nazmKuch Alfaaz

मरियम ने ख़्वाब देखा जंगल में है वो तन्हा इतने में झाड़ियों से इक शे'र झट से निकला देखी जो शक्ल उस की मरियम पे ख़ौफ़ छाया बेचारी जी में सहमी अब शे'र मुझ पे झपटा पर शे'र का तो उस दम कुछ और ही था नक़्शा था वो बहुत परेशाँ सहमा सा और डरा सा लटकी हुई थी गर्दन उतरा हुआ था चेहरा आँखों में उस की आँसू जो दुम से पोंछता था मरियम को देख कर ये बेहद हुआ अचम्भा ढारस बंधी जो उस की मरियम ने उस से पूछा ऐ बादशह सलामत है हाल आप का क्या तब उस ने झुरझुरी ली मरियम की सम्त पल्टा पहले दिखाए पंजे खोला फिर अपना जबड़ा कुछ देर चुप रहा वो फिर आह भर के बोला क्या पूछती हो मुझ से ऐ मेरी नन्ही गुड़िया बिगड़ा मिरा मुक़द्दर फूटा मिरा नसीबा या बद-दुआ' है उस की मैं ने जिसे सताया मुझ में रहे न कुछ गुन अब दाँत हैं न नाख़ुन

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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हम ने बत्तख़ के छे अंडे इक मुर्ग़ी के नीचे रक्खे फूटे अंडे पच्चीस दिन में बोल रहे थे बच्चे जिन में बच्चे निकले प्यारे प्यारे मुर्ग़ी की आँखों के तारे रंग था पीला चोंच में लाली आँखें उन की काली काली चोंच थी चौड़ी पंजा चपटा बाक़ी चूज़ों का सा नक़्शा बच्चे ख़ुश थे मुर्ग़ी ख़ुश थी हम भी ख़ुश थे वो भी ख़ुश थी मुर्ग़ी चुगती कट कट करती ले के उन को बाग़ में पहुँची जम्अ''' हुए वाँ बच्चे उस दम कौसर ताशी नीलो मरियम कौसर जो थी छोटी बच्ची भोली-भाली अक़्ल की कच्ची उस ने झट इक चूज़ा ले कर फेंक दिया तालाब के अंदर की ये शरारत इस फुरती से रह गए हम सब न न कहते चूज़ा जो था नन्हा मुन्ना हम समझे बस अब ये डूबा लेकिन साहब वो चूज़ा तो कर गया हैराँ पल में सब को पानी से कुछ भी न डरा वो पहले झिजका फिर सँभला वो ख़ूब ही तैरा छप छप कर के चोंच में अपनी पानी भर के बच्चों ने फिर बाक़ी चूज़े डाल दिए तालाब में सारे होने लगी फिर ख़ूब ग़ड़प ग़प छप छप छप छप छप छप छप छप मुर्ग़ी काँपी हौल के मारे जा पहुँची तालाब किनारे कट कट कर के उन को बुलाया इक भी बच्चा पास न आया शायद वो समझे नहीं बोली बढ़ गई आगे उन की टोली

Ghulam Abbas

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अल्लह मियाँ मैं तेरे सदक़े बेकस की फ़रियाद तू सुन ले मुझ को न दे तू दूध मलाई मुझ को न दे तू नान-ख़ताई लड्डू पेड़े बर्फ़ी जलेबी कब हैं ये क़िस्मत में मेरी एक निवाला मेरी ग़िज़ा है वो भी नहीं मुझ को मिलता है इस घर में है ढेरों हर शय मेरे लिए पर कुछ भी नहीं है जाम मुरब्बे चटपटी चीज़ें बंद हैं सारी अलमारी में आटे के और घी के कनस्तर ताले पड़े हैं इन में यकसर हंडिया रहती है छींके पर वो भी मेरी पहुँच से बाहर बिल्ली के भागूँ छींका टूटे मेरे भागों बर्तन झूटे मेरी क़िस्मत में है लिक्खा रोटी का बस सूखा टुकड़ा लेकिन ये टुकड़ा भी अब तो मुश्किल से मिलता है मुझ को घर में चूहे-दान है रक्खा एक है बिल्ली एक है बिल्ला जीना हुआ है मुझ को अजीरन मैं हूँ अकेली दो दो दुश्मन सोग में रहती हूँ मैं हर दम खाए जाता है मुझ को ग़म चाँदनी देखो कैसी खुली है लो वो कहीं ढोलक भी बजी है दर्द भरे हों दिल में जब ऐसे तुम ही कहो मैं नाचूँ कैसे

