आदाब आदाब तस्लीमात तस्लीमात मिज़ाज-ए-अक़्दस फ़ज़्ल-ए-रब्बी है नमाज़ें पढ़ते हैं फ़राग़तों से डरते हैं अल्लाह ख़ैर-ओ-बरकत दे सुना है आप ने नई गाड़ी ख़रीद ली जी हाँ मर्सिडीज़ है अल्लाह के फ़ज़्ल से ग्रीन कार्ड होल्डर भी हैं मगर आप का वो कम्युनिज़म आप तो ख़ासे रेडिकल थे शुक्र बारी-ए-तआ'ला का जिस ने अँधेरों में रौशनी दिखाई अल्लाह बड़ा बादशाह है लॉस एँजेल्स के पोश क़ब्रिस्तान में जगह बुक करा दी है आप का क्या इरादा है फ़ित्ना-ओ-फ़साद से नजात मिली है न मिलेगी क्या आप को वीज़ा भिजवाएँ पेशकश का शुक्रिया मगर अपने देसी क़ब्रिस्तान जैसी ताज़ा हवाएँ अमरीका में कहाँ और फिर अपने यहाँ बुकिंग की भी ज़रूरत नहीं मैं तो कहता हूँ क़िबला आप भी यहीं रुक जाएँ उम्र की आख़िरी कगार पर खड़े हैं मैं नहीं समझता कि बुलावा आने में कोई देर होगी क़ील-ओ-क़ाल से काम न लें एक दूसरे का हाथ थाम लें क़ब्रिस्तान की हरी-भरी फ़ज़ाओं में ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो
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"मुदावा" कितने बेबाक हैं शाइ'र अब के कितने उर्यां हैं ये अफ़्साना-निगार कुछ समझ में मिरे आते ही नहीं इन अदब-सोज़ों के गुंजलक-अशआर यूँँ तो अपने को ये कहते हैं अदीब पढ़ते हैं जंग के लेकिन अख़बार कभी यूरोप का कभी पूरब का ज़िक्र करने में उड़ाते हैं शरार दास्तानें न क़सीदे न ग़ज़ल अदब-ए-तल्ख़ की हर सू भर मार कभी पंजाब की भोंडी बातें कभी बंगाल के गंदे अफ़्कार ख़ून-आलूदा हैं उन की नस्रें पीप बहते हुए इन के अश'आर उन के अफ़्सानों के मौज़ू अजीब काली लड़की कभी काली शलवार अन्न-दाता से कभी लड़ बैठे कभी अफ़्लास पे खींचती तलवार उन की नज़्मों में कोई लुत्फ़ नहीं न कोई नग़्मा न तफ़सीर-ए-बहार कभी आवारा कभी ख़ाना-ब-दोश कभी औरत कभी मीना-बाज़ार बद-मज़ाक़ी की सरासर बातें रंग ओ बू छोड़ के आँधी की पुकार हरफ़-ए-आख़िर की वो शमशीर दो-दम ज़हर में डूबी हुई जिस की धार जंग-ए-आज़ादी का सर में सौदा बेसवा के लिए इतने ईसार ऐब-पोशी उन्हें आती ही नहीं ज़ख़्म धोते हैं सर-ए-राहगुज़ार एक मैं भी तो हूँ पक्का शाइ'र मगर इन बातों से बिल्कुल इनकार सनद-ए-माज़ी से पुर मेरा कलाम फ़िक्र-ए-इमरोज़ से करता हूँ फ़रार होता है साफ़ मिरा हर मिसरा एक भी शे'र नहीं ज़ेहन पे बार लेकिन उस के लिए अब क्या मैं करूँँ ये समझते नहीं मुझ को फ़नकार इंक़िलाब और अदब-हा-ए-ग़ज़ब कितने मख़दूश हैं ये सब आसार गोर्की जाबिर ओ नज़्र-उल-इस्लाम यही दो चार हैं इन के मेआ'र सुनने में आया है बहरे मिरे कान कि ख़ुदा से भी उन्हें है इनकार मज़हबों से उन्हें बेहद नफ़रत माबदों पर ये उड़ाते हैं ग़ुबार हुक्मरानों का कोई ख़ौफ़ नहीं उमरा का नहीं कुछ दिल में वक़ार चाँद पर ख़ाक उड़ाने के लिए जब भी देखा उन्हें पाया तय्यार मुख़्तसर ये कि हर इक फ़ेल उन का शोला-दर-क़स्र शिकन-दर-दीवार मैं तो आजिज़ हूँ इलाही तौबा आख़िर आएगा कभी उन को क़रार कोई लिल्लाह हटाओ उन को जाग उट्ठे हैं सुलाओ उन को
