हमारे सामने हमारा रब मौजूद है मगर हम अपने अपने मस्लक की डेढ़ डेढ़ ईंट वाली मस्जिदों में ख़्वाहिशों के बुत अपनी अपनी बग़लों में दबाए खड़े हैं और हर बार इन बुतों को सज्दा करते हुए हमारा यक़ीन मस्जिद के मीनारों को छू लेता है कि जन्नत में बहती शहद और दूध की नहरों के किनारों पर हूरें हमें ख़ुश-आमदीद कहने को बेताब बैठी हैं अस्फ़ल-उस-साफ़िलीन सज्दों से सर उठे तो अपने अंदर झाँकना तुम जान लोगे हम से बड़ा ना-फ़रमान कोई नहीं
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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मैं ने कमरे की खूँटी पर तेरा इंतिज़ार टाँग दिया है और मेरी बे-क़रार आँखें कमरे की चौखट पर धरी हैं तेरे फ़िराक़ के सियाह लम्हों की बातें करती मेरी सारी नज़्में कमरे की दीवारों पर चस्पाँ हैं मेरी आती जाती साँसें घड़ी की सूइयों से बंधी हैं और तुम्हारे अमृत-रस टपकाते जुमले मेरे ध्यान का पल्लू पकड़े चुप बैठे हैं तेरे लम्स की ख़्वाहिश मेरे हाथों की पोरों से निकल कर कमरे में चकराती फिरती है तेरे लौट आने का रस्ता तकता हर इक मंज़र हिज्र-ज़दा है और तुम्हारे लौट आने तक मेरे चारों जानिब फैला हिज्र-कदा है
Nahid Akhtar Balooch
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कल शाम मुझे बारिश मिली बाग़ में रोती हुई उस की सिसकियाँ दरख़्तों की शाख़ों पर अटकी थीं वो बादल का घर छोड़ आई थी मैं ने उसे तअस्सुफ़ से देखा रात को मेरे कमरे की खिड़की पर बिखरे बालों वाले परेशान बादल ने दस्तक दी वो चाँदनी का एक टुकड़ा हाथ में ले कर बारिश को ढूँड रहा था मैं ने खिड़की पे बहते बारिश के आँसुओं की सम्त इशारा किया मोहब्बत के आसमान पर बिछड़ने वालों को ज़मीन भी पनाह नहीं देती इस लिए हाथ छुड़ाने से पहले ये बात ध्यान में रखना मोहब्बत में जुदाई दाइमी होती है
Nahid Akhtar Balooch
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गए वक़्तों में मोहब्बत दिल पे लिखी अनमिट तहरीर होती थी सुना है पत्थर पर लकीर होती थी मगर अब हाथ में था में किसी बर्क़ी आले के बटनों में उलझी है उँगली और अंगूठे पर ब-वक़्त-ए-ज़रूरत थिरकती रहती है बर्क़ी पैग़ामात के ख़ाने में पड़े चंद बे-लिबास फ़िक़रे मोहब्बत की अलामत बन गए हैं किसी पुराने दौर में मोहब्बत दिल से निकालना एक जोखिम था मगर अब सुना है कि इस के लिए डिलीट के कई ऑपशन ईजाद हो चुके हैं रात के चोर अँधेरे में कोई रौशन स्क्रीन पर अपने लम्स से लिखता है तुम्हें छू लूँ बस अब मोहब्बत राब्ते की इस सदी में आख़िरी साँसों के दरमियान एक हिचकी पे अटकी हुई है कि अब मोहब्बत महसूस करने से ज़ियादा छू लेने की कोशिश है
Nahid Akhtar Balooch
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सफ़ेद चमेली की हरी शाख़ों पर सियाह गुलाब खिल सकता है सितारे रात की ऊँघती सीढ़ियों से छलांग लगा कर ज़मीन पर आ सकते हैं चाँद और सूरज किसी आसमानी पुल में मुलाक़ात पर मुत्तफ़िक़ हो सकते हैं मकड़ी अपने जाले में इंसान को फाँस सकती है समुंदर दरिया के क़दमों में गिर सकता है दरख़्तों पर हीरे उग सकते हैं ज़मीन और आसमान सब से नज़र बचा कर एक दूसरे को छू सकते हैं दीवार चल सकती है पत्थर बोल सकते हैं यहाँ तक कि इस काएनात में कुछ भी हो सकता है मगर तुम ख़्वाब में भी मेरे नहीं हो सकते
Nahid Akhtar Balooch
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आधी रोटी बिस्तर के आख़िरी कोने एक छटाँक मोहब्बत दो गज़ चादर और तीन चुटकी इज़्ज़त के एवज़ औरत ने एक अधूरे मर्द को अपनी पूरी हयात में शरीक कर लिया
Nahid Akhtar Balooch
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