Ghulam Abbas

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ये है वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो बिल्ली मोटी मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी ना वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो कुत्ता काला कलूटा ख़ूँ-ख़ार नज़रें खुजली का मारा बिल्ली को जिस ने आ के दबोचा और फिर रगेदा और फिर भंभोड़ा बिल्ली वो बिल्ली मोटी मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी न वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया बेटी बनाया ये है वो गाय बिफरी सी हाए अल्लाह बचाए हैं सींग जिस के तेज़ और नुकीले कुत्ते को जिस ने सींगों में अपने ले के उछाला धरती पे पटख़ा सर उस का चटख़ा कुत्ता वो कुत्ता काला कलूटा ख़ूँ-ख़ार नज़रें खुजली का मारा बिल्ली को जिस ने आ के दबोचा और फिर रगेदा और फिर भंभोड़ा बिल्ली वो बिल्ली मोटी और मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी ना वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया

Ghulam Abbas

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गुड़िया हमारी है प्यारी प्यारी गुड़िया ने पहने फूलों के गहने गुड़िया ने ओढ़ी गोटे की चुनरी गुड़िया ने देखे मेले तमाशे गुड़िया ने खाए खीलें बताशे गुड़िया की सूरत चीनी की मूरत गुड़िया की पलकें गालों पे झलकें गुड़िया है सोई ख़्वाबों में खोई गुड़िया है हँसती गुड़िया है रोती गुड़िया से खेलूँ गोदी में ले लूँ गुड़िया ने रक्खा कल पहला रोज़ा गुड़िया ये मेरी छोटी बहन है

Ghulam Abbas

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एक था घोड़ा अजब निराला बातें हवा से करने वाला रंग उस का चितकबरा ऐसा सावन मास के बादल जैसा क़द था उस का यूँँ तो छोटा जिस्म था लेकिन ख़ासा मोटा सर्कस में कर्तब दिखलाता छोटे बड़ों को ख़ूब हँसाता उछला कूदा नाचा करता और हवा में तरारे भरता इक दिन सर्कस में छुट्टी थी घोड़े को बस सैर की सूझी सर्कस से वो बाहर निकला और फिर इक मैदान में पहुँचा वाँ लड़के डंड पेल रहे थे गेंद से भी कुछ खेल रहे थे घोड़े को ये खेल जो भाया दिल में उस के जोश सा आया उस ने कहा ऐ भाई लड़को खेल में मुझ को शामिल कर लो लड़के बोले अच्छा आओ तुम भी खड़े इक जा हो जाओ लड़के थे गो सब ही खिलाड़ी घोड़ा भी था कोई अनाड़ी हाथ से गेंद दबोचें लड़के घोड़ा मुँह से गेंद दबोचे खेल ने ऐसा रंग जमाया सब ने ख़ूब ही लुत्फ़ उठाया अब तुम बात सुनो आगे की गेंद आई इक बार उछलती घोड़े की आई कम-बख़्ती उस ने झाड़ी इक दोलत्ती गेंद पकड़ने फिर वो लपका ऐसा लगा कुछ उस को धक्का गेंद वो उस के हल्क़ से उतरी और बस सीधी पेट में पहुँची जान पे उस की ऐसी गई बन भूल गया वो सब अपने फ़न उछला कूदा शोर मचाया घोड़े को आराम न आया लड़के उस को जैसे-तैसे ले के शिफ़ा ख़ाने में पहुँचे दौड़ा दौड़ा आया सर्जन करना था जिस को ऑपरेशन घोड़े का था हाल जो अबतर झट से निकाला उस ने नश्तर घोड़े के जब पेट को चीरा अंदर से इक मालटा निकला

Ghulam Abbas

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