Wamiq Jaunpuri
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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वाए नादारियाँ हाए मजबूरियाँ रस्म-ओ-आदाब के बस में है ज़िंदगी ग़ैर की हो के परदेस जाती हो तुम हसरत-ओ-यास-ओ-हिर्मां में डूबी हुई जैसे शादाब सी झील में इक कँवल चढ़ते सूरज की तेज़ी से कुमलाए है या ब-अहद-ए-बहाराँ किसी इक सबब जैसे फूलों से रंगत उतर जाए है हर सहेली तबस्सुम-ब-लब है मगर तुम ही मग़्मूम हो तुम ही ख़ामोश हो जैसे गुलचीं का सारे चमन-ज़ार में इक कली पर ही कुछ ज़ुल्म हो दोश हो ख़ामुशी सद ज़बान-ओ-बयाँ की तरह अपनी दुनिया के दुख दर्द कहती हुई फिर भी अपनों से बेगानगी सी लिए वक़्त की धार पर नाव बहती हुई वो उदासी कि हूरों को अफ़्सोस हो हों फ़रिश्ते भी ऐसी फ़ज़ा में ख़जिल और किस किस को ऐ 'दौर' इल्ज़ाम दूँ कुछ पसीजा तो होगा ख़ुदा का भी दिल
Daur Afridi
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दिल आज बहुत घबराता है दिल आज बहुत घबराता है तूफ़ान-ओ-तलातुम के पाले गिर्दाब सँभाले हैं मुझ को इक राहत-ए-जाँ हमदम की तरह कुछ ख़्वाब सँभाले हैं मुझ को यूँँ मेरे ग़मों के संजीदा आदाब सँभाले हैं मुझ को और मेरी तबाही पर ख़ंदाँ अहबाब सँभाले हैं मुझ को हर ज़ख़्म-ए-जिगर समझाता है दिल आज बहुत घबराता है घबरा के ग़ुरूर-ए-फ़ाक़ा-कशी पहलू में बिठा लेता है मुझे शर्मा के सुरूर-ए-तिश्ना-लबी दामन में छुपा लेता है मुझे समझा के फ़रेब-ए-नौहागरी बातों में लगा लेता है मुझे बहला के सुकूत-ए-नीम-शबी ज़ानू पे सुला लेता है मुझे हर शय से मगर उकताता है दिल आज बहुत घबराता है क्या आज मिरी ख़ामोशी भी इक शोर-ए-फ़ुग़ाँ बन जाएगी झुँझला के निगाह-ए-यास मिरी ख़ुद शो'ला-फ़िशाँ बन जाएगी पहलू से बगूले उट्ठेंगे हर साँस धुआँ बन जाएगी जैसे कि मिरी नाकामी भी इक अज़्म-ए-जवाँ बन जाएगी शो'ले की तरह लहराता है दिल आज बहुत घबराता है ख़िर्मन की हमिय्यत जागी है ऐ बर्क़-ओ-शरार अब क्या होगा बरहम है निज़ाम-ए-हस्ती भी ऐ दर्द-ए-जिगर अब क्या होगा हर वा'दा-ए-फ़र्दा रूठ गया ऐ शाम-ओ-सहर अब क्या होगा चौंका है ज़मीर-ए-वहम-ओ-गुमाँ ऐ ज़ौक़-ए-नज़र अब क्या होगा क्या जानिए क्या समझाता है दिल आज बहुत घबराता है क्या आज मैं अपने सोए हुए जज़्बात-ए-जुनूँ बेदार करूँँ सैलाब-ए-हवादिस बन जाऊँ बर्बादी-ए-सद-आज़ाद करूँँ निकलूँ मैं हुदूद-ए-इम्काँ से तूफ़ाँ से निगाहें चार करूँँ इक तल्ख़ तबस्सुम को ले कर दुनिया-ए-सितम पर वार करूँँ
Iffat Zeba Kakorvi
