सब्ज़ शाख़ों पर नए सुर्ख़ पत्ते मख़मल की सूरत सजने लगे पुरानी शाख़ों पर नए पंछी चहकने लगे पिछ्ला मौसम कब बीता नया मौसम कब आया ये सोच कर हम हँसने लगे नए आशियाने नए मौसम सब तुम्हारे हैं बीती रुतों के मंज़र-ना में बस हमारे हैं
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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को
Allama Iqbal
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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए
Abrar Kashif
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"सौदाई" अजब दिल है न जीता है न मरता है न सीने में ठहरता है न बाहर ही निकलता है अजब जाँ है तरसती है कि तू आए झिझकती है कि तू आए तो ना-मालूम क्या होगा परेशाँ है कि दुनिया क्या कहेगी पशेमाँ है कि अपने बा-हमी रिश्ते में वो दम है न वो ख़म है मगर फिर भी बिलखती है कि तन्हाई ने ऐसा मार रक्खा है न तू आई तो मेरा क्या बनेगा अजब तू है न अपनों में न ग़ैरों में न ग़म-अंदोज़ ख़ल्वत में न जाँ-अफ़रोज़ जल्वत में मुझे डर है कि तुझ सेे मेल होगा तो कहाँ होगा किसी सर-सब्ज़ वादी में के इस वीरान कुटिया में इसी दुनिया में या फिर सरहदों के पार उक़्बा में अजब मैं हूँ मुफ़क्किर भी मुहक़्क़िक़ भी मुसन्निफ़ भी मगर अफ़सोस आशिक़ भी गया-गुज़रा सा शाइ'र भी बईद-अज़-अक़्ल भी और रस्म-ए-दुनिया से भी बे-गाना जो अनजाने में तुझ सेे ढेर सारा प्यार कर बैठा ब-हर-सूरत अगर कुछ वाक़िया है तो फ़क़त ये है मिरा दिल तुझ पे शैदा है मिरी जाँ तुझ पे वारी है मगर फिर भी ये हसरत है कि कोई मरहम-ए-दिल दिल को समझाए कोई गिरवीदा-ए-जाँ जाँ को बतलाए कि तू इक पैकर-ए-दिलकश नहीं है एक नागन है जो अपनों ही को डसने के लिए बेताब रहती है ये सब कुछ जान कर भी मैं तिरे इन गेसुओं के पेच-ओ-ख़म का सिर-फिरा क़ैदी तड़पता रहता हूँ मैं इस लिए शायद के तू आए तू आ कर मुझ को पहले की तरह दोबारा डस जाए
Dharmesh bashar
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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उस का चेहरा सिंपल सादा सा भोला चेहरा है यार क़सम से वो प्यारा चेहरा है पेड़ नदी ये फूल सभी छोड़ो उस को देखो उस का चेहरा है दुनिया लाख हसीन हो सकती है लेकिन उस का चेहरा चेहरा है देख उसे कह डाला हम ने भी बातें प्यारी हैं प्यारा चेहरा है इक तिल होट पे, गाल के नीचे इक और वो चाँद सा नाक पे नूर लिए दो प्यारी आँखें, और सुर्ख़ से लब प्यार मिलाकर अपना रंगों में हम ने बनाया उस का चेहरा है भोली सूरत पे वो अकड़ देखो ग़लती कर के घुमाया चेहरा है रूठ गई जो हम सेे कभी वो दोस्त सब सेे पहले चुराया चेहरा है जब भी उस को चूमने आए हम होट से पहले आया चेहरा है मुँह से इक वो स्वाद नहीं जाता जबसे उस का चूमा चेहरा है रात का होना उस की आँखें हैं दिन का निकलना उस का चेहरा है दुनिया में है उस के चेहरे से है नूर रौशनी लाया उस का चेहरा है हम जैसे भी दरिया करेंगे पार ! अब जो सहारा उस का चेहरा है हम आबाद रहेंगे ऐसे ही हम पे गर साया वो चेहरा है वो चेहरा है बस वो चेहरा है हम को बस वो चेहरा चेहरा है हम ने चाहा बस वो चेहरा है हम ने माँगा बस वो चेहरा है हम ने देखा भी तो वो चेहरा हम ने सोचा बस वो चेहरा है
