nazmKuch Alfaaz

अल्लह मियाँ मैं तेरे सदक़े बेकस की फ़रियाद तू सुन ले मुझ को न दे तू दूध मलाई मुझ को न दे तू नान-ख़ताई लड्डू पेड़े बर्फ़ी जलेबी कब हैं ये क़िस्मत में मेरी एक निवाला मेरी ग़िज़ा है वो भी नहीं मुझ को मिलता है इस घर में है ढेरों हर शय मेरे लिए पर कुछ भी नहीं है जाम मुरब्बे चटपटी चीज़ें बंद हैं सारी अलमारी में आटे के और घी के कनस्तर ताले पड़े हैं इन में यकसर हंडिया रहती है छींके पर वो भी मेरी पहुँच से बाहर बिल्ली के भागूँ छींका टूटे मेरे भागों बर्तन झूटे मेरी क़िस्मत में है लिक्खा रोटी का बस सूखा टुकड़ा लेकिन ये टुकड़ा भी अब तो मुश्किल से मिलता है मुझ को घर में चूहे-दान है रक्खा एक है बिल्ली एक है बिल्ला जीना हुआ है मुझ को अजीरन मैं हूँ अकेली दो दो दुश्मन सोग में रहती हूँ मैं हर दम खाए जाता है मुझ को ग़म चाँदनी देखो कैसी खुली है लो वो कहीं ढोलक भी बजी है दर्द भरे हों दिल में जब ऐसे तुम ही कहो मैं नाचूँ कैसे

Related Nazm

''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

295 likes

"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

191 likes

तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

117 likes

"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

180 likes

"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

108 likes

More from Ghulam Abbas

मरियम ने ख़्वाब देखा जंगल में है वो तन्हा इतने में झाड़ियों से इक शे'र झट से निकला देखी जो शक्ल उस की मरियम पे ख़ौफ़ छाया बेचारी जी में सहमी अब शे'र मुझ पे झपटा पर शे'र का तो उस दम कुछ और ही था नक़्शा था वो बहुत परेशाँ सहमा सा और डरा सा लटकी हुई थी गर्दन उतरा हुआ था चेहरा आँखों में उस की आँसू जो दुम से पोंछता था मरियम को देख कर ये बेहद हुआ अचम्भा ढारस बंधी जो उस की मरियम ने उस से पूछा ऐ बादशह सलामत है हाल आप का क्या तब उस ने झुरझुरी ली मरियम की सम्त पल्टा पहले दिखाए पंजे खोला फिर अपना जबड़ा कुछ देर चुप रहा वो फिर आह भर के बोला क्या पूछती हो मुझ से ऐ मेरी नन्ही गुड़िया बिगड़ा मिरा मुक़द्दर फूटा मिरा नसीबा या बद-दुआ' है उस की मैं ने जिसे सताया मुझ में रहे न कुछ गुन अब दाँत हैं न नाख़ुन

Ghulam Abbas

0 likes

हम ने बत्तख़ के छे अंडे इक मुर्ग़ी के नीचे रक्खे फूटे अंडे पच्चीस दिन में बोल रहे थे बच्चे जिन में बच्चे निकले प्यारे प्यारे मुर्ग़ी की आँखों के तारे रंग था पीला चोंच में लाली आँखें उन की काली काली चोंच थी चौड़ी पंजा चपटा बाक़ी चूज़ों का सा नक़्शा बच्चे ख़ुश थे मुर्ग़ी ख़ुश थी हम भी ख़ुश थे वो भी ख़ुश थी मुर्ग़ी चुगती कट कट करती ले के उन को बाग़ में पहुँची जम्अ''' हुए वाँ बच्चे उस दम कौसर ताशी नीलो मरियम कौसर जो थी छोटी बच्ची भोली-भाली अक़्ल की कच्ची उस ने झट इक चूज़ा ले कर फेंक दिया तालाब के अंदर की ये शरारत इस फुरती से रह गए हम सब न न कहते चूज़ा जो था नन्हा मुन्ना हम समझे बस अब ये डूबा लेकिन साहब वो चूज़ा तो कर गया हैराँ पल में सब को पानी से कुछ भी न डरा वो पहले झिजका फिर सँभला वो ख़ूब ही तैरा छप छप कर के चोंच में अपनी पानी भर के बच्चों ने फिर बाक़ी चूज़े डाल दिए तालाब में सारे होने लगी फिर ख़ूब ग़ड़प ग़प छप छप छप छप छप छप छप छप मुर्ग़ी काँपी हौल के मारे जा पहुँची तालाब किनारे कट कट कर के उन को बुलाया इक भी बच्चा पास न आया शायद वो समझे नहीं बोली बढ़ गई आगे उन की टोली

