हम ने बत्तख़ के छे अंडे इक मुर्ग़ी के नीचे रक्खे फूटे अंडे पच्चीस दिन में बोल रहे थे बच्चे जिन में बच्चे निकले प्यारे प्यारे मुर्ग़ी की आँखों के तारे रंग था पीला चोंच में लाली आँखें उन की काली काली चोंच थी चौड़ी पंजा चपटा बाक़ी चूज़ों का सा नक़्शा बच्चे ख़ुश थे मुर्ग़ी ख़ुश थी हम भी ख़ुश थे वो भी ख़ुश थी मुर्ग़ी चुगती कट कट करती ले के उन को बाग़ में पहुँची जम्अ''' हुए वाँ बच्चे उस दम कौसर ताशी नीलो मरियम कौसर जो थी छोटी बच्ची भोली-भाली अक़्ल की कच्ची उस ने झट इक चूज़ा ले कर फेंक दिया तालाब के अंदर की ये शरारत इस फुरती से रह गए हम सब न न कहते चूज़ा जो था नन्हा मुन्ना हम समझे बस अब ये डूबा लेकिन साहब वो चूज़ा तो कर गया हैराँ पल में सब को पानी से कुछ भी न डरा वो पहले झिजका फिर सँभला वो ख़ूब ही तैरा छप छप कर के चोंच में अपनी पानी भर के बच्चों ने फिर बाक़ी चूज़े डाल दिए तालाब में सारे होने लगी फिर ख़ूब ग़ड़प ग़प छप छप छप छप छप छप छप छप मुर्ग़ी काँपी हौल के मारे जा पहुँची तालाब किनारे कट कट कर के उन को बुलाया इक भी बच्चा पास न आया शायद वो समझे नहीं बोली बढ़ गई आगे उन की टोली
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"मैं और मेरी दुनिया" एक ऐसी दुनिया जिस में सिर्फ़ मैं हूँ और सब कुछ मेरे इर्द-गिर्द बुना हुआ जहाँ ख़यालों का आसमाँ है और दिल की ज़मीं है ख़्वाबों के कुछ शजर हैं नीचे अश्कों की नमी है ख़ुशियों की हवा है जो हौले से मुझे छू कर मुस्कुराते हुए गुज़र जाती है ग़मो की बारिश भी है जो दिल की ज़मीं सोख लेती है और तन्हाइयों के मौसम में अक्सर उगने लगते है अहसास के नन्हे पौधे खिलने लगती है उन में अल्फ़ाज़ की नन्ही कलियाँ और फिर बिखर जाती हैं सफ़्हों की फ़िज़ा में कोई ग़ज़ल या नज़्म बनकर
Priya omar
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"उतरन" कभी कहीं पर सुना है तुम ने कि कोई अपने पुराने कपड़े कहीं ग़रीबों में बाँट दे और फिर कभी उन से जा के पूछे कि किस ने पहना वो सुर्ख़ जोड़ा वो सब्ज़ चादर किसे मिली थी किसे मिली मेरी नीली जैकेट नहीं सुना ना किसी को फ़ुर्सत नहीं है लड़के कि ख़स्ता कपड़ों के रोग पाले पुरानी अश्या पे बैन डाले या अपनी उतरन के भेद रक्खे कभी कहीं पर सुना है तुम ने कि कोई थक कर किसी प्यारे को दूर जंगल में छोड़ आए तो मुड़ के देखे या चंद सालों के बा'द वापिस वहीं पे लौटे वो जिस को छोड़ा था लेने आए नहीं सुना ना किसी को हाजत नहीं है लड़के कि रफ़्तगाँ के अज़ाब झेले पुरानी बाज़ी को फिर से खेले किसी के होने को अपने जीने की शर्त कर ले इसी लिए तो मुझे नहीं है ये फ़िक्र बिल्कुल कहाँ तुम्हारी ये उम्र बीती या कैसी हालत में वक़्त काटा बिछड़ के मुझ से किसे मिले तुम मुझे नहीं है ये फ़िक्र बिल्कुल कि मेरी उतरन को किस ने पहना
Mahnoor Rana