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"मेरे बा'द" जब मैं तेरे पुकारने पे न आऊँ जब मेरे क़दमों के नक़्श तेरी गलियों से मिट जाएँ जब तेरी हिचकियाँ भी रुक जाए लगे की कोई याद नहीं कर रहा या नहीं आए आवाज़ किसी महफ़िल से नहीं आए आवाज़ मेरी ,कोई नज़्म पढ़ते हुए जब कोई मुंतज़िर आँखें नहीं दिखे तुम्हें या दिखे इक लड़की रोती हुई जो सिसकियाँ ले कर ,पढ़ रही हो मेरी ग़ज़लें जब ख़ाली दिखे तुम्हें वो चबूतरा,जहाँ मैं बैठ कर ग़ज़ल लिखता था जब वो गली भी सुनसान दिखे, जहाँ हमारी दास्ताँ का आगाज़ हुआ था, या दिखे वो मोड़ आवारा, जहाँ हम मिल कर , बिछड़ गए थे, जब मेरे नाम पे हर नज़र झुक जाए, तब पूछना किसी बच्चे से, और आ जाना शहर के आख़िरी कब्र पे, इक गुलाब ले कर, रखना गुलाब मेरी कब्र पर, और इक आख़िरी बार आवाज लगाना मुझे, फिर कहना अलविदा, अलविदा मेरे दोस्त, अलविदा मेरे शाइ'र और खो जाना शहर के भीड़ में
Satyam Bhaskar "Bulbul"
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सब्ज़ शाख़ों पर नए सुर्ख़ पत्ते मख़मल की सूरत सजने लगे पुरानी शाख़ों पर नए पंछी चहकने लगे पिछ्ला मौसम कब बीता नया मौसम कब आया ये सोच कर हम हँसने लगे नए आशियाने नए मौसम सब तुम्हारे हैं बीती रुतों के मंज़र-ना में बस हमारे हैं
Faiyaz Rifat
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जिन्हें चाहते हो पसंद करते हो उन की रूहों को टटोलो सच्चाइयों की गिरहों को खोलो वहाँ भी अंधेरे खंडर हैं वहाँ भी वीरान मंज़र हैं वहाँ भी ज़ख़्मों के बसेरे हैं वहाँ भी तन्हाइयों के डेरे हैं वो बस हँसते हैं नुमाइश के लिए उन की ज़हर-ख़ंद हँसी को समझो गोशा-ए-आफ़ियत उन्हें मिला है न तुम्हें मिलेगा कि वो भी आसी ख़्वाहिशों के कि तुम भी आसी आरज़ुओं के जिन्हें चाहते हो पसंद करते हो उन की रूहों को टटोलो सच्चाइयों की गिरहों को खोलो
Faiyaz Rifat
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जीवन माया हरियाली में तुम जोत जगाती आई हो तुम चाँद चकोरी चाँद बनो तुम फूलन फूल फ्लार बनो तुम दर्पन छाया ज्ञान बनो तुम रात जगाती प्यार बनो तुम रूप चमन संसार बनो जब बारिश मोती लुटते हैं जब मिट्टी सोंधी खुलती है तब हीरें स्वाँग रचाती हैं तब राँझे ढोल बजाते हैं तब आशिक़ गीत सजाते हैं जब मुटियारें बदन चुराती हैं जब नैनन नयन मिलाती हैं खेतों और गलियारों में प्रीत की लपटें उठती हैं तन जलते हैं मन जलते हैं गीतों की तरंगें उठती हैं सुर-ताल सुराही चलती है आँखों की मदिरा ढलती है तुम आस अधूरी तोड़ न देना बीच अँधियारे छोड़ न देना
Faiyaz Rifat
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मैं ने तुम्हें तुम्हारे कँवल झील चेहरे को फ़रामोश कर दिया है पुरानी साअ'तों की शीरीनियों को यकसर भुला दिया है लफ़्ज़ों के मरमरीं पैकर जुमलों की लतीफ़ सौग़ातें हम से हमारा सब कुछ छीन लिया गया छीनने वाले क़ज़्ज़ाक़ हमारे अपने अज़ीज़ थे हमारे अपने रफ़ीक़ थे
Faiyaz Rifat
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