मैं छोटा सा इक लड़का हूँ पुर काम करूँँगा बड़े बड़े जितने भी लड़की लड़के हैं मैं सब को नेक बनाऊँगा जो बिखरे हुए हैं हम-जोली इन सब को एक बनाऊँगा सब आपस में मिल जाएँगे जो रहते हैं अब लड़े लड़े ये इल्म की हैं जो रौशनियाँ मैं घर घर में फैलाउँगा ता'लीम का परचम लहरा कर मैं सर-सय्यद बन जाऊँगा बे-कार गुज़ारूँ उम्र भला क्यूँ अपने घर में पड़े पड़े मैं चार तरफ़ ले जाऊँगा इक़बाल ने जो पैग़ाम दिया मैं ही वो परिंदा हूँ जिस को उस ने शहबाज़ का नाम दिया अब मेरे परों पर चमकेंगे सब हीरे मोती जड़े जड़े
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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वक़्त ने पूछा क्या तुम मुझ को जानते हो हाँ क्या तुम मुझ को मानते हो नाँ क्या मतलब है क्या मतलब था वक़्त भी चुप है जाने वो कब क्या बोलेगा आज की कितनी बातों को भी कैसे कैसे बदलने वाले बनते बनते ग़म से ख़ुशी से और हैरत से अपनी आँखें मलने वाले मीज़ानों में डंडी मार के या सच्चाई से तौलेगा और फिर मैं भी चुप न रहूँगा लेकिन जो इस वक़्त मुझे भी कहना लाज़िम हो वो कह न सकूँगा शायद वो सब सह न सकूँगा हाँ भई ले इस लम्हे मैं तुझ को मानता भी हूँ अब ये छोड़ कि जानता भी हूँ जो तू चाहे आज बता दे वर्ना मुझ को अभी भुला दे कौन अब क्या क्या किस को सिखाए जो बोले वो मारा जाए ऐ 'मीरा-जी' आप को तो सब भूल गए हैं आप यहाँ और मुझ जैसे मातूब-ए-ज़माँ को आख़िर इक-दम क्यूँँ याद आए
Jameeluddin Aali
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यूँँ तो अपने ही अंदर का सच और वो सच है अरे ता-अबद तुझ को काफ़ी है कल की जानिब से इस बे-यक़ीनी के सारे अवारिज़ का शाफ़ी है तेरी सद-सम्त और बे-ग़रज़ छोटी छोटी कई ख़िदमतों का ये पुश्तारा है बे-चारा और उस के साथ एक दर्द-ए-नदामत ही वजह-ए-मुआफ़ी है इस तरह पेश-बीनी रिवायात और मस्लहत के मुनाफ़ी है फिर भी तुझे हाल का कोई यक-तरफ़ा साहिब-ए-मक़ाल आज जो भी कहे याद ये भी रहे कितने हालों की तारीख़ ने उन को क्या कर दिया जिस का जितना था हक़ रफ़्ता रफ़्ता अदा कर दिया जब तिरा हाल माज़ी बनेगा तो गो अगले पिछलों पे हैरत करेंगे तेरी ख़ुद-ना-तमामी न वाज़ेह हुई तो हिकायत शिकायत करेंगे और कुछ लग़्ज़िशों की नदामत करेंगे मगर तेरे सच और तुझ से बहुत ही मोहब्बत करेंगे
Jameeluddin Aali
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मीरा-जी को मानने वाले कम हैं लेकिन हम भी हैं 'फ़ैज़' की बात बड़ी है फिर भी अब वैसा कौन आएगा'' तज़ईन-ए-सुख़न की फ़िक्र न कर बे-साख़्ता चल उठ आँखें मल वो कामिल दीवान आ ही गया दुनिया भर को दहला ही गया हाँ मान लिया पर बहर का क्या बदले बदली हर बहर बदलने वाली है जिस रौ में समुंदर लाख भरे वो रौ फिर चलने वाली है जब हम ने पढ़ा कब चव्वन में कई नए तो उन को पहचाने कुछ सिक्का-बंद तरक़्क़ी-पसंद इस जुरअत पर भी बुरा माने और हम से हो गए बेगाने यूँँ भी कोई हम को क्या जाने और जब ये छपा अठ्ठावन में तो 'फ़ैज़' बहुत ही आगे थे जेलें अफ़्साने मजमूए कुछ ऐसा रोब हुआ क़ाएम सब उन के जिलौ में भागे थे हम जैसे भी उन के मल्बूसात में कच्चे-पक्के धागे थे फिर वक़्त का पलड़ा सिर्फ़ सियासत और तश्हीर में झूल गया दो चार पुराने जमें रहे पर 'मीरा-जी' को एक ज़माना भूल गया कम अहल-ए-सुख़न कम अहल-ए-नज़र को याद रहा कोई 'मीरा-जी' भी शाइ'र था वो पाकिस्तान नहीं आए कैसे आते कोई इश्क़ के ज़ोर पे बुलवाता तो आ जाते बम्बई में नंगे भूके और बीमार रहे वाँ अख़्तर-उल-ईमान ही उन के दोस्त मुरब्बी ख़ादिम बिस्तर-ए-मर्ग और क़ब्र तलक ग़म-ख़्वार रहे याँ उन के साहिब-ए-क़ुव्वत चाहने वाले भी दो वक़्त की रोटियाँ देने को बुलवा न सके ये अपने अपने ज़मीर पे है क्या कहवाए और अब भी क्या कहवा न सके आसान-तरीन बयाँ ये होगा बुलवाया पर आ न सके और अब उन का दीवान छपा दोबारा वही दरबार सजा क्या गहरा चौड़ा दरिया है किन किन सम्तों में बहता है जग भर से ख़ज़ाने लेता है जग भर को को ख़ज़ाने देता है क्या इस में सफ़ीने बहने लगे सब उन को क़सीदे कहने लगे अब 'फ़ैज़' भी हैं और 'राशिद' भी वो बहुत बड़े पर 'मीरा-जी' हाँ 'मीरा-जी' वो चमकते हैं क्या क्या हीरे क्या क्या मोती किस शान के साथ दमकते हैं ऐ यार-ए-ग़याब 'मजीद-अमजद' ख़ामोश शिकार-ए-रश्क-ओ-हसद बे-तश्हीरी के सैद-ए-ज़बूँ कब झंग में आ कर तुझ से कहूँ ले वो सच वापस आया है जो जिस का हक़ हो एक न एक दिन उस ने पूरा पाया है
Jameeluddin Aali
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