एक था घोड़ा अजब निराला बातें हवा से करने वाला रंग उस का चितकबरा ऐसा सावन मास के बादल जैसा क़द था उस का यूँँ तो छोटा जिस्म था लेकिन ख़ासा मोटा सर्कस में कर्तब दिखलाता छोटे बड़ों को ख़ूब हँसाता उछला कूदा नाचा करता और हवा में तरारे भरता इक दिन सर्कस में छुट्टी थी घोड़े को बस सैर की सूझी सर्कस से वो बाहर निकला और फिर इक मैदान में पहुँचा वाँ लड़के डंड पेल रहे थे गेंद से भी कुछ खेल रहे थे घोड़े को ये खेल जो भाया दिल में उस के जोश सा आया उस ने कहा ऐ भाई लड़को खेल में मुझ को शामिल कर लो लड़के बोले अच्छा आओ तुम भी खड़े इक जा हो जाओ लड़के थे गो सब ही खिलाड़ी घोड़ा भी था कोई अनाड़ी हाथ से गेंद दबोचें लड़के घोड़ा मुँह से गेंद दबोचे खेल ने ऐसा रंग जमाया सब ने ख़ूब ही लुत्फ़ उठाया अब तुम बात सुनो आगे की गेंद आई इक बार उछलती घोड़े की आई कम-बख़्ती उस ने झाड़ी इक दोलत्ती गेंद पकड़ने फिर वो लपका ऐसा लगा कुछ उस को धक्का गेंद वो उस के हल्क़ से उतरी और बस सीधी पेट में पहुँची जान पे उस की ऐसी गई बन भूल गया वो सब अपने फ़न उछला कूदा शोर मचाया घोड़े को आराम न आया लड़के उस को जैसे-तैसे ले के शिफ़ा ख़ाने में पहुँचे दौड़ा दौड़ा आया सर्जन करना था जिस को ऑपरेशन घोड़े का था हाल जो अबतर झट से निकाला उस ने नश्तर घोड़े के जब पेट को चीरा अंदर से इक मालटा निकला
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"आँखों की ख़ातिर" उस की आँखों की ख़ातिर या उस की आँखों के वास्ते उस से जुदा होना एक गुनाह है मुझे कि हाँ ये भी एक सबब है उस से जुदा या महजूर न होने का कि जब जब ख़याल-ए-फ़िराक़ आता है मेरे ज़ेहन में तो मैं उस की वो आँखें ही तो याद करता हूँ कि क्या होगा जब छोड़ दूँगा उन आँखों को दरमियान-ए-सफ़र क्या वो अफ़सुर्दा आँखें फिर सह पाएँगी ये महजूरी मेरी वो आँखें जिन में एक उम्र तलक खोया रहा हूँ मैं वो आँखें जो मुझे मुझ से ज़्यादा जानती हैं वो आँखें जिन में महफ़ूज़ हैं सारी यादें सारी बातें सारे लम्हें और सब आलम अपने सुख दुख के वो आँखें जो मेरे हर ख़्वाब को अपना ख़्वाब मानती हैं और जिस के ख़ुद के ख़्वाब मा-तहती हुए हैं वो आँखें जो अपने माज़ी में बड़ी परेशान रही हैं वो आँखें जो मुझे एक उम्मीद से देखती हैं अभी और अब इस मौजूदा हाल में एक सुकून तलाशती हैं मुझ में कहीं वो आँखें जो अभी भी सहमी हुई हैं पर एक कशिश लौटी है मेरे आने से वो आँखें जिन से वा'दा कर चुका हूँ मैं कि कभी सबब-ए-गिर्या न बनूँगा और कभी दरमियान-ए-सफ़र न छोड़ूँगा उन्हें
Zaan Farzaan
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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं
Divya 'Kumar Sahab'
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मरियम ने ख़्वाब देखा जंगल में है वो तन्हा इतने में झाड़ियों से इक शे'र झट से निकला देखी जो शक्ल उस की मरियम पे ख़ौफ़ छाया बेचारी जी में सहमी अब शे'र मुझ पे झपटा पर शे'र का तो उस दम कुछ और ही था नक़्शा था वो बहुत परेशाँ सहमा सा और डरा सा लटकी हुई थी गर्दन उतरा हुआ था चेहरा आँखों में उस की आँसू जो दुम से पोंछता था मरियम को देख कर ये बेहद हुआ अचम्भा ढारस बंधी जो उस की मरियम ने उस से पूछा ऐ बादशह सलामत है हाल आप का क्या तब उस ने झुरझुरी ली मरियम की सम्त पल्टा पहले दिखाए पंजे खोला फिर अपना जबड़ा कुछ देर चुप रहा वो फिर आह भर के बोला क्या पूछती हो मुझ से ऐ मेरी नन्ही गुड़िया बिगड़ा मिरा मुक़द्दर फूटा मिरा नसीबा या बद-दुआ' है उस की मैं ने जिसे सताया मुझ में रहे न कुछ गुन अब दाँत हैं न नाख़ुन
Ghulam Abbas
