जुदाई और क्या है मैं जिसे सहता नहीं रहता ये तुम से रोज़ का मिलना जुदा होने से पहले देर तक इक बात से इक बात तक लफ़्ज़ों का लुढ़काना नए मौसम की बातें आलिमाना गुफ़्तुगूएँ उन मनाज़िर की सियासत जिन का चेहरा कल दिखाएगी मुलाक़ातें हैं और ऐसी मुलाक़ातें कि बाहम रोज़ का मिलना न मिलना कोई भी अर्ज़िश नहीं रखता ये कैसा वस्ल है जिस में हदें मिटती नहीं बातों से बातों का मिलाना मैं से तू तक का सफ़र भी बन नहीं पाता ये कैसे राब्ते हैं कुर्सियों से कुर्सियाँ मिलती हैं लेकिन दरमियानी फ़ासले मिटते नहीं
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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बचपने की दुनिया थी जिस के दम से दम लेती ख़ौफ़ की पिच्छल-पाई ख़्वाब जिस की ज़द में थे सुब्ह ख़्वाब सुनने पर सब बुज़ुर्ग कह देते ख़्वाब की ये बातें हैं हम से दूर बीतेंगी दूर से सुनेंगे हम अब जुदा सी दुनिया है अन-कहे ज़मानों के जीते जागते लम्हे ध्यान से गुज़रते हैं सोच में उतरते हैं पर वो दिन नहीं आए जिस में जागती तक़दीर सुब्ह वो नहीं छूटी ख़्वाब की जो दे ता'बीर दूर से सुना हम ने बर्फ़ में खुली कोंपल ग़र्ब में मची हलचल हुर्रियत हुक़ूक़ अफ़्कार ज़ौक़-ए-आरज़ू आसार ज़ह्न की कमाँ-दारी रंग-नादिरा-कारी इल्म उस की तामीरें बर्क़ एटम आहन से जिस्म खेल सेहत तक इर्तिक़ा की ता'बीरें दूर सब समुंदर पार अपने ख़्वाब कैसे हैं जो नज़र नहीं आते इंतिशार इतना है सौ तरह की ता'बीरें
Ehsan Akbar
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क़दम मिट्टी पे रखती हो कि अर्श ऊपर ठहरते हैं कि जब तुम पाँव धरती हो तो धरती के जिगर की धड़कनें भी आज़माती हो बहारों में बिखरतीं तो तुम्हें बस ढूँडते फिरते मगर तुम रंग-ओ-बू को अपना पस-मंज़र बनाती हो ख़ुश-दिली के क़हक़हे की नुक़रई घंटी के नग़्मों की खनक के साथ सारे मंज़रों पर फैल जाती हो वो साअ'त जिस में तुम दम लो ज़माने की हर इक तक़दीम से बाहर कोई फैला हुआ लम्हा ठहरती है वो सब गोशे जहाँ तन्हाई तुम को खींच ले जाए वहीं तो रेशमी निकहत की तनवीरें बिखरती हैं ये तस्वीरें कि जिन में तुम ने देखा लोग दिन के हफ़्त-ख़्वाँ को काटते गुज़रे ये सब ख़ूँ थूकते ज़ख़्म अपने अपने चाटते इंसाँ फ़क़त उस शाम की आहट पे जाते हैं जहाँ तुम हो
Ehsan Akbar
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शहर-ए-ला-मकाँ से हूँ जिस में इक मकाँ मेरा ख़्वाब से उभरता है दूधिया सवेरा सा ध्यान में निखरता है जो हदों से आरी है इंतिहा नहीं रखता चौखटें दरीचे दर क्या गुमान में आएँ (सेहन आँगन और दीवार का ख़याल ही बे-कार) चार सम्त की दीवार चाहे कितनी फैली हो आप का अहाता है आप का है घेराव क्यूँँ गिरफ़्त में आऊँ क्यूँँ मुझे कोई घेरे सिर्फ़ एक ख़्वाहिश है बे-हुदूद आज़ादी!
Ehsan Akbar
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ये रंग-ओ-निकहत में बहती दुनिया ये हुस्न-ए-सूरत ये जल्वा-गाहें ये बिजलियों सी लपक अदा की ये बदलियों सी गुदाज़ बाँहें ये नक़्श से फूटते करिश्में ये निकहत-ओ-नूर की पनाहें इक आरज़ू के हज़ार पैकर इक इल्तिजा लाख बारगाहें हयात के सरफ़राज़ी चश्में नशा पिलाती हुई निगाहें जमाल का दिल-नशीं तसव्वुर ख़याल की दिल-पज़ीर राहें हयात मदहोश हो गई है मरी मरी है
Ehsan Akbar
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हमें क्या चाँदनी की रात क्या रातों की तारीकी बस इतना है कि रौशन रात में गर तेज़ चलना ही ज़रूरी हो तो चल सकते हैं वर्ना चाँदनी की ज़र्द चादर में छुपे भेदों भरे फ़ित्ने सफ़र करने नहीं देते अंधेरे में हमें फ़ित्नों के सर पर पाँव रख कर बढ़ते जाना दश्त में आसान रहता है
Ehsan Akbar
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