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उस का चेहरा सिंपल सादा सा भोला चेहरा है यार क़सम से वो प्यारा चेहरा है पेड़ नदी ये फूल सभी छोड़ो उस को देखो उस का चेहरा है दुनिया लाख हसीन हो सकती है लेकिन उस का चेहरा चेहरा है देख उसे कह डाला हम ने भी बातें प्यारी हैं प्यारा चेहरा है इक तिल होट पे, गाल के नीचे इक और वो चाँद सा नाक पे नूर लिए दो प्यारी आँखें, और सुर्ख़ से लब प्यार मिलाकर अपना रंगों में हम ने बनाया उस का चेहरा है भोली सूरत पे वो अकड़ देखो ग़लती कर के घुमाया चेहरा है रूठ गई जो हम सेे कभी वो दोस्त सब सेे पहले चुराया चेहरा है जब भी उस को चूमने आए हम होट से पहले आया चेहरा है मुँह से इक वो स्वाद नहीं जाता जबसे उस का चूमा चेहरा है रात का होना उस की आँखें हैं दिन का निकलना उस का चेहरा है दुनिया में है उस के चेहरे से है नूर रौशनी लाया उस का चेहरा है हम जैसे भी दरिया करेंगे पार ! अब जो सहारा उस का चेहरा है हम आबाद रहेंगे ऐसे ही हम पे गर साया वो चेहरा है वो चेहरा है बस वो चेहरा है हम को बस वो चेहरा चेहरा है हम ने चाहा बस वो चेहरा है हम ने माँगा बस वो चेहरा है हम ने देखा भी तो वो चेहरा हम ने सोचा बस वो चेहरा है
BR SUDHAKAR
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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
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मरियम ने ख़्वाब देखा जंगल में है वो तन्हा इतने में झाड़ियों से इक शे'र झट से निकला देखी जो शक्ल उस की मरियम पे ख़ौफ़ छाया बेचारी जी में सहमी अब शे'र मुझ पे झपटा पर शे'र का तो उस दम कुछ और ही था नक़्शा था वो बहुत परेशाँ सहमा सा और डरा सा लटकी हुई थी गर्दन उतरा हुआ था चेहरा आँखों में उस की आँसू जो दुम से पोंछता था मरियम को देख कर ये बेहद हुआ अचम्भा ढारस बंधी जो उस की मरियम ने उस से पूछा ऐ बादशह सलामत है हाल आप का क्या तब उस ने झुरझुरी ली मरियम की सम्त पल्टा पहले दिखाए पंजे खोला फिर अपना जबड़ा कुछ देर चुप रहा वो फिर आह भर के बोला क्या पूछती हो मुझ से ऐ मेरी नन्ही गुड़िया बिगड़ा मिरा मुक़द्दर फूटा मिरा नसीबा या बद-दुआ' है उस की मैं ने जिसे सताया मुझ में रहे न कुछ गुन अब दाँत हैं न नाख़ुन
Ghulam Abbas
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ये है वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो बिल्ली मोटी मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी ना वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो कुत्ता काला कलूटा ख़ूँ-ख़ार नज़रें खुजली का मारा बिल्ली को जिस ने आ के दबोचा और फिर रगेदा और फिर भंभोड़ा बिल्ली वो बिल्ली मोटी मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी न वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया बेटी बनाया ये है वो गाय बिफरी सी हाए अल्लाह बचाए हैं सींग जिस के तेज़ और नुकीले कुत्ते को जिस ने सींगों में अपने ले के उछाला धरती पे पटख़ा सर उस का चटख़ा कुत्ता वो कुत्ता काला कलूटा ख़ूँ-ख़ार नज़रें खुजली का मारा बिल्ली को जिस ने आ के दबोचा और फिर रगेदा और फिर भंभोड़ा बिल्ली वो बिल्ली मोटी और मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी ना वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया
