तब कोई कहानी लिक्खोगे आँखों की ज़बानी लिक्खोगे
Nahid Akhtar Balooch
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