nazmKuch Alfaaz

वक़्त ने पूछा क्या तुम मुझ को जानते हो हाँ क्या तुम मुझ को मानते हो नाँ क्या मतलब है क्या मतलब था वक़्त भी चुप है जाने वो कब क्या बोलेगा आज की कितनी बातों को भी कैसे कैसे बदलने वाले बनते बनते ग़म से ख़ुशी से और हैरत से अपनी आँखें मलने वाले मीज़ानों में डंडी मार के या सच्चाई से तौलेगा और फिर मैं भी चुप न रहूँगा लेकिन जो इस वक़्त मुझे भी कहना लाज़िम हो वो कह न सकूँगा शायद वो सब सह न सकूँगा हाँ भई ले इस लम्हे मैं तुझ को मानता भी हूँ अब ये छोड़ कि जानता भी हूँ जो तू चाहे आज बता दे वर्ना मुझ को अभी भुला दे कौन अब क्या क्या किस को सिखाए जो बोले वो मारा जाए ऐ 'मीरा-जी' आप को तो सब भूल गए हैं आप यहाँ और मुझ जैसे मातूब-ए-ज़माँ को आख़िर इक-दम क्यूँँ याद आए

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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यूँँ तो अपने ही अंदर का सच और वो सच है अरे ता-अबद तुझ को काफ़ी है कल की जानिब से इस बे-यक़ीनी के सारे अवारिज़ का शाफ़ी है तेरी सद-सम्त और बे-ग़रज़ छोटी छोटी कई ख़िदमतों का ये पुश्तारा है बे-चारा और उस के साथ एक दर्द-ए-नदामत ही वजह-ए-मुआफ़ी है इस तरह पेश-बीनी रिवायात और मस्लहत के मुनाफ़ी है फिर भी तुझे हाल का कोई यक-तरफ़ा साहिब-ए-मक़ाल आज जो भी कहे याद ये भी रहे कितने हालों की तारीख़ ने उन को क्या कर दिया जिस का जितना था हक़ रफ़्ता रफ़्ता अदा कर दिया जब तिरा हाल माज़ी बनेगा तो गो अगले पिछलों पे हैरत करेंगे तेरी ख़ुद-ना-तमामी न वाज़ेह हुई तो हिकायत शिकायत करेंगे और कुछ लग़्ज़िशों की नदामत करेंगे मगर तेरे सच और तुझ से बहुत ही मोहब्बत करेंगे

Jameeluddin Aali

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मीरा-जी को मानने वाले कम हैं लेकिन हम भी हैं 'फ़ैज़' की बात बड़ी है फिर भी अब वैसा कौन आएगा'' तज़ईन-ए-सुख़न की फ़िक्र न कर बे-साख़्ता चल उठ आँखें मल वो कामिल दीवान आ ही गया दुनिया भर को दहला ही गया हाँ मान लिया पर बहर का क्या बदले बदली हर बहर बदलने वाली है जिस रौ में समुंदर लाख भरे वो रौ फिर चलने वाली है जब हम ने पढ़ा कब चव्वन में कई नए तो उन को पहचाने कुछ सिक्का-बंद तरक़्क़ी-पसंद इस जुरअत पर भी बुरा माने और हम से हो गए बेगाने यूँँ भी कोई हम को क्या जाने और जब ये छपा अठ्ठावन में तो 'फ़ैज़' बहुत ही आगे थे जेलें अफ़्साने मजमूए कुछ ऐसा रोब हुआ क़ाएम सब उन के जिलौ में भागे थे हम जैसे भी उन के मल्बूसात में कच्चे-पक्के धागे थे फिर वक़्त का पलड़ा सिर्फ़ सियासत और तश्हीर में झूल गया दो चार पुराने जमें रहे पर 'मीरा-जी' को एक ज़माना भूल गया कम अहल-ए-सुख़न कम अहल-ए-नज़र को याद रहा कोई 'मीरा-जी' भी शाइ'र था वो पाकिस्तान नहीं आए कैसे आते कोई इश्क़ के ज़ोर पे बुलवाता तो आ जाते बम्बई में नंगे भूके और बीमार रहे वाँ अख़्तर-उल-ईमान ही उन के दोस्त मुरब्बी ख़ादिम बिस्तर-ए-मर्ग और क़ब्र तलक ग़म-ख़्वार रहे याँ उन के साहिब-ए-क़ुव्वत चाहने वाले भी दो वक़्त की रोटियाँ देने को बुलवा न सके ये अपने अपने ज़मीर पे है क्या कहवाए और अब भी क्या कहवा न सके आसान-तरीन बयाँ ये होगा बुलवाया पर आ न सके और अब उन का दीवान छपा दोबारा वही दरबार सजा क्या गहरा चौड़ा दरिया है किन किन सम्तों में बहता है जग भर से ख़ज़ाने लेता है जग भर को को ख़ज़ाने देता है क्या इस में सफ़ीने बहने लगे सब उन को क़सीदे कहने लगे अब 'फ़ैज़' भी हैं और 'राशिद' भी वो बहुत बड़े पर 'मीरा-जी' हाँ 'मीरा-जी' वो चमकते हैं क्या क्या हीरे क्या क्या मोती किस शान के साथ दमकते हैं ऐ यार-ए-ग़याब 'मजीद-अमजद' ख़ामोश शिकार-ए-रश्क-ओ-हसद बे-तश्हीरी के सैद-ए-ज़बूँ कब झंग में आ कर तुझ से कहूँ ले वो सच वापस आया है जो जिस का हक़ हो एक न एक दिन उस ने पूरा पाया है

Jameeluddin Aali

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मैं छोटा सा इक लड़का हूँ पुर काम करूँँगा बड़े बड़े जितने भी लड़की लड़के हैं मैं सब को नेक बनाऊँगा जो बिखरे हुए हैं हम-जोली इन सब को एक बनाऊँगा सब आपस में मिल जाएँगे जो रहते हैं अब लड़े लड़े ये इल्म की हैं जो रौशनियाँ मैं घर घर में फैलाउँगा ता'लीम का परचम लहरा कर मैं सर-सय्यद बन जाऊँगा बे-कार गुज़ारूँ उम्र भला क्यूँ अपने घर में पड़े पड़े मैं चार तरफ़ ले जाऊँगा इक़बाल ने जो पैग़ाम दिया मैं ही वो परिंदा हूँ जिस को उस ने शहबाज़ का नाम दिया अब मेरे परों पर चमकेंगे सब हीरे मोती जड़े जड़े

Jameeluddin Aali

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