गए वक़्तों में मोहब्बत दिल पे लिखी अनमिट तहरीर होती थी सुना है पत्थर पर लकीर होती थी मगर अब हाथ में था में किसी बर्क़ी आले के बटनों में उलझी है उँगली और अंगूठे पर ब-वक़्त-ए-ज़रूरत थिरकती रहती है बर्क़ी पैग़ामात के ख़ाने में पड़े चंद बे-लिबास फ़िक़रे मोहब्बत की अलामत बन गए हैं किसी पुराने दौर में मोहब्बत दिल से निकालना एक जोखिम था मगर अब सुना है कि इस के लिए डिलीट के कई ऑपशन ईजाद हो चुके हैं रात के चोर अँधेरे में कोई रौशन स्क्रीन पर अपने लम्स से लिखता है तुम्हें छू लूँ बस अब मोहब्बत राब्ते की इस सदी में आख़िरी साँसों के दरमियान एक हिचकी पे अटकी हुई है कि अब मोहब्बत महसूस करने से ज़ियादा छू लेने की कोशिश है
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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कल शाम मुझे बारिश मिली बाग़ में रोती हुई उस की सिसकियाँ दरख़्तों की शाख़ों पर अटकी थीं वो बादल का घर छोड़ आई थी मैं ने उसे तअस्सुफ़ से देखा रात को मेरे कमरे की खिड़की पर बिखरे बालों वाले परेशान बादल ने दस्तक दी वो चाँदनी का एक टुकड़ा हाथ में ले कर बारिश को ढूँड रहा था मैं ने खिड़की पे बहते बारिश के आँसुओं की सम्त इशारा किया मोहब्बत के आसमान पर बिछड़ने वालों को ज़मीन भी पनाह नहीं देती इस लिए हाथ छुड़ाने से पहले ये बात ध्यान में रखना मोहब्बत में जुदाई दाइमी होती है
Nahid Akhtar Balooch
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मैं ने कमरे की खूँटी पर तेरा इंतिज़ार टाँग दिया है और मेरी बे-क़रार आँखें कमरे की चौखट पर धरी हैं तेरे फ़िराक़ के सियाह लम्हों की बातें करती मेरी सारी नज़्में कमरे की दीवारों पर चस्पाँ हैं मेरी आती जाती साँसें घड़ी की सूइयों से बंधी हैं और तुम्हारे अमृत-रस टपकाते जुमले मेरे ध्यान का पल्लू पकड़े चुप बैठे हैं तेरे लम्स की ख़्वाहिश मेरे हाथों की पोरों से निकल कर कमरे में चकराती फिरती है तेरे लौट आने का रस्ता तकता हर इक मंज़र हिज्र-ज़दा है और तुम्हारे लौट आने तक मेरे चारों जानिब फैला हिज्र-कदा है
Nahid Akhtar Balooch
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वो जब मुझ से बोलता है तो दुनिया की सारी आवाज़ें मीठी तानें मधुर ज़बानें उस के इक इक मीठे बोल पे सर धुनती हैं उस की बातें सात सुरों में एक अनोखा सुर बनती हैं इतना मीठा लहजा उस का वो बोले तो दुनिया की सारी आवाज़ें चुप रह कर उस को सुनती हैं
Nahid Akhtar Balooch
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हमारे सामने हमारा रब मौजूद है मगर हम अपने अपने मस्लक की डेढ़ डेढ़ ईंट वाली मस्जिदों में ख़्वाहिशों के बुत अपनी अपनी बग़लों में दबाए खड़े हैं और हर बार इन बुतों को सज्दा करते हुए हमारा यक़ीन मस्जिद के मीनारों को छू लेता है कि जन्नत में बहती शहद और दूध की नहरों के किनारों पर हूरें हमें ख़ुश-आमदीद कहने को बेताब बैठी हैं अस्फ़ल-उस-साफ़िलीन सज्दों से सर उठे तो अपने अंदर झाँकना तुम जान लोगे हम से बड़ा ना-फ़रमान कोई नहीं
Nahid Akhtar Balooch
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सफ़ेद चमेली की हरी शाख़ों पर सियाह गुलाब खिल सकता है सितारे रात की ऊँघती सीढ़ियों से छलांग लगा कर ज़मीन पर आ सकते हैं चाँद और सूरज किसी आसमानी पुल में मुलाक़ात पर मुत्तफ़िक़ हो सकते हैं मकड़ी अपने जाले में इंसान को फाँस सकती है समुंदर दरिया के क़दमों में गिर सकता है दरख़्तों पर हीरे उग सकते हैं ज़मीन और आसमान सब से नज़र बचा कर एक दूसरे को छू सकते हैं दीवार चल सकती है पत्थर बोल सकते हैं यहाँ तक कि इस काएनात में कुछ भी हो सकता है मगर तुम ख़्वाब में भी मेरे नहीं हो सकते
Nahid Akhtar Balooch
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