Ghulam Abbas

0 likes

गुड़िया हमारी है प्यारी प्यारी गुड़िया ने पहने फूलों के गहने गुड़िया ने ओढ़ी गोटे की चुनरी गुड़िया ने देखे मेले तमाशे गुड़िया ने खाए खीलें बताशे गुड़िया की सूरत चीनी की मूरत गुड़िया की पलकें गालों पे झलकें गुड़िया है सोई ख़्वाबों में खोई गुड़िया है हँसती गुड़िया है रोती गुड़िया से खेलूँ गोदी में ले लूँ गुड़िया ने रक्खा कल पहला रोज़ा गुड़िया ये मेरी छोटी बहन है

Ghulam Abbas

0 likes

एक था घोड़ा अजब निराला बातें हवा से करने वाला रंग उस का चितकबरा ऐसा सावन मास के बादल जैसा क़द था उस का यूँँ तो छोटा जिस्म था लेकिन ख़ासा मोटा सर्कस में कर्तब दिखलाता छोटे बड़ों को ख़ूब हँसाता उछला कूदा नाचा करता और हवा में तरारे भरता इक दिन सर्कस में छुट्टी थी घोड़े को बस सैर की सूझी सर्कस से वो बाहर निकला और फिर इक मैदान में पहुँचा वाँ लड़के डंड पेल रहे थे गेंद से भी कुछ खेल रहे थे घोड़े को ये खेल जो भाया दिल में उस के जोश सा आया उस ने कहा ऐ भाई लड़को खेल में मुझ को शामिल कर लो लड़के बोले अच्छा आओ तुम भी खड़े इक जा हो जाओ लड़के थे गो सब ही खिलाड़ी घोड़ा भी था कोई अनाड़ी हाथ से गेंद दबोचें लड़के घोड़ा मुँह से गेंद दबोचे खेल ने ऐसा रंग जमाया सब ने ख़ूब ही लुत्फ़ उठाया अब तुम बात सुनो आगे की गेंद आई इक बार उछलती घोड़े की आई कम-बख़्ती उस ने झाड़ी इक दोलत्ती गेंद पकड़ने फिर वो लपका ऐसा लगा कुछ उस को धक्का गेंद वो उस के हल्क़ से उतरी और बस सीधी पेट में पहुँची जान पे उस की ऐसी गई बन भूल गया वो सब अपने फ़न उछला कूदा शोर मचाया घोड़े को आराम न आया लड़के उस को जैसे-तैसे ले के शिफ़ा ख़ाने में पहुँचे दौड़ा दौड़ा आया सर्जन करना था जिस को ऑपरेशन घोड़े का था हाल जो अबतर झट से निकाला उस ने नश्तर घोड़े के जब पेट को चीरा अंदर से इक मालटा निकला

Ghulam Abbas

0 likes

ये है वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो बिल्ली मोटी मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी ना वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो कुत्ता काला कलूटा ख़ूँ-ख़ार नज़रें खुजली का मारा बिल्ली को जिस ने आ के दबोचा और फिर रगेदा और फिर भंभोड़ा बिल्ली वो बिल्ली मोटी मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी न वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया बेटी बनाया ये है वो गाय बिफरी सी हाए अल्लाह बचाए हैं सींग जिस के तेज़ और नुकीले कुत्ते को जिस ने सींगों में अपने ले के उछाला धरती पे पटख़ा सर उस का चटख़ा कुत्ता वो कुत्ता काला कलूटा ख़ूँ-ख़ार नज़रें खुजली का मारा बिल्ली को जिस ने आ के दबोचा और फिर रगेदा और फिर भंभोड़ा बिल्ली वो बिल्ली मोटी और मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी ना वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया

Ghulam Abbas

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Ghulam Abbas.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Ghulam Abbas's nazm.