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हम ने बत्तख़ के छे अंडे इक मुर्ग़ी के नीचे रक्खे फूटे अंडे पच्चीस दिन में बोल रहे थे बच्चे जिन में बच्चे निकले प्यारे प्यारे मुर्ग़ी की आँखों के तारे रंग था पीला चोंच में लाली आँखें उन की काली काली चोंच थी चौड़ी पंजा चपटा बाक़ी चूज़ों का सा नक़्शा बच्चे ख़ुश थे मुर्ग़ी ख़ुश थी हम भी ख़ुश थे वो भी ख़ुश थी मुर्ग़ी चुगती कट कट करती ले के उन को बाग़ में पहुँची जम्अ''' हुए वाँ बच्चे उस दम कौसर ताशी नीलो मरियम कौसर जो थी छोटी बच्ची भोली-भाली अक़्ल की कच्ची उस ने झट इक चूज़ा ले कर फेंक दिया तालाब के अंदर की ये शरारत इस फुरती से रह गए हम सब न न कहते चूज़ा जो था नन्हा मुन्ना हम समझे बस अब ये डूबा लेकिन साहब वो चूज़ा तो कर गया हैराँ पल में सब को पानी से कुछ भी न डरा वो पहले झिजका फिर सँभला वो ख़ूब ही तैरा छप छप कर के चोंच में अपनी पानी भर के बच्चों ने फिर बाक़ी चूज़े डाल दिए तालाब में सारे होने लगी फिर ख़ूब ग़ड़प ग़प छप छप छप छप छप छप छप छप मुर्ग़ी काँपी हौल के मारे जा पहुँची तालाब किनारे कट कट कर के उन को बुलाया इक भी बच्चा पास न आया शायद वो समझे नहीं बोली बढ़ गई आगे उन की टोली
Ghulam Abbas
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ये है वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो बिल्ली मोटी मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी ना वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया ये है वो कुत्ता काला कलूटा ख़ूँ-ख़ार नज़रें खुजली का मारा बिल्ली को जिस ने आ के दबोचा और फिर रगेदा और फिर भंभोड़ा बिल्ली वो बिल्ली मोटी मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी न वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया बेटी बनाया ये है वो गाय बिफरी सी हाए अल्लाह बचाए हैं सींग जिस के तेज़ और नुकीले कुत्ते को जिस ने सींगों में अपने ले के उछाला धरती पे पटख़ा सर उस का चटख़ा कुत्ता वो कुत्ता काला कलूटा ख़ूँ-ख़ार नज़रें खुजली का मारा बिल्ली को जिस ने आ के दबोचा और फिर रगेदा और फिर भंभोड़ा बिल्ली वो बिल्ली मोटी और मुटल्ली आँखों पे जिस की छाई थी झिल्ली नौ सौ वो चूहे खा कर चली थी हज कर के पल्टी चूहे को देखा ललचाई जी में तौबा को तोड़ा आँगन में रपटी चूहे पे झपटी चूहा बना वो बस इक निवाला थी ना वो आख़िर चूहों की ख़ाला चूहा वो चूहा भूरा लंडूरा भूका चटोरा गुड़िया को जिस ने चुटिया से खींचा पंजों में भींचा गुड़िया वो गुड़िया आफ़त की पुड़िया सलमा ने जिस को बेटी बनाया
Ghulam Abbas
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अल्लह मियाँ मैं तेरे सदक़े बेकस की फ़रियाद तू सुन ले मुझ को न दे तू दूध मलाई मुझ को न दे तू नान-ख़ताई लड्डू पेड़े बर्फ़ी जलेबी कब हैं ये क़िस्मत में मेरी एक निवाला मेरी ग़िज़ा है वो भी नहीं मुझ को मिलता है इस घर में है ढेरों हर शय मेरे लिए पर कुछ भी नहीं है जाम मुरब्बे चटपटी चीज़ें बंद हैं सारी अलमारी में आटे के और घी के कनस्तर ताले पड़े हैं इन में यकसर हंडिया रहती है छींके पर वो भी मेरी पहुँच से बाहर बिल्ली के भागूँ छींका टूटे मेरे भागों बर्तन झूटे मेरी क़िस्मत में है लिक्खा रोटी का बस सूखा टुकड़ा लेकिन ये टुकड़ा भी अब तो मुश्किल से मिलता है मुझ को घर में चूहे-दान है रक्खा एक है बिल्ली एक है बिल्ला जीना हुआ है मुझ को अजीरन मैं हूँ अकेली दो दो दुश्मन सोग में रहती हूँ मैं हर दम खाए जाता है मुझ को ग़म चाँदनी देखो कैसी खुली है लो वो कहीं ढोलक भी बजी है दर्द भरे हों दिल में जब ऐसे तुम ही कहो मैं नाचूँ कैसे
Ghulam Abbas
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गुड़िया हमारी है प्यारी प्यारी गुड़िया ने पहने फूलों के गहने गुड़िया ने ओढ़ी गोटे की चुनरी गुड़िया ने देखे मेले तमाशे गुड़िया ने खाए खीलें बताशे गुड़िया की सूरत चीनी की मूरत गुड़िया की पलकें गालों पे झलकें गुड़िया है सोई ख़्वाबों में खोई गुड़िया है हँसती गुड़िया है रोती गुड़िया से खेलूँ गोदी में ले लूँ गुड़िया ने रक्खा कल पहला रोज़ा गुड़िया ये मेरी छोटी बहन है
Ghulam Abbas
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