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जिन्हें चाहते हो पसंद करते हो उन की रूहों को टटोलो सच्चाइयों की गिरहों को खोलो वहाँ भी अंधेरे खंडर हैं वहाँ भी वीरान मंज़र हैं वहाँ भी ज़ख़्मों के बसेरे हैं वहाँ भी तन्हाइयों के डेरे हैं वो बस हँसते हैं नुमाइश के लिए उन की ज़हर-ख़ंद हँसी को समझो गोशा-ए-आफ़ियत उन्हें मिला है न तुम्हें मिलेगा कि वो भी आसी ख़्वाहिशों के कि तुम भी आसी आरज़ुओं के जिन्हें चाहते हो पसंद करते हो उन की रूहों को टटोलो सच्चाइयों की गिरहों को खोलो

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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सब्ज़ शाख़ों पर नए सुर्ख़ पत्ते मख़मल की सूरत सजने लगे पुरानी शाख़ों पर नए पंछी चहकने लगे पिछ्ला मौसम कब बीता नया मौसम कब आया ये सोच कर हम हँसने लगे नए आशियाने नए मौसम सब तुम्हारे हैं बीती रुतों के मंज़र-ना में बस हमारे हैं

Faiyaz Rifat

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मैं ने तुम्हें तुम्हारे कँवल झील चेहरे को फ़रामोश कर दिया है पुरानी साअ'तों की शीरीनियों को यकसर भुला दिया है लफ़्ज़ों के मरमरीं पैकर जुमलों की लतीफ़ सौग़ातें हम से हमारा सब कुछ छीन लिया गया छीनने वाले क़ज़्ज़ाक़ हमारे अपने अज़ीज़ थे हमारे अपने रफ़ीक़ थे

Faiyaz Rifat

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आदाब आदाब तस्लीमात तस्लीमात मिज़ाज-ए-अक़्दस फ़ज़्ल-ए-रब्बी है नमाज़ें पढ़ते हैं फ़राग़तों से डरते हैं अल्लाह ख़ैर-ओ-बरकत दे सुना है आप ने नई गाड़ी ख़रीद ली जी हाँ मर्सिडीज़ है अल्लाह के फ़ज़्ल से ग्रीन कार्ड होल्डर भी हैं मगर आप का वो कम्युनिज़म आप तो ख़ासे रेडिकल थे शुक्र बारी-ए-तआ'ला का जिस ने अँधेरों में रौशनी दिखाई अल्लाह बड़ा बादशाह है लॉस एँजेल्स के पोश क़ब्रिस्तान में जगह बुक करा दी है आप का क्या इरादा है फ़ित्ना-ओ-फ़साद से नजात मिली है न मिलेगी क्या आप को वीज़ा भिजवाएँ पेशकश का शुक्रिया मगर अपने देसी क़ब्रिस्तान जैसी ताज़ा हवाएँ अमरीका में कहाँ और फिर अपने यहाँ बुकिंग की भी ज़रूरत नहीं मैं तो कहता हूँ क़िबला आप भी यहीं रुक जाएँ उम्र की आख़िरी कगार पर खड़े हैं मैं नहीं समझता कि बुलावा आने में कोई देर होगी क़ील-ओ-क़ाल से काम न लें एक दूसरे का हाथ थाम लें क़ब्रिस्तान की हरी-भरी फ़ज़ाओं में ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो

Faiyaz Rifat

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जीवन माया हरियाली में तुम जोत जगाती आई हो तुम चाँद चकोरी चाँद बनो तुम फूलन फूल फ्लार बनो तुम दर्पन छाया ज्ञान बनो तुम रात जगाती प्यार बनो तुम रूप चमन संसार बनो जब बारिश मोती लुटते हैं जब मिट्टी सोंधी खुलती है तब हीरें स्वाँग रचाती हैं तब राँझे ढोल बजाते हैं तब आशिक़ गीत सजाते हैं जब मुटियारें बदन चुराती हैं जब नैनन नयन मिलाती हैं खेतों और गलियारों में प्रीत की लपटें उठती हैं तन जलते हैं मन जलते हैं गीतों की तरंगें उठती हैं सुर-ताल सुराही चलती है आँखों की मदिरा ढलती है तुम आस अधूरी तोड़ न देना बीच अँधियारे छोड़ न देना

Faiyaz Rifat

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