यूँँ तो अपने ही अंदर का सच और वो सच है अरे ता-अबद तुझ को काफ़ी है कल की जानिब से इस बे-यक़ीनी के सारे अवारिज़ का शाफ़ी है तेरी सद-सम्त और बे-ग़रज़ छोटी छोटी कई ख़िदमतों का ये पुश्तारा है बे-चारा और उस के साथ एक दर्द-ए-नदामत ही वजह-ए-मुआफ़ी है इस तरह पेश-बीनी रिवायात और मस्लहत के मुनाफ़ी है फिर भी तुझे हाल का कोई यक-तरफ़ा साहिब-ए-मक़ाल आज जो भी कहे याद ये भी रहे कितने हालों की तारीख़ ने उन को क्या कर दिया जिस का जितना था हक़ रफ़्ता रफ़्ता अदा कर दिया जब तिरा हाल माज़ी बनेगा तो गो अगले पिछलों पे हैरत करेंगे तेरी ख़ुद-ना-तमामी न वाज़ेह हुई तो हिकायत शिकायत करेंगे और कुछ लग़्ज़िशों की नदामत करेंगे मगर तेरे सच और तुझ से बहुत ही मोहब्बत करेंगे
Related Nazm
"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
70 likes
मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
37 likes
मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
52 likes
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
Kaifi Azmi
37 likes
"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
25 likes
More from Jameeluddin Aali
वक़्त ने पूछा क्या तुम मुझ को जानते हो हाँ क्या तुम मुझ को मानते हो नाँ क्या मतलब है क्या मतलब था वक़्त भी चुप है जाने वो कब क्या बोलेगा आज की कितनी बातों को भी कैसे कैसे बदलने वाले बनते बनते ग़म से ख़ुशी से और हैरत से अपनी आँखें मलने वाले मीज़ानों में डंडी मार के या सच्चाई से तौलेगा और फिर मैं भी चुप न रहूँगा लेकिन जो इस वक़्त मुझे भी कहना लाज़िम हो वो कह न सकूँगा शायद वो सब सह न सकूँगा हाँ भई ले इस लम्हे मैं तुझ को मानता भी हूँ अब ये छोड़ कि जानता भी हूँ जो तू चाहे आज बता दे वर्ना मुझ को अभी भुला दे कौन अब क्या क्या किस को सिखाए जो बोले वो मारा जाए ऐ 'मीरा-जी' आप को तो सब भूल गए हैं आप यहाँ और मुझ जैसे मातूब-ए-ज़माँ को आख़िर इक-दम क्यूँँ याद आए
Jameeluddin Aali
0 likes
मीरा-जी को मानने वाले कम हैं लेकिन हम भी हैं 'फ़ैज़' की बात बड़ी है फिर भी अब वैसा कौन आएगा'' तज़ईन-ए-सुख़न की फ़िक्र न कर बे-साख़्ता चल उठ आँखें मल वो कामिल दीवान आ ही गया दुनिया भर को दहला ही गया हाँ मान लिया पर बहर का क्या बदले बदली हर बहर बदलने वाली है जिस रौ में समुंदर लाख भरे वो रौ फिर चलने वाली है जब हम ने पढ़ा कब चव्वन में कई नए तो उन को पहचाने कुछ सिक्का-बंद तरक़्क़ी-पसंद इस जुरअत पर भी बुरा माने और हम से हो गए बेगाने यूँँ भी कोई हम को क्या जाने और जब ये छपा अठ्ठावन में तो 'फ़ैज़' बहुत ही आगे थे जेलें अफ़्साने मजमूए कुछ ऐसा रोब हुआ क़ाएम सब उन के जिलौ में भागे थे हम जैसे भी उन के मल्बूसात में कच्चे-पक्के धागे थे फिर वक़्त का पलड़ा सिर्फ़ सियासत और तश्हीर में झूल गया दो चार पुराने जमें रहे पर 'मीरा-जी' को एक ज़माना भूल गया कम अहल-ए-सुख़न कम अहल-ए-नज़र को याद रहा कोई 'मीरा-जी' भी शाइ'र था वो पाकिस्तान नहीं आए कैसे आते कोई इश्क़ के ज़ोर पे बुलवाता तो आ जाते बम्बई में नंगे भूके और बीमार रहे वाँ अख़्तर-उल-ईमान ही उन के दोस्त मुरब्बी ख़ादिम बिस्तर-ए-मर्ग और क़ब्र तलक ग़म-ख़्वार रहे याँ उन के साहिब-ए-क़ुव्वत चाहने वाले भी दो वक़्त की रोटियाँ देने को बुलवा न सके ये अपने अपने ज़मीर पे है क्या कहवाए और अब भी क्या कहवा न सके आसान-तरीन बयाँ ये होगा बुलवाया पर आ न सके और अब उन का दीवान छपा दोबारा वही दरबार सजा क्या गहरा चौड़ा दरिया है किन किन सम्तों में बहता है जग भर से ख़ज़ाने लेता है जग भर को को ख़ज़ाने देता है क्या इस में सफ़ीने बहने लगे सब उन को क़सीदे कहने लगे अब 'फ़ैज़' भी हैं और 'राशिद' भी वो बहुत बड़े पर 'मीरा-जी' हाँ 'मीरा-जी' वो चमकते हैं क्या क्या हीरे क्या क्या मोती किस शान के साथ दमकते हैं ऐ यार-ए-ग़याब 'मजीद-अमजद' ख़ामोश शिकार-ए-रश्क-ओ-हसद बे-तश्हीरी के सैद-ए-ज़बूँ कब झंग में आ कर तुझ से कहूँ ले वो सच वापस आया है जो जिस का हक़ हो एक न एक दिन उस ने पूरा पाया है
Jameeluddin Aali
0 likes
मैं छोटा सा इक लड़का हूँ पुर काम करूँँगा बड़े बड़े जितने भी लड़की लड़के हैं मैं सब को नेक बनाऊँगा जो बिखरे हुए हैं हम-जोली इन सब को एक बनाऊँगा सब आपस में मिल जाएँगे जो रहते हैं अब लड़े लड़े ये इल्म की हैं जो रौशनियाँ मैं घर घर में फैलाउँगा ता'लीम का परचम लहरा कर मैं सर-सय्यद बन जाऊँगा बे-कार गुज़ारूँ उम्र भला क्यूँ अपने घर में पड़े पड़े मैं चार तरफ़ ले जाऊँगा इक़बाल ने जो पैग़ाम दिया मैं ही वो परिंदा हूँ जिस को उस ने शहबाज़ का नाम दिया अब मेरे परों पर चमकेंगे सब हीरे मोती जड़े जड़े
Jameeluddin Aali
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Jameeluddin Aali.
Similar Moods
More moods that pair well with Jameeluddin Aali's nazm.