BR SUDHAKAR
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मैं ने तुम्हें तुम्हारे कँवल झील चेहरे को फ़रामोश कर दिया है पुरानी साअ'तों की शीरीनियों को यकसर भुला दिया है लफ़्ज़ों के मरमरीं पैकर जुमलों की लतीफ़ सौग़ातें हम से हमारा सब कुछ छीन लिया गया छीनने वाले क़ज़्ज़ाक़ हमारे अपने अज़ीज़ थे हमारे अपने रफ़ीक़ थे
Faiyaz Rifat
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जिन्हें चाहते हो पसंद करते हो उन की रूहों को टटोलो सच्चाइयों की गिरहों को खोलो वहाँ भी अंधेरे खंडर हैं वहाँ भी वीरान मंज़र हैं वहाँ भी ज़ख़्मों के बसेरे हैं वहाँ भी तन्हाइयों के डेरे हैं वो बस हँसते हैं नुमाइश के लिए उन की ज़हर-ख़ंद हँसी को समझो गोशा-ए-आफ़ियत उन्हें मिला है न तुम्हें मिलेगा कि वो भी आसी ख़्वाहिशों के कि तुम भी आसी आरज़ुओं के जिन्हें चाहते हो पसंद करते हो उन की रूहों को टटोलो सच्चाइयों की गिरहों को खोलो
Faiyaz Rifat
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जीवन माया हरियाली में तुम जोत जगाती आई हो तुम चाँद चकोरी चाँद बनो तुम फूलन फूल फ्लार बनो तुम दर्पन छाया ज्ञान बनो तुम रात जगाती प्यार बनो तुम रूप चमन संसार बनो जब बारिश मोती लुटते हैं जब मिट्टी सोंधी खुलती है तब हीरें स्वाँग रचाती हैं तब राँझे ढोल बजाते हैं तब आशिक़ गीत सजाते हैं जब मुटियारें बदन चुराती हैं जब नैनन नयन मिलाती हैं खेतों और गलियारों में प्रीत की लपटें उठती हैं तन जलते हैं मन जलते हैं गीतों की तरंगें उठती हैं सुर-ताल सुराही चलती है आँखों की मदिरा ढलती है तुम आस अधूरी तोड़ न देना बीच अँधियारे छोड़ न देना
Faiyaz Rifat
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आदाब आदाब तस्लीमात तस्लीमात मिज़ाज-ए-अक़्दस फ़ज़्ल-ए-रब्बी है नमाज़ें पढ़ते हैं फ़राग़तों से डरते हैं अल्लाह ख़ैर-ओ-बरकत दे सुना है आप ने नई गाड़ी ख़रीद ली जी हाँ मर्सिडीज़ है अल्लाह के फ़ज़्ल से ग्रीन कार्ड होल्डर भी हैं मगर आप का वो कम्युनिज़म आप तो ख़ासे रेडिकल थे शुक्र बारी-ए-तआ'ला का जिस ने अँधेरों में रौशनी दिखाई अल्लाह बड़ा बादशाह है लॉस एँजेल्स के पोश क़ब्रिस्तान में जगह बुक करा दी है आप का क्या इरादा है फ़ित्ना-ओ-फ़साद से नजात मिली है न मिलेगी क्या आप को वीज़ा भिजवाएँ पेशकश का शुक्रिया मगर अपने देसी क़ब्रिस्तान जैसी ताज़ा हवाएँ अमरीका में कहाँ और फिर अपने यहाँ बुकिंग की भी ज़रूरत नहीं मैं तो कहता हूँ क़िबला आप भी यहीं रुक जाएँ उम्र की आख़िरी कगार पर खड़े हैं मैं नहीं समझता कि बुलावा आने में कोई देर होगी क़ील-ओ-क़ाल से काम न लें एक दूसरे का हाथ थाम लें क़ब्रिस्तान की हरी-भरी फ़ज़ाओं में ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो
Faiyaz Rifat
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