Ghulam Abbas
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अल्लह मियाँ मैं तेरे सदक़े बेकस की फ़रियाद तू सुन ले मुझ को न दे तू दूध मलाई मुझ को न दे तू नान-ख़ताई लड्डू पेड़े बर्फ़ी जलेबी कब हैं ये क़िस्मत में मेरी एक निवाला मेरी ग़िज़ा है वो भी नहीं मुझ को मिलता है इस घर में है ढेरों हर शय मेरे लिए पर कुछ भी नहीं है जाम मुरब्बे चटपटी चीज़ें बंद हैं सारी अलमारी में आटे के और घी के कनस्तर ताले पड़े हैं इन में यकसर हंडिया रहती है छींके पर वो भी मेरी पहुँच से बाहर बिल्ली के भागूँ छींका टूटे मेरे भागों बर्तन झूटे मेरी क़िस्मत में है लिक्खा रोटी का बस सूखा टुकड़ा लेकिन ये टुकड़ा भी अब तो मुश्किल से मिलता है मुझ को घर में चूहे-दान है रक्खा एक है बिल्ली एक है बिल्ला जीना हुआ है मुझ को अजीरन मैं हूँ अकेली दो दो दुश्मन सोग में रहती हूँ मैं हर दम खाए जाता है मुझ को ग़म चाँदनी देखो कैसी खुली है लो वो कहीं ढोलक भी बजी है दर्द भरे हों दिल में जब ऐसे तुम ही कहो मैं नाचूँ कैसे
Ghulam Abbas
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गुड़िया हमारी है प्यारी प्यारी गुड़िया ने पहने फूलों के गहने गुड़िया ने ओढ़ी गोटे की चुनरी गुड़िया ने देखे मेले तमाशे गुड़िया ने खाए खीलें बताशे गुड़िया की सूरत चीनी की मूरत गुड़िया की पलकें गालों पे झलकें गुड़िया है सोई ख़्वाबों में खोई गुड़िया है हँसती गुड़िया है रोती गुड़िया से खेलूँ गोदी में ले लूँ गुड़िया ने रक्खा कल पहला रोज़ा गुड़िया ये मेरी छोटी बहन है
Ghulam Abbas
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एक था घोड़ा अजब निराला बातें हवा से करने वाला रंग उस का चितकबरा ऐसा सावन मास के बादल जैसा क़द था उस का यूँँ तो छोटा जिस्म था लेकिन ख़ासा मोटा सर्कस में कर्तब दिखलाता छोटे बड़ों को ख़ूब हँसाता उछला कूदा नाचा करता और हवा में तरारे भरता इक दिन सर्कस में छुट्टी थी घोड़े को बस सैर की सूझी सर्कस से वो बाहर निकला और फिर इक मैदान में पहुँचा वाँ लड़के डंड पेल रहे थे गेंद से भी कुछ खेल रहे थे घोड़े को ये खेल जो भाया दिल में उस के जोश सा आया उस ने कहा ऐ भाई लड़को खेल में मुझ को शामिल कर लो लड़के बोले अच्छा आओ तुम भी खड़े इक जा हो जाओ लड़के थे गो सब ही खिलाड़ी घोड़ा भी था कोई अनाड़ी हाथ से गेंद दबोचें लड़के घोड़ा मुँह से गेंद दबोचे खेल ने ऐसा रंग जमाया सब ने ख़ूब ही लुत्फ़ उठाया अब तुम बात सुनो आगे की गेंद आई इक बार उछलती घोड़े की आई कम-बख़्ती उस ने झाड़ी इक दोलत्ती गेंद पकड़ने फिर वो लपका ऐसा लगा कुछ उस को धक्का गेंद वो उस के हल्क़ से उतरी और बस सीधी पेट में पहुँची जान पे उस की ऐसी गई बन भूल गया वो सब अपने फ़न उछला कूदा शोर मचाया घोड़े को आराम न आया लड़के उस को जैसे-तैसे ले के शिफ़ा ख़ाने में पहुँचे दौड़ा दौड़ा आया सर्जन करना था जिस को ऑपरेशन घोड़े का था हाल जो अबतर झट से निकाला उस ने नश्तर घोड़े के जब पेट को चीरा अंदर से इक मालटा निकला
Ghulam Abbas
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