जीवन माया हरियाली में तुम जोत जगाती आई हो तुम चाँद चकोरी चाँद बनो तुम फूलन फूल फ्लार बनो तुम दर्पन छाया ज्ञान बनो तुम रात जगाती प्यार बनो तुम रूप चमन संसार बनो जब बारिश मोती लुटते हैं जब मिट्टी सोंधी खुलती है तब हीरें स्वाँग रचाती हैं तब राँझे ढोल बजाते हैं तब आशिक़ गीत सजाते हैं जब मुटियारें बदन चुराती हैं जब नैनन नयन मिलाती हैं खेतों और गलियारों में प्रीत की लपटें उठती हैं तन जलते हैं मन जलते हैं गीतों की तरंगें उठती हैं सुर-ताल सुराही चलती है आँखों की मदिरा ढलती है तुम आस अधूरी तोड़ न देना बीच अँधियारे छोड़ न देना
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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सब्ज़ शाख़ों पर नए सुर्ख़ पत्ते मख़मल की सूरत सजने लगे पुरानी शाख़ों पर नए पंछी चहकने लगे पिछ्ला मौसम कब बीता नया मौसम कब आया ये सोच कर हम हँसने लगे नए आशियाने नए मौसम सब तुम्हारे हैं बीती रुतों के मंज़र-ना में बस हमारे हैं
Faiyaz Rifat
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जिन्हें चाहते हो पसंद करते हो उन की रूहों को टटोलो सच्चाइयों की गिरहों को खोलो वहाँ भी अंधेरे खंडर हैं वहाँ भी वीरान मंज़र हैं वहाँ भी ज़ख़्मों के बसेरे हैं वहाँ भी तन्हाइयों के डेरे हैं वो बस हँसते हैं नुमाइश के लिए उन की ज़हर-ख़ंद हँसी को समझो गोशा-ए-आफ़ियत उन्हें मिला है न तुम्हें मिलेगा कि वो भी आसी ख़्वाहिशों के कि तुम भी आसी आरज़ुओं के जिन्हें चाहते हो पसंद करते हो उन की रूहों को टटोलो सच्चाइयों की गिरहों को खोलो
Faiyaz Rifat
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मैं ने तुम्हें तुम्हारे कँवल झील चेहरे को फ़रामोश कर दिया है पुरानी साअ'तों की शीरीनियों को यकसर भुला दिया है लफ़्ज़ों के मरमरीं पैकर जुमलों की लतीफ़ सौग़ातें हम से हमारा सब कुछ छीन लिया गया छीनने वाले क़ज़्ज़ाक़ हमारे अपने अज़ीज़ थे हमारे अपने रफ़ीक़ थे
Faiyaz Rifat
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आदाब आदाब तस्लीमात तस्लीमात मिज़ाज-ए-अक़्दस फ़ज़्ल-ए-रब्बी है नमाज़ें पढ़ते हैं फ़राग़तों से डरते हैं अल्लाह ख़ैर-ओ-बरकत दे सुना है आप ने नई गाड़ी ख़रीद ली जी हाँ मर्सिडीज़ है अल्लाह के फ़ज़्ल से ग्रीन कार्ड होल्डर भी हैं मगर आप का वो कम्युनिज़म आप तो ख़ासे रेडिकल थे शुक्र बारी-ए-तआ'ला का जिस ने अँधेरों में रौशनी दिखाई अल्लाह बड़ा बादशाह है लॉस एँजेल्स के पोश क़ब्रिस्तान में जगह बुक करा दी है आप का क्या इरादा है फ़ित्ना-ओ-फ़साद से नजात मिली है न मिलेगी क्या आप को वीज़ा भिजवाएँ पेशकश का शुक्रिया मगर अपने देसी क़ब्रिस्तान जैसी ताज़ा हवाएँ अमरीका में कहाँ और फिर अपने यहाँ बुकिंग की भी ज़रूरत नहीं मैं तो कहता हूँ क़िबला आप भी यहीं रुक जाएँ उम्र की आख़िरी कगार पर खड़े हैं मैं नहीं समझता कि बुलावा आने में कोई देर होगी क़ील-ओ-क़ाल से काम न लें एक दूसरे का हाथ थाम लें क़ब्रिस्तान की हरी-भरी फ़ज़ाओं में ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो
Faiyaz